धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
६२ सोहर
चोवा चंदन अबिर अरगजा, माया की गहबर भारी।
षट दरसन पाखंड छानवे, पकरि किये बेगारी ॥ ३ ॥
लोभ मोह दुइ भरि पिचकारी, छूटत बारम्बारी।
जो कोइ सन्मुख होइ के खेलै, तिनहिँ छीँट लगै कारी ॥ ४ ॥
कुमति गुलाल डारि मुख सीँजै, काम पुटरिया मारी।
सुर नर मुनि अरु पीर औलिया, भीँजि रहे संसारी ॥ ५ ॥
चतुरन फगुआ दे दे छूटे, मूरख को लगै प्यारी।
कहैँ कबीर सुनो हो धर्मनि, निर्गुन ज्ञान गलि१ न्यारी ॥ ६ ॥
॥ सोहर ॥
॥ शब्द १ ॥
साहेब मोर बसत अगमपुर, जहाँ गम न हमार हो ॥टेक॥
साहेब कै ऊँची अटरिया, तरै बिषम बजार हो।
पाप पुन्न दोउ बनियाँ, हीरा लाल बिकाय हो ॥ १ ॥
आठ कुवा नव बावड़ी, सोरह पनिहार हो।
भरलि गगरिया ढरकि गै, ठाढ़ी धन पछिताय हो ॥ २ ॥
छोट मोट डोलिया चँदन कै, छोटे चार कहार हो।
लै कै उतारे वोहि देसवाँ, जहाँ दिस न दुवार हो ॥ ३ ॥
कहैँ कबीर सुनु धर्मन, मेरो वोहि देस हो।
जो रे गये सो बहुरे नहिँ, कस कहत सनेस हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
जाके दुवरवा जमिरिया सो कैसे सोइल हो।
महर महर करै फूल, नीँद नहिँ आइल हो ॥ १ ॥
(१) गली।
काटौ मैंँ पेड़ जमिरिया, तौ पलँगा बिनाइब हो।
तेहि पर सोवै मोर साहेब, बेनिया डोलाइब हो ॥ २ ॥
सास मोर सुतल अगरिया१ ननद गजओबर२ हो।
सैंयाँ मोर सुतल धौरहरिया३, मैंँ कैसे जगाइब हो ॥ ३ ॥
उठो मोरी लहुरी ननदिया, तुम ठाकुराइन हो।
पाँच चोर घर मूसैँ, तो दियना जगाइब हो ॥ ४ ॥
एहि नगरी बसै पिय मोर, तो कोइ न जगावल हो।
नइहर के अभिमानी, पिया नहिँ चीन्हल हो ॥ ५ ॥
इहाँ कै नाच भवनवा, नीक नहिँ लागै हो।
घटहि मेंँ एक खिदुनिया४, नाच तहँ देखब हो ॥ ६ ॥
छोट मोट पेड़ जमिरिया, तो फुलवा लहर करै हो।
तेहि तरे बाजन बाजै, तो सब्द सुनावल हो ॥ ७ ॥
साहेब कबीर कै सोहर, संत जन गावल हो।
सुनहु हो धर्मदास, अमर पद पावल हो ॥ ८ ॥
॥ शब्द ३ ॥
कहँवाँ से जिव आइल, कहँवाँ समाइल हो।
कहँवाँ कइल मुकाम, कहाँ लपटाइल हो ॥ १ ॥
निरगुन से जिव आइल, सर्गुन समाइल हो।
कायागढ़ कइल मुकाम, माया लपटाइल हो ॥ २ ॥
एक बुंद से काया महल उठावल हो।
बुंद परे गलि जाय, पाछे पछितावल हो ॥ ३ ॥
हंस कहै भाइ सरवर, हम उड़ि जाइब हो।
मोर तोर एतन दिदार, बहुरि नहिँ पाइब हो ॥ ४ ॥
(१) बाहर। (२) भीतर। (३) ऊपर। (४) छेद अर्थात् तीसरा तिल।
६४ सोहर
इहवाँ कोइ नहिँ आपन, केहि सँग बोलै हो ।
बिच तरवर मैदान, अकेला (हंसा) डोलै हो ॥ ५ ॥
लख चौरासी भरमि, मनुख तन पाइल हो ।
मानुख जनम अमोल, अपन सोंँ खोइल हो ॥ ६ ॥
साहेब कबीर सोहर गावल, गाइ सुनावल हो ।
सूनहु हो धर्मादास, एही चित चेतहु हो ॥ ७ ॥
॥ शब्द ४ ॥
खेलत रहलूँ अँगनवा, सखी सँग साथी हो ।
