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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 8

घट रामायण १५
इस घट के भीतर बहत्तर कोठे हैं जिसमें ब्रह्मा, विष्णुशंकर, वरुण, सुमेर आदि बैठे हैं। यही नहीं,
चौरासी सिद्ध, पच्चीस प्रकृति, नौ नाड़ियाँ, पाँच इन्द्रिय निवास एवं बाईस शून्य, वैराग की चार गतियाँ
आदि सब कुछ हैं।
इस घट में अन्तरण में स्थित विधि तत्त्वों को न योगी देखता है और न कर्मकांडी। लोक के
धर्मपंथी और भेष रचना द्वारा आध्यात्मिकता का प्रदर्शन करने वाले तो इसे जानते ही नहीं।
कवि इस अन्तश्चेतना के आध्यात्मिक बोध के साक्ष्य के लिए अपने युग के पूर्व एवं सामायिक
सन्दर्भों तथा धर्मगुरूओं को सामने रखकर न केवल उनके आध्यात्मिक विचारों का खंडन करता है
अपितु उन्हें घट साधना के भीतर की आध्यात्मिक अन्तराकृति से जोड़कर उन्हें प्रामाणिक बनाता है।
काशी के पंडितों में नैनू-सैनू, फकीर तकी शेख, कर्मा तथा धर्मा नामक जैन धर्मावलम्बी, कर्मचन्द्र
पालीवाल शावक जैनधर्मी, करिया और सैनी नारियाँ, श्यामा पंडित, रेवतीदास, हिरदै अहीर का पुत्र
गुनवाँ, फूलदास कबीर पंथी, प्रिमेलाल आदि-आदि विविध मतो एवं सम्प्रदायों के ज्ञानियो को जिस
अगम्य तत्त्व का मार्ग दिखाकर सन्तुष्ट किया वह घट रामायण मे ही सम्बद्ध है। इस अद्भुत घट
रामायण के महत्त्व का निरूपण करते हुए वे कहते हैं कि-
ये री घट माँहिं तो रामायन गाई, ग्रंथन बनाइ के।
पिंड-पिंड ब्रह्मांड दिखाया तुलसी लै लाइ के।
हम देखा पिंड ब्रहांडा, निरखा सत द्वीप नौखंडा।
अंडा तत पाँच बनाया काया धसिजाई के॥
xx xx xx
तुलसी तत तोल बताई पुनि कहि-कहि भाखि सुनाई।
घट रामायण बूझै सूकै तिहूँ लोक में॥
सन्त मत के अन्तर्गत अगम्य तत्त्व का उद्बोधन एवं उसकी प्राप्ति तथा साधनाओं द्वारा अन्तर्वृत्ति के
अन्तर्गत अन्वेषण और वाह्य आडम्बरों, पंथ, भेष, मूर्ति, धर्मग्रंथ, मन्दिर, तीर्थ आदि के स्थान पर इस
घट की अन्तःवृत्ति में ब्रह्म तत्त्व (अगम तत्त्व) की प्राप्ति ही घट रामायण का मूल मन्तव्य है।
यहाँ 'रामायण' शब्द का अर्थ 'राम का अयन' नहीं उस अगम्य का अयन-जिसे लोग राम के रूप
में जानते हैं-वह अगम्य तत्त्व हैं-वह दशरथ पुत्र नहीं है, उसका मर्म कुछ और है। उस अगम तत्त्व की
वार्ता ही घट रामायण का मूल मन्तव्य है।
गोस्वामी तुलसीदास और तुलसी साहब का ऐक्य
घट रामायण के रचनाकार तुलसी साहब अपने पूर्व जन्म का वृत्तान्त देते हुए स्वयं को
'तुलसीदास' बताते हैं और कहते हैं कि संवत् 1618 में मैंने सर्वप्रथम घट रामायण की रचना की थी
किन्तु काशी में पंडितों तथा जनसमुदाय के विरोध के कारण इसे छिपा दिया और लोगों को भ्रमित
करने के लिए संवत् १६३१ में मैंने रामचरित्र किया-
संवत् सोला सै इकतीसा। रामचरित कीन्ह पद ईसा॥
ईस कर्म औतारी भावा। कर्मभाव सब जगहिं सुनावा॥
जग में कगरा जाना भाई। रावन रामचरित्र बनाई॥
पंडित भेष जगत सब मझारी। रामायन सुनि भये सुखारी॥
अंधा अंधे विधि समझावा। घट रामायन गुप्त करावा॥