घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण
भेद – पिंड और ब्रह्मांड का
॥ सोरठा ॥
स्रुति बुँद सिंध मिलाप, आप अधर चढ़ि चाखिया।
भाखा भोर भियान, भेद भान गुरु स्रुति लखा॥
अर्थ—सुरति बोध के अनुभव बिन्दु और परम तत्त्व के सिन्धु के सम्मिलन का आनन्द अन्तरात्मा
(अधर) में प्रवेश करके चखा और मूल तत्त्व के रहस्य (ज्ञान) का अनुभव गुरु रूपी सुरति से प्राप्त
करके दूसरे दिन प्रातः जगने पर (समाधि टूटने पर) उसका वर्णन प्रारम्भ किया॥
॥ छन्द स्रुति सिंध ॥
सत सुरति समझि सिहार साधौ। निरखि नित नैनन रहौ॥
धुनि धधक धीर गंभीर मुरली। परम मन मारग गहौ॥ १॥
सम सील लील अपील पेलै। खेल खुलि खुलि लखि परै॥
नित नेम प्रेम पियार पिउ कर। सुरति सजि पल पल भरै॥
धरि गगन डोरि अपोर१ परखै। पकरि पट पिउ पिउ करै॥ २॥
सर साधि सुन्न सुधारि जानौ। ध्यान धरि जब थिर थुवा२॥
जहँ रूप रेख न भेष काया। मन न माया तन जुवा॥ ३॥
अलि अंत मूल अतूल कँवला। फूल फिरि फिरि धरि धसै॥
तुलसि तार निहार३ सुरति। सैल सत मत मन बसै॥ ४॥
अर्थ—यद्यपि मैं उसे निरन्तर आँखों से देखता हूँ फिर भी, सुरति ध्यान के तत्त्व (सत्य तत्त्व) को
समझकर दिव्य आध्यात्मिक अनुभूति को मैंने साधा है। अनाहत नाद की दशा में सहज गंभीर वंशीनाद
की ध्वनि की उत्तेजना (धधक) से मेरे मन ने उस रहस्यमय मार्ग का अनुगमन किया॥ १॥
शीलयुक्त समत्वभाव में वह विलक्षण भाव (अपेल पेलौ युक्त लीला (खेल) खुलकर दिखाई
पड़ने लगा। नित्य प्रति नियमपूर्वक प्रियतम (निर्गुण ब्रह्म) का प्यार सुरति रूपी सेज पर पल-पल
संचरित है। शून्याकाश से लगी हुई साधना की गाँठरहित (अपोर) प्रेम डोरी को परखते हुए निर्गुण ब्रह्म
रूपी पति के वस्त्रों को थाम्हें आत्मा रूपी प्रेमिका रात-दिन-' पिउ (प्रियतम) पिउ' करती रहती
है॥ २॥
१. जोड़ या गाँठ के।
२. हुआ।
३. मुन्शी देवीप्रसाद जी की पुस्तक में "तार" के आगे "पार" का शब्द भी है।