आइ गवन निगिचाय, बदन भयो धूमिल हो ॥ १ ॥
पहिले गवनवाँ ऐलूँ, पनियाँ के भेजलन हो ।
देखि कुवाँ कै रूप, मनै पछितैलूँ हो ॥ २ ॥
कुवाँ भीर भई भारी, तो गागर फूटल हो ।
कौन उत्तर घर देँव, हाथ दोउ छूछे हो ॥ ३ ॥
घर मोरी सासु दारुनी, तो ननद हठीली हो ।
केहि से कहब दुख आपन, संगी न साथी हो ॥ ४ ॥
ठाढ़ि मोहारे१ धनि सुसुकै, मनै पछिताइल हो ।
पिया मो से मुखहुँ न बोले, कवन गुन लागल हो ॥ ५ ॥
सजन की ऊँची अटरिया, तो चढ़त लजाऊँ हो ।
कल नहिँ लेत पहरुआ, कवन बिधि जाइब हो ॥ ६ ॥
गल गज मोती कै हार, तो दीपक हाथे हो ।
झमकि के चढ़लूँ अटरिया, पुरुष के पासे हो ॥ ७ ॥
कहैँ कबीर पुकारि, सुनो धर्मे आगर हो ।
बहुत हंस लै साथ, उतरु भव सागर हो ॥ ८ ॥
(१) दरवाजे पर ।
सोहर ६५
॥ राग गारी १ ॥
देवो न देवो प्रभु जन अपने को,
समरथ के गुन गाऔँ किहाँजू।
गगन मँदिल मोरे सजन बसत हैं,
उनहुँ को नेवत बोलाऔँ किहाँजू ॥ १ ॥
काम क्रोध मद लोभ पाँवड़े १.
भीतर भवन बुलाऔँ किहाँजू।
नयन के जल लै चरन पखारौँ,
चित चौका बैठारौँ किहाँजू ॥ २ ॥
करनी कै पातर कथनी कै दोना,
साखी कै सींक लगाऔँ किहाँजू।
भाव कै भात औ दाल दया कै,
सब्द कै बरा बनाऔँ किहाँजू ॥ ३ ॥
मनसा मंडे२ सरस बनाऔँ,
प्रेम कै घिरत चुवाऔँ किहाँजू।
सत कै दूध करनी कै खोवा,
सकर सुमति मिलाऔँ किहाँजू ॥ ४ ॥
सुख पाय जेवैँ सजन हमारे,
स्वाँस कै बायु डोलाऔँ किहाँजू।
सीसा सार भरे जल अमृत,
सो अचवन करवाऔँ किहाँजू ॥ ५ ॥
(१) कालीन या फर्श जो बड़े लोगों के चलने को बिछाया जाता है।
रोटी।
६६ सोहर
पाँच पचीस पकरि नौ नारी,
सजन को गारी गवाओँ किहाँजू ।
तत्त तमोलिन सुघर सुमति ले,
सजन को बीरा खवाओँ किहाँजू ॥ ६ ॥
एकइस खंड महल के भीतर,
निर्भय पलँग बिछाओँ किहाँजू ।
धर्मदास कहे साहेब मोरे,
मुक्ति मनोरथ पाओँ किहाँजू ॥ ७ ॥
॥ राग गारी २ ॥
सतगुरु आये द्वार, सुरति रस बिंजना ।
काहे कै बैठक देउँ, सुरति रस बिंजना ॥ १ ॥
चंदन पीढ़ी बैठक, सुरति रस बिंजना ।
नारी नर चरन पखारो, सुरति रस बिंजना ॥ २ ॥
भात रीँधो रस दूध, सुरति रस बिंजना ।
धोइ मूँग कै दाल, सुरति रस बिंजना ॥ ३ ॥
काहे को थाल परोसाँ, सुरति रस बिंजना ।
काहे कटोरी आन दूध, सुरति रस बिंजना ॥ ४ ॥
सोने कै थार परोसो, सुरति रस बिंजना ।
रूपे कटोरी आन दूध, सुरति रस बिंजना ॥ ५ ॥
जेँ इ लेहु सतगुर पाहुन, सुरति रस बिंजना ।
मुख भर देहु असीस, सुरति रस बिंजना ॥ ६ ॥
पाथर को का पूजै, सुरति रस बिंजना ।
मुख बोलै ना खाय, सुरति रस बिंजना ॥ ७ ॥
साँचे पूजहु साध, सुरति रस बिंजना ।
मुख बोलै औ खाय, सुरति रस बिंजना ॥ ८ ॥
मिश्रित
आइ पिया सुख पाउ, सुरति रस बिंजना ।
करि लेहु सब्द सिँगार, सुरति रस बिंजना ॥ ६ ॥
