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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 13

२० / घट रामायण
आत्मसंधान को शून्याकाश में भलीभाँति नियंत्रित करके ध्यान धारणा के बाद जब मन स्थिर हुआ
(जुवा) तब देखा कि उस शीर्ष बिन्दु पर न कोई रूप है, न लक्षण (रेख) हैं, न कोई भेष रचना है, न
कोई शरीर है, न मन है, न माया है, न युवा शरीर है ॥ ३ ॥
उस सहस्रार कमल के मूल के अन्त में एक भ्रमर है जो पुष्प को आधार बनाकर बार-बार उसी में
प्रवेश करना चाहता है। तुलसी साहब कहते हैं कि उस सुरति के सम्बद्ध सूत्र को देखकर सैकड़ों पर्वत
शिखरों से श्रेष्ठ (इस साधना के केन्द्र में) साधना में मेरा मन निवास करता है ॥ ४ ॥
॥ छन्द २ ॥
हिये नैन सैन सुचैन सुन्दरि। साजि स्रुत पिउ पै चली॥
गिर गवन गोह गुहारि मारग। चढ़त गढ़ गगना गली॥ १॥
जहँ ताल तट पट पार प्रीतम। परसि पद आगे अली॥
घट घोर सोर सिहार सुनि के। सिंध सलिता जस मिली॥ २॥
जब ठाट घाट बैराट कीन्हा। मीन जल कँवला कली॥
अली अंस सिंध सिहार अपना। खलक लखि सपना छली॥ ३॥
अस सार पार सम्हारि सूरति। समझि जग जुगजुग अली॥
गुरु ज्ञान ध्यान प्रमान पद बिन। भटकि तुलसी भौ मिली॥ ४॥
अर्थ- अपने हृदय के नेत्रों को, नेत्र भंगिमाओं को अत्यन्त आनन्दपूर्ण करके अर्थात् सुधार कर
सुरति से सजी हुई अपने उस पति से मिलन के लिए पुकारती हुई में चली और अत्यन्त सहजतापूर्वक
पर्वतों (साधना केन्द्रों), की गुफाओं (गौह) समाधि चित्त की विविध अवस्थाओं और मार्गों को
सकलती हुई शून्य गगन के पर्वत शिखर पर चढ़ती है ॥ १ ॥
उस शून्य गगन में स्थित सरोवर के उस पार प्रियतम (ब्रह्म) के पुनः चरण स्पर्श करके सखी
आगे बढ़ी। जहाँ घनघोर घटाओं की ध्वनि (अनाहत नाद) के शोर को सुनकर विराट सृष्टि यह आत्मा
रूपी प्रेमिका उस ब्रह्म से ऐसे मिली-जैसे समुद्र से सरिता (नदी) ॥ २ ॥
उस ब्रह्म सिन्धु के रूपरंग, घाट, वैराट (विशाल) को देखा तो उसमें उस आत्मा को जल की
मछली जैसी या कमल की कली जैसा अपने में अनुभव किया। उसे समस्त संसार, छलमयी स्वप्न की
भाँति दिखने लगा और उस सिंध का । (अपना अशिन् एवं स्वयं को उसका) अंश रूप माना ॥ ३॥
इस संसार के उस पार स्थित ब्रह्म ज्ञान के समुद्र को समझ कर युगों-युगों तक उसका ख्याल
रखो। यही नहीं, सद्गुरु के द्वारा दिखाए गए ज्ञान और ध्यान के प्रमाण के बिना यह आत्मा रूपी युवती
भटक कर पुनः भवसागर में मिल जाती है ॥ ४ ॥
॥ छन्द ३ ॥
अलि अधर धार निहारि निज कै। निकरि सिखर चढ़ावही॥
जहँ गगन गंगा सुरति जमुना। जतन धार बहावही॥ १॥
जहँ पदम प्रेम प्रयाग सुरसरि। धुर गुरू गति गावही॥
जहँ संत आस बिलास बेनी। बिमल अजब अन्हावही॥ २॥
कृत कुमति काग सुभाग कलिमल। कर्म धोइ बहावही॥
हिये हेरि हरष निहारि घर कौ। पार हंस कहावही॥ ३॥