घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण १७
सन्त साहित्य की समग्र अवधारणाएँ इस शब्दावली को सारतत्त्व के रूप में संकलित किया
गया है।
रत्नसागर-तुलसी साहब की तीसरी कृति 'रत्नसागर' है। यह रत्नसागर सम्भवतया उनकी
प्रारम्भिक कृति है। १ इस 'रत्न सागर' का मूल मन्तव्य मानव जाति के उद्धार से सम्बद्ध है। वे मानव
जाति के उद्धार के विविध सन्दर्भों को अनेक शैलियों में रखते हैं जिनमें उनकी कथा शैली बड़ी ही
रोचक है। इस सृष्टि रचना के बीच जीव का जन्म किन कारणों से होता है और किन कारणों से वह
लोक में बंधा हुआ चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता है। जीवन के भटकाव का मुख्य कारण
उसकी कर्म संसक्ति एवं उनसे उत्पन्न संशक्तियाँ हैं। वे अपने प्रिय शिष्य हिरदै के विविध प्रश्नों का उत्तर
देते हुए इस जीवन के बन्धन के विविध पक्षों पर प्रकाश डालते हैं-
करनी करै भोगफल भाई। जोनी घर फल को भुगताई ॥
यह रहनी की बात बिचारा। यामे नहीं होय निरधारा ॥
करनी करै कर्म की बाजी। इनद्री सुख भोजन में राजी ॥
यही कर्म एवं इन्द्री सुख ही संसक्ति एवं बार-बार जन्म धारण का कारण हैं। सन्तों का कर्त्तव्य है,
मनुष्य को समझाकर, साधना की ओर उन्मुख करके तथा सत्संगति के सम्पर्क में प्रेरित करके जन्म-
मृत्यु के बन्धनों से मुक्त करना और अपने शिष्य हिरदै के विविध प्रश्नों के उत्तर द्वारा अपने सिद्धान्तों
का तुलसी साहब ने यहाँ विवेचन किया है। इन्होंने विश्वामित्र-वसिष्ठ, नारद कथा तथा अन्य लौकिक
कथा प्रसंगों द्वारा परमार्थ सत्य का बड़ा ही सटीक एवं सही विश्लेषण किया है। शान्ति, दया, उदारता,
क्षमा, धैर्य, सन्तोष, अहिंसा, विनम्रता एवं साधुता, अहंकारहीनता जैसे मानवीय मूल्यों की स्थापना
करके उनका अनुपालन समाज के लिए आवश्यक बताया है। छुआछूत तथा भेदभाव के समूह विनाश
के सम्बन्ध में इन्होंने जो उक्तियाँ स्थल-स्थल पर कहीं हैं-निश्चित ही आज के सन्दर्भ में उनका विशेष
महत्त्व है। हिरदै तथा स्वयं के बीच संवाद के रूप में लिखी गई यह कृति निश्चित ही मानव मूल्यों की
दृष्टि से आज भी प्रासंगिक है।
सन्त तुलसी साहब का मूल्यांकन
सन्त तुलसी साहब की सबसे बड़ी देन है, सम्पूर्ण मानव समुदाय के लिए-आध्यात्मिक
अन्धानुकरण का पूर्णतः तिरस्कार ॥ वे अध्यात्म के मूल तत्त्व को सन्त साधना से जोड़ते हैं, और
सन्त साधना का वे अर्थ बताते हैं-वाह्याडम्बर शून्य, परम्परा से मुक्त तथा तर्कमंडित धर्मानुशासन।
इसीलिए वे अपने युग के जैन, शिया, सुन्नी, वेदान्त, कर्मकांड, अंधपरम्परावाद के अन्तर्गत मूर्तिपूजन,
विविध धार्मिक उत्सवों एवं कार्यों के आडम्बर आदि के विरोध में खड़े होते हैं। वे स्वयं निर्गुण संत के
समर्थक हैं किन्तु निर्गुण साधक कबीर एवं नानकदेव की धार्मिक तथा व्यावहारिक मान्यताओं में
व्याप्त रूढ़ियों का विरोध करते हैं। वे गुरु नानक देव के सरोवर एवं कबीरदास की चौका साधना की
अपने ढंग से व्याख्या करके उसे वैज्ञानिक एवं तर्क संगत आधार देते हैं। उनका मूल सिद्धान्त है,
परम्परा, पुराणवादिता, लोक प्रचलन, वेदवाद से हटकर उनसे भिन्न तर्क सम्मत साधना का मार्ग
निर्मित करना ही मानव जाति का लक्ष्य है जो समाज के लिए सहज रूप से बोधगम्य हो सके।
पिंड में ब्रह्मांड का स्थिरीकरण-उनका सिद्धान्त इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सम्पूर्ण
आध्यात्मिक चेतना के केन्द्र बिन्दु में स्वयं को रखो, बाहर के संसार का अनुभव और ब्रह्मादि के संदर्भ
केवल वाह्यानुभूति के हैं, आत्मानुभूति के नहीं। अतः आत्मानुभूति के मूलाधार अपने मन, बुद्धि, मति,
विवेक, बोध तथा चैतन्य के द्वारा स्वयं में ही उस परम तत्त्व को जानने की चेष्टा करो जो मन्दिरों में है,
१. बेलविडियर प्रिंटिंग वर्क्स, इलाहाबाद से प्रकाशित।