बिँजना बिँजना¹ सब कहै, सुरति रस बिंजना ।
बिंजन लखे न कोइ, सुरति रस बिंजना ॥१०॥
कहैँ कबीर धर्मदास, सुरति रस बिंजना ।
रहत अमर पुर छाय, सुरति रस बिंजना ॥११॥
मिश्रित का अंग
॥ शब्द १ ॥
गुरू बिन कौन हरै मोरी पीरा ॥ टेक ॥
रहत अलीन मलीन जुगन जुग, राई बिनत पाये एक हीरा १
पाये हीरा रहै नहिँ धीरा, लेइ के चले वोहि पारख तीरा २
सो हीरा साधू सब परखे, तब से भयो मन धीरा ३
धरमदास बिनवै कर जोरी, अजर अमर गुरु पाये कबीरा ४
॥ शब्द २ ॥
आये दीन-दयाल दया कीन्हा ॥ टेक ॥
दीन जानि गुरु समरथ आये, बिमल रूप दरसन दीन्हा १
चरन धोइ चरनामृत लीन्हा, सिंहासन बैठक दीन्हा २
करूँ आरती प्रेम निछावर, तन मन धन अरपन कीन्हा ३
धरमदास पर दाया कीन्हा, सार सब्द सुमिरन दीन्हा ४
॥ शब्द ३ ॥
बरनौँ मैं साहेब तुम्हरे चरना ॥ टेक ॥
संतन सुखदायक लायक प्रभु दुख हरना ॥ १ ॥
(१) विंजन विंजन ।
६८ मिश्रित
सतजुग नाम अचिंत कहाये, खोड़स हंस को दई सरना ॥२॥
त्रेता नाम मुनेन्द्र कहाये, मधुकर बिप्र को दई सरना ॥३॥
द्वापर करुनामय कहलाये, इंद्र मती के दुख हरना ॥४॥
कलजुग नाम कबीर कहाये, धर्मदास अस्तुति बरना ॥५॥
॥ शब्द ४ ॥
ज्ञान की चुनरी धुमल भइ सजनी, मन की न पुरइल आसा हो ।
बारहि बार जीव मोर लरजै, कैसे कटै दिन राता हो ॥१॥
सास दुख सहलौं ननद दुख सहलौं, पिय दुख सहल न जाई हो ।
जागो हो मोरि सासु गोसाँई, पिय मोर चलल बिदेसवाँ हो ॥२॥
पइयाँ परि परि ननदि जगावै, कहै न पावै सनेसवा हो ।
मोर मुख ताको मत जा बिदेसवाँ, हौं मैं चेरि तुम्हार हो ॥३॥
बहियाँ पकरि स्वामी सेजिया बिठावै, जनि रोवो धनियाँ १ हमार हो ।
कहैँ कबीर सुनो धर्मदासा, जुगन जुगन अहिवात२ हो ॥४॥
॥ शब्द ५ ॥
सत नामै जपु जग लड़ने दे ॥ टेक ॥
यह संसार काँट की बारी, अरुझि सरुझि के मरने दे ॥१॥
हाथी चाल चलै मोर साहेब, कुतिया भुँकै तो भुँकने दे ॥२॥
यह संसार भादों की नदिया, डूबि मरै तेहि मरने दे ॥३॥
धरमदास के साहेब कबीरा, पथर पूजै तो पुजने दे ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
नैनन आगे ख्याल घनेरा ॥ टेक ॥
जेहि कारन जग डोलत भरमे,
सो साहेब घट लीन्ह बसेरा ॥१॥
(१) स्त्री । (२) सोहाग ।
मिश्रित ६९
का संझा का प्रात सबेरा,
जहँ देखूँ जहँ साहेब मेरा ॥ २ ॥
अर्ध उर्ध बिच लगन लगी है,
साहेब घट मेंँ कीन्हा डेरा ॥ ३ ॥
साहेब कबीर एक माला दीन्हा,
धरमदास घट ही बिच फेरा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
साहेब मोरे दीन्ही चोलिया नई ॥ टेक ॥
तीन पाँच मोरि चोलिया कै घुंडी,
लागो कुमति सुमतिया की पाती ॥ १ ॥
यह चोलिया मोरे ससुरे से आई,
चोलिया पहिरि धनि भई अलमाती ॥ २ ॥
सुनहु हो मोरी पार परोसिन,
