घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / २३
अर्थ-सखी अपने सूरमा मन की इस नासमझी को सुनकर शरीर के बीच सुधि-बुद्धि रहित होकर
रह गई। यह चित्त रूपी मधुकर लेशमात्र भी वश में नहीं आ रहा है, इसके लिए कौन-सा उपाय गढ़कर
बनाऊँ ॥ १॥
नित्य प्रतिदिन पाँचों इन्द्रियाँ, तीनों ज्ञानवृत्तियाँ एवं पचीसों लोकात्मकगुण वृत्तियों भौतिक गुणों की
गठरी के रूप में मानव जाति के लिए बन्धन बन गई हैं। उनके वश में होकर मानव चेतना विवश हो
उठी है, उसका मुक्ति के लिए कोई दाँव नहीं लगता और एक क्षण भी (निमिख) दृढ़ता का भाव नहीं
आने पाता ॥ २॥
घर में हाथ पटक कर प्रियतम (निर्गुण ब्रह्म) को साथ-साथ पुकारती हुई हार मानकर जीव से दूर
हटकर रहने लगी। किसी स्थान पर भी मेरा वश नही चल पा रहा है। हे सखी! मैं अपनी विपत्ति को
क्या कहूँ ॥ ३॥
मेरे ज्ञान की बात सुनकर ध्यान (समाधि चित्त) विश्वास (कान) नहीं मानता और शरीर तथा मन
दोनों विचलित हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि मैं अपने प्रियतम (निरंकार ब्रह्म) के लिए हृदय से
व्याकुल हो उठी हूँ-हे दैव! किसी दिन (शीघ्र) ही मुझे मृत्यु दे दो ॥ ४ ॥
॥ छन्द ७॥
सखि सीख सुनि गुनि गांठि बाँधै। ठाट ठट सतसँग करै ॥
जब रंग संग अपंग अलि री। अंग सत मत मन मरै ॥ १॥
मन मीन दिल जब दीन देखै। चीन्ह मधुकर सिर धरै ॥
अलि डगर मिलि जब सुरति सरजू। कँवल दल चल पद परै ॥ २॥
थिर थोव ठुमकि टिकाव नैना। नीर थिर जिमि थम थिर ॥
यहि भाँति साथ सुधारि मन कौ। पलक गिरि गगना भरै ॥ ३॥
लखि द्वार दृढ़ दरबार दरसै। परसि पुनि पद पिउ घरै ॥
गुरु गैल मेल मिलाप तुलसी। मन्त्र विषधर बसि करै ॥ ४ ॥
अर्थ-हे सखी! मेरी शिक्षा सुनो, मनन करो (गुनो) और गाँठ बाँध लो और अब तू दृढ़ चित्त से
सत्संग करो। हे सखी! जब उस निर्गुण का रंग तथा संग चित्त को प्राप्त होगा तो मन में स्थित नाना
प्रकार के विचार समाप्त हो उठेंगे ॥ १ ॥
मन-सरोवर का मत्स्य जब हृदय को दुखी देखेगा वह मधुकर को पहचान कर अपने शीश पर
धारण करेगा। हे सखि! जब सुरति रूपी सरयू नदी रास्ते में मिलेगी तब हे कमल दल! तू चलकर
उसी में जलस्थ हो जाएगा ॥ २ ॥
उस समाधि वृत्ति में स्थिर करके चित्त के नेत्रों को रोक करके (ठुमकि) ठहराओ। इस प्रकार,
मन को सुधार कर दोनों पलकों के बीच में स्थित ध्यान गिरि में उसे केन्द्रित करो ॥ ३ ॥
द्वार दृढ़ होने पर उस निर्गुण ब्रह्म का दरबार दिखाई पड़ेगा और पुनः पति के भवन का इस प्रकार
स्पर्श करो। तुलसी साहब कहते हैं कि गुरु के रास्ते पर सत्संगति द्वारा चलकर माया रूपी सर्प को उस
महामंत्र द्वारा वश में कर लो ॥ ४ ॥
॥ छन्द ८ ॥
सखि भेद भाव लखाव लै गुरु । मरम केहि मारग मिलै ॥
जेहि जतन पतन पियास पलपल । पकरि मन केहि बिधि चलै ॥ १ ॥
गुन गोह गति मति गजब गैला। सिखरि साधन करम फलै ॥