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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 7

१४ / घट रामायण
सुना समझा रिझ लिया नहीं तो वह बानी हाथ से निकल जाती। इस प्रकार के अनेक शब्द उनकी
शब्दावली में हैं।१
घट रामायण की उनके विषय में लिखी गई इस जीवन चर्चा से अधिक प्रामाणिक तथा विस्तृत
सामग्री नहीं मिलती, अतः सम्प्रति उनके विषय में यही एक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य है। डॉ० रामकुमार वर्मा ने
इन्हें 'आवापंथी' स्वीकार किया है किन्तु भेष एवं पंथ का सबसे अधिक विरोध इन्होंने ही किया है।
कृतियों का परिचय
उनकी तीन कृतियाँ अब तक सर्वथा प्रसिद्ध एवं उनके सृजन के साक्ष्य के रूप में उपलब्ध हैं। ये
हैं, क्रमश- घट रामायण, शब्दावली एवं रत्न सागर। इन कृतियों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
(क) घट रामायण-'घट रामायण' का अर्थ है, घट में न केवल सम्पूर्ण सृष्टि का अन्तरण अपितु
सम्पूर्ण सिद्धान्तों तथा आध्यात्मिक चिन्तन की अर्न्तसाधना का समाहार। वे अपने इस मन्तव्य को अनेक
स्थलों पर कहते ही नहीं अपितु साधना के व्यावहारिक स्तर पर भी उतारते हैं।
लखि अलष अंडन खलक खंडा पलक पर घट घट कही।
यहाँ सम्पूर्ण सृष्टि इस अंड (पिंड) शरीर में निहित है और इस प्रकार सम्पूर्ण सृष्टि की गाथा वे
अपनी अन्तश्चेतना में स्वीकार करके आगे चलते हैं। वे इसे स्पष्ट करते हुए पुनः कहते हैं कि -
तन मन ब्रहांड पसार अंड खंड नौखंड लगै।
सो घट लखन मझार करत सैल ब्रह्मांड की॥
×× ×× ×× ××
पिंड माँहि ब्रह्मांड देखा निज घर जोड़ कै।
गुरु पद पदम प्रकास निज अकास अम्बर चखी॥
इसी शरीर पिण्ड में पचासी पवन हैं, इसी में षट् चक्र, द्वादश नाल, हैं। दसवीं नाल में 'राम तथा
लक्ष्मण' निवास करते हैं।२ इस घट में त्रिवेणी है, यही प्रयाग है, गंगा, यमुना तथा सरस्वती है। इसी में
शून्य महल है, शब्द शिखर है, त्रिकुटी है, इसमें नौ कमल तक तीन गम्य लोक और चौथा अगम्य
लोक है-इसी में नव द्वार हैं। इस तत्त्व में प्रवेश योगी नहीं सन्त एवं साधु रहते हैं। पिण्ड के इस लोक
का 'सत्यलोक' है। सत्य लोक में उस पर अनाम तत्त्व है, जिसे विरले जानते हैं।
इस घट के 34 भेद और 34 विविध तत्त्वों के केन्द्र स्थल हैं। तुलसी साहब अन्त में के सन्दर्भ में
सम्पूर्ण लोक, अध्यात्म, पुराण, धर्मकथा एवं उनके विविध संदर्भों का समाहार करके कहते हैं-
घट में स्वर्ग एवं नरक हैं दोई। घट में जनम मरन पुनि होई॥
घट में कथा पुरान सुनावै। घट में काया करम करावै॥
घट में बैठे पाँचों नादा। घट में लागी सहज समाधा॥
घट में राजा हैं बलि बावन। घट में सीता रघुपति रावन॥
घट में सुकदेव व्यास अरु नारद। घट में ऋषी मुनी आरु सारद॥
जो सब घट कहि बरनि सुनाई। तौ जग कागज मिलै न स्याही॥

१. बेलविडियर प्रेस, से प्रकाशित घट रामायण की भूमिका से साभार।
२. देखें, घट रामायण, पृष्ठ 20, 10वीं