यह चोलिया बिरला जन जानी ॥ ३ ॥
पहिले बियाह मोर भयो सतगुरु से,
चोलिया के बँद मोरे सतगुरु खोली ॥ ४ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
बिसरि गई नइहरवा की बोली ॥ ५ ॥
॥ शब्द ८ ॥
साहेब मोरे पठई चोली अनमोल ॥ टेक ॥
यह चोलिया मोरे ससुरे से आई,
चोलिया पहिरि हम भईँ अतोल ॥ १ ॥
यह चोलिया मेंँ सहस बँद लागे,
चोलिया के बँद मोरे सतगुरु खोल ॥ २ ॥
७० मिश्रित
चोलिया पहिरि धनि चली है गवनवा,
सेत पितंबर लागे हिँडोल ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
नैहर सुपना भयल अब मोर ॥ ४ ॥
॥ शब्द ९ ॥
जागु बहुरिया पहिरु रँग सारी ॥ टेक ॥
जागत भागीँ पाँच कुँआरी,
जनम जनम के ताप निवारी ॥ १ ॥
तजि कुल कानि से होइ रहु न्यारी,
अबके बिछुरे बिपति अति भारी ॥ २ ॥
जो खोलो पिय आय किवारी,
पहिरौँ चीर अमर अति भारी ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
साहेब कबीर मोर गवन निवारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
बरनौँ संत समाज, जिनकी ज्ञान कचहरी ॥ टेक ॥
काया नगर में सुरति जँजीरा, सेत ध्वजा फहराना ।
सहन¹ बिछौना सब्द सिपाही, सतगुरु नाम खजाना ॥ १ ॥
संतोष तख्त पर ज्ञान है राजा, बिबेक भया दीवानी ।
अगमग जोति छत्र सिर ऊपर, मुक्ति भरे जहँ पानी ॥ २ ॥
काम क्रोध को सहज निकाशो, माया कै मूँड़ मुँड़ावो ।
लोभ मोह सब दूरि बहावो, ऐसन अदल चलावो ॥ ३ ॥
सहज को दया बचन करुसीतल, सब को सब्द सुनावो ।
धरमदास बिनवै कर जोरी, समरथ सरना आवो ॥ ४ ॥
(१) बर्दाश्त ।
मिश्रित ७१
॥ शब्द ११ ॥
हमरे का करे हाँसी लोग ॥ टेक ॥
मोरा मन लागा सतगुरु से, भला होय कै खोर¹।
जब से सतगुरु ज्ञान भयो है, चलै न केहु कै जोर ॥ १ ॥
मात रिसाई पिता रिसाई, रिसाय बटोहिया लोग।
ज्ञान खड्ग तिरगुन को मारूँ, पाँच पचीसो चोर ॥ २ ॥
अब तो मोहिं ऐसी बनि आवै, सतगुरु रचा सँजोग।
आवत साध बहुत सुख लागै, जात बियापै रोग ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, सुनु हो बंदी-छोर।
जा को पद त्रयलोक से न्यारा, सो साहेब कस होय ॥ ४ ॥
॥ शब्द १२ ॥
जेहि सुमिरे गुन का भये, जा से कर्म न नासा ॥ टेक ॥
पौंड़त पौंड़त भवजले, काहू पार न पावा।
बूड़ि गये नइया मिलै, कहो केहिक चढ़ावा ॥ १ ॥
स्वाँति बुंद के कारने, चात्रिक चित लावै।
प्यास गये सलिता मिलै, कहो केहि क पियावै ॥ २ ॥
नौ कन्या के कारने, धरो बंक कराला।
कपट रूप पाखंड रच्यो, वोहि पैज सँवारा ॥ ३ ॥
औगुन है सब दास को, गुन साहेब तुम्हारा।
धरमदास बिनती करै, स्वाँसा धन धारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द १३ ॥
सतगुरु कहत नाम गुन न्यारा ॥ टेक ॥
कोइ निर्गुन कोइ सर्गुन गावै, कोइ किरतिम कोइ करता।
लख चौरासी जीव जंतु में, सब घट एकै रमिता ॥१॥
(१) बुरा।
७२ मिश्रित -
सुनो साध निरगुन की महिमा, बूझै बिरला कोई ।
सरगुन फंदे सबै चलत है, सुर नर मुनि सब लोई ॥ २ ॥
निरगुन नाम निअच्छर कहिये, रहै सबन से न्यारा ।
निरगुन सरगुन जम कै फंदा, वोहि कै सकल पसारा ॥ ३ ॥
साहेब कबीर के चरन मनावो, साधुन के सिर-ताजा ।
धरमदास पर दया कीन्हा, बाँह गहे की लाजा ॥ ४ ॥
॥ शब्द १४ ॥
साहेब हमरे सहज लगी डोरी ॥ टेक ॥
यह डोरी मोहिँ सतगुरु दीन्हा,
हमहिँ अधीन अपन करि लीन्हा ॥ १ ॥
यह डोरी मोरे प्रान उबारे,
लै भवसागर पार उतारे ॥ २ ॥
यह डोरी चढ़ि जात गगन मेँ,
निसु दिन साहेब सँग रहत मगन मेँ ॥ ३ ॥
धर्मदास बिनवै कर जोरी,
काल कष्ट से तिनुका तोरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द १५ ॥
साहेब येहि बि
मिश्रित
॥ शब्द १६ ॥
भव सागर नदिया बहुत अगम है,
केहि बिधि उतरौं पारा हो ॥ टेक ॥
यह भव देख जिया मोर काँपै,
नैन बहै जल धारा हो ।
वार पार कछु सूझत नाहीं,
मोह लहर झकझोरा हो ॥ १ ॥
नहिँ देखौँ नाव न देखौँ बेरा,
नहिँ देखौँ खेवनहारा हो ।
येहि औसर प्रभु केकाँ¹ गोहराऔँ,
बूड़त हौं मँझ धारा हो ॥ २ ॥
असी कोस बालू कै रतिया,
असी कोस अँधियारा हो ।
असी चार चौरासी जोजन,
जहँवाँ जम रखवारा हो ॥ ३ ॥
जोग जाप एको नहिँ कीन्हा,
ना गुरु से ब्योहारा हो ।
खाल खैँचि जम भूसा भरिहै,
बढ़ई चलावै जस आरा हो ॥ ४ ॥
अगम भूमि से गुरु चलि आये,
सुनि के सब्द हमारा हो ।
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा,
अपने जनहिँ उबारा हो ॥ ५ ॥
(१) किस को।
१०
४ मिश्रित
॥ शब्द १७ ॥
सइयाँ महरा१, मोर डोलिया फँदावो ॥ टेक ॥
काहे कै तोर डोलिया पालकी,
काहे कै ओहि में बाँस लगावो ॥ १ ॥
आव भाव कै डोलिया पालकी,
सत्त नाम कै बाँस लगावो ॥ २ ॥
प्रेम कै डोर जतन से बाँधो,
ऊपर खलीता२ लाल ओढ़ावो ॥ ३ ॥
ज्ञान दुलीचा भारि बिछावो,
नाम कै तकिया अरध लगावो ॥ ४ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
गगन मँदिल में पिया दुजरावो ॥ ५ ॥
॥ शब्द १८ ॥
पिया परदेसिया, गवन लैजा मोर ॥ टेक ॥
आव भाव का अनवट बिछुआ,
शब्द के घुँघरू उठे घनघोर ॥ १ ॥
तन सारी मन रतन लहँगवा,
ज्ञान की अँगिया भई सरबोर ॥ २ ॥
चारि जना मिलि लेइ चले हैं,
जाइ उतारे जमुनवा के कोर ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
नगरी के लोग कहैँ कुल-बोर ॥ ४ ॥
(१) कहार। (२) ओहार।
मिश्रित ७५
॥ शब्द १९॥
गाँठ परी पिया बोले न हम से ॥ १ ॥
माल मुलुक कछु संग न जैहै,
नाहक बैर कियो है जग से ॥ २ ॥
जो मैं जनितिउँ पिया रिसियै है,
नाहक प्रीति लगाती न जग से ॥ ३ ॥
निसु बासर पिय सँग मैं सूतिउँ,
नैन अलसानी निकरि गये घर से ॥ ४ ॥
जस पनिहारि धरे सिर गागर,
सुरति न टरै बतरावत१ सब से ॥ ५ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
साहेब कबीर को पावै भाग से ॥ ६ ॥
॥ शब्द २० ॥
मेरे मन बसि गये साहेब कबीर ॥ टेक ॥
हिन्दू के तुम गुरू कहाओ, मुसलमान के पीर ।
दोऊ दीन ने झगड़ा माड़ेव, पायौ नहीं सरीर ॥ १ ॥
सील संतोष दया के सागर, प्रेम प्रतीत मति-धीर ।
बेद कितेब मते के आगर, दोउ दीनन के पीर ॥ २ ॥
बड़े बड़े संतन हितकारी, अजरा अमर सरीर ।
धरमदास की बिनय गुसाँईं, नाव लगावो तीर ॥ ३ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अमर लोक से हम चलि आये, आये जगत मँझारा हो ।
स्याही छाप पर्वाना लाये, समरथ के कढ़िहारा हो ॥ १ ॥
जीवन दुखित देखि संसारा, तेहि कारन पग धारा हो ।
बंस बयालिस थाना रोपूँ, जंबू दीप मँझारा हो ॥ २ ॥
(१) बात चीत करती है।
७६ पहाड़ा
दसो मोकाम की भक्ति दृढ़ाऊँ, चौका पान पर्वाना हो ।
बारह पंथ चलैँगे आगे, घर घर बोध पसारा हो ॥ ३ ॥
गुरू सहित सब चेला डूबे, फिर फिर गर्भ मँझारा हो ।
बचन बंस को बीरा पावै, तब होइहै निरबारा हो ॥ ४ ॥
तेरह पीढ़ी ज्ञान रजधानी, चूरामनि औतारा हो ।
उनके अंग छाँह नहिँ होइहै, देह बिदेह अपारा हो ॥ ५ ॥
उनके आगे जुग मति चलिहै, राज नोति उठि जाई हो ।
पाँच सब्द की इच्छा नाहीं, यह गति सब में आई हो ॥ ६ ॥
जब लौँ कौल पूर नहिँ आवै, तब लग भेद छिपावो हो ।
कोटिन करै बहुत को थापै, फेरि काल घर आवै हो ॥ ७ ॥
पाँच हजार पचीस के बीते, सत्त चाल ठहराई हो ।
पारस पान जबै पुनि उगिहै, जग निद्रा मिटि जाई हो ॥ ८ ॥
जो कोइ होय सत्त कै तिनुका, सोई मोहिँ पतियाई हो ।
की तो अमी अंकुरै वा में, की गुरु चरन सिधाई हो ॥ ६ ॥
ना गुरु सरन न नाम की करनी, कैसे हंस कहावै हो ।
बारह पंथ मिलैँगे आगे, छाँड़ कपट चतुराई हो ॥ १०॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, आगम तोहि लखाऊँ हो ।
जो कोइ हंसा होइ हमारा, तिन का देहु लखाई हो ॥ ११॥
॥ पहाड़ा ॥
कोई लोढ़त संत सुआन, काया बन फूलि रहा ॥ टेक ॥
एका एक मिलै गुरु पूरा, मूल मंत्र तब पावै ।
सब साधन की बानी बूझै, मन परतीत बढ़ावै ॥ १ ॥
दूआ दुई तजै मन दुबिधा, रज गुन मन से त्यागै ।
सतगुरु ऊरध१ माहीं निरखै, सोवन से उठि जागै ॥ २ ॥
(१) ऊँचे ।
नाम लीला ७७
तीआ तीन त्रिबेनी संगम, जहाँ अगम अस्थाना।
तन मन की सब त्रिस्ना त्यागै, कोइ हरिजन करै अस्नाना ३
चौआ चार चतुर्भुज सोहै, पाँचवैं पद को धावै।
प्रेम हिँडोला झूला झूलै, उपजै चित अनुरागै ॥ ४ ॥
पाँचे पाँच पचीसो बस करि, साँचे होइ ठहरावै।
इंगला पिंगला सुखमनि सोधै, तब चरनोदक पावै ॥ ५ ॥
छठएँ छैयो चक्रै बेधै, सुन्न भवन मन लावै।
बिगसै कँवल काया के भीतर, तब चंदा दरसावै ॥ ६ ॥
सतएँ सात सत्त धुनि उपजै, धुनि सुनि आनँद बाढ़ी।
सहजै दीनदयाल कृपा-निधि, बूड़त भौजल काढ़ी ॥ ७ ॥
अठएँ आठै अष्ट कँवल में, ऊरध निरखै सोई।
आतम चीन्हि परमातम चीन्है, ताहि तुलै नहिँ कोई ॥ ८ ॥
नवएँ नवो द्वार होइ निरखै, जहँ बरै जगमग जोती।
दामिनि दमकै अमृत बरसै, अजर झरै जहँ मोती ॥ ६ ॥
दसएँ दसम द्वार चढ़ि बैठे, पढ़ि लै एक पहाड़ा।
धरमदास चरनन पड़ि बिनवै, निसु दिन बारम्बारा ॥१०॥
॥ नाम लीला ॥
साहेब अबिचल नाम, दया करि पाइये ॥ टेक ॥
प्रथम बन्दौँ गुरु चरन, सीस संतन को नाऊँ।
सतगुरु होयँ दयाल, तो नाम चरित्र सुनाऊँ ॥
सत्त सुकृत हिरदे बसै, कबहुँ न आवै हारि।
अविगति से परिचै भई, तो आवागवन निवारि ॥१॥
कहा आन की सेव, जीव को भर्म न भाजै।
अलख सरूपी आप, तहाँ अनहद धुनि गाजै ॥
यह धुनि सुनि अबिचल रहो, इत उत मन नहिँ जाय ।
अमृत केरी बुन्द है, सो अमृत माहिँ समाय ॥ २ ॥
प्रथम पुरुष पग धरयो सत्त, सतजुग मेँ आये ।
परमारथ के काज, जीव की बन्दि छोड़ाये ॥
कागा तैं हंसा किया, जाति बरन कुल खोय ।
जम से तिनुका तोरि के, गंज न सकै कोय ॥ ३ ॥
सतजुग गयो व्यतीत, सुनो त्रेता की बानी ।
धरयो मुनिन्द्र को रूप, आप सत सुकृत ज्ञानी ॥
हंसन को परमोधि के, आप रह्यो नीनार ।
नाम प्रतीत बसे जो जिव को, सो जन उतरे पार ॥ ४ ॥
त्रेता गयो व्यतीत, सुनो द्वापर की बानी ।
करुनामय को रूप धरयो, सत सुकृत ज्ञानी ॥
चेतनहारा चेतियो, बहुरि न चेता जाय ।
सत्त सुकृत चीन्हे बिना, काल सबन को खाय ॥ ५ ॥
कलिजुग प्रगट कबीर, काल को देखा जोरा ।
किये कासी प्रस्थान, आप भै बन्दीछोरा ॥
मुनि पंडित सब बादहीँ, कोई न पहुंचे ज्ञान ।
निर्गुन लीला धारि के, आप पुरुष निर्बान ॥ ६ ॥
कलिजुग कर्म अपार, जीव कोइ कहा न मानै ।
सीखे साखी सब्द, उलटि के बाद बखानै ॥
बाद किये पहुँचे नहीँ, मन ममता के जोर ।
लख चौरासी जिया जोनि मेँ, भ्रमै नरक अघोर ॥ ७ ॥
कठिन काल को रूप, अंत कोइ जानि न भाई ।
जब आवै मृतु अंध, जीव कहँ जाय पराई ॥
नाम लीला ७९
नाम बिना बाचै नहीं, केतौ करै उपाथ ।
तीरथ जाय सकल भ्रमि आवै, जम को त्रास न जाय ॥ ८ ॥
बहुत ज्ञान बहु गम्य, बहुत मूरत को पूजै ।
दीपक बरै अनेक, अंध को आँखि न सूझै ॥
बहुतक जुग भरमत फिरै, कितहुँ न पावै दाद ।
सात दीप नौ खंड में, सत्य नाम बिनु बाद ॥ ६ ॥
सतगुरु का उपदेस, संत कोउ बिरला जानै ।
करे तत्त्व का खोज, बहुरि संकट नहिँ आनै ॥
ऐसे सुरति लगाइये, जैसे चन्द चकोर ।
कठिन पड़े सुख दुख सहै, प्रीत निभावै ओर ॥ १० ॥
अविगति अगम अपार, और सब दीसै बाजी ।
पढ़ि पढ़ि बेद कितेब, भुले पंडित औ काजी ॥
अगम गम्य जाने नहीं, बीचहिँ परे भुलाय ।
जैसे ज्वारी जुवा खेलि के, सरबस चले गँवाय ॥ ११॥
नहिँ सागर नहिँ सिखर, नहीं तहँ पवन न पानी ।
नहिँ धरती आकास, नहीं कछु और निसानी ॥
चन्द सूर वा घर नहीं, नहीं दिवस नहिँ राति ।
जहाँ पुरुष आपै बसै, तहँ कुल कर्म न पाँति ॥ १२॥
वहाँ नहीं तीरथ ब्रत, नहिँ तहँ बेद बिचारा ।
नहिँ देवी नहिँ देव, नहीं कछु नेम अचारा ॥
जरा मरन वा घर नहीं, नहीं लाभ नहिँ हान ।
प्रेम मगन हंसा रहै, लौ धरै पुरुष को ध्यान ॥ १३॥
जहाँ पुरुष रहै आप, तहाँ हंसन को बासा ।
तहँ नहिँ माया मोह, नहीं तहँ तृष्ना आसा ॥
८० नाम लीला
हर्ष सोक वा घर नहीं, नहीं कर्म ब्यवहार ।
हंसा परम अनंद में, (सो) छूटे भ्रम जंजार ॥ १४॥
चारो जुग के हंस, सत्य सतलोक सिधाये ।
भ्रमत फिरे सब काग, दूत बैठे रखवाये ॥
मुनि पंडित जोगी जती, घरे काल को ध्यान ।
तीन लोक के बाहरे, कोई न पाये जान ॥ १५॥
भ्रमत फिरे जुग चारि, रूप कीन्हा बिस्तारा ।
अजहुँ न समुझे अंध, परे जम काल की धारा ॥
बहुत भाँति परमोधिया, कोइ कोइ लीन्हा मान ।
आदि अंत के हंस हैं, सो प्रगट भये हैं आन ॥ १६॥
अनजाने को दूरि, जाने को निकट बिराजै ।
सब्द सनेही संत, सोई सब ऊपर छाजै ॥
मगन होय मन को गहै, हंस रूप आनन्द ।
सुमिरन दीनदयाल को, ज्यौँ उड़गन१ में चन्द ॥ १७॥
बहुत गुरू संसार रहत, घर कोइ न बतावै ।
आपन स्वारथ लागि, सीस पर भार चढ़ावै ॥
सार सब्द चीन्हें नहीं, बीचहिँ पर भुलाय ।
सत्त सुकृत चीन्हे बिना, सब जुग काल चबाय ॥ १८॥
यह लीला निर्वान, भेद कोइ बिरला जाने ।
सब जग भरमे डार, मूल कोइ बिरला माने ॥
मूल नाम एक पुरुष है, पुष्कद्वीप में बास ।
सतगुरु मिलैँ तो पाइये, पूरन प्रेम बिलास ॥ १६॥
नाम सनेही होय, दूत जम निकट न आवै ।
परमतत्त्व पहिचानि, सत्त साहेब गुन गावै ॥
(१) तारा ।
मुक्ति लीला ८१
अजर अमर बिनसै नहीं, सुख सागर में बास ।
केवल नाम कबीर है, गावै धनि धर्मदास ॥२०॥
॥ मुक्ति लीला ॥
हीरा जन्म न बारम्बार, समुझि मन चेत हो ॥ टेक ॥
जैसे कीट पतंग पषान, भये पसु पच्छी ।
जल तरंग जल माहिँ, रहे कच्छा औ मच्छी ॥
अंग उघारे रहे सदा, कबहुँ न पावै सुक्ख ।
सत्य नाम जाने बिना, जन्म जन्म बड़ दुक्ख ॥ १ ॥
सीतल पासा ढारि, दाव खेलो संम्हारी ।
जीतौ पक्की सार, आव जनि जैहौ हारी ॥
रामै राम पुकारि के, लीन्हो नरक निवास ।
मूड़ गड़ाय रहे जिव, गर्भ माहिँ दस मास ॥ २ ॥
गर्भ दुक्ख तैं काढ़ि, प्रगट प्रभु बाहर कीन्हो ।
भक्ति अंग को छापि, अंक दस्तक लिखि दीन्हो ॥
वा को नाम बिसरि गयो, जिन पठयो संसार ।
रंचक सुख के कारने, बिसरि गयो निज सार ॥ ३ ॥
नहिँ जाने केहि पुन्य, प्रगट भे मानुष देही ।
मन बच कर्म सुभाव, नाम से कर ले नेही ॥
लख चौरासी भर्मि के, पायो मानुष देह ।
सो मिथ्या कस खोवते, झूठी प्रीति सनेह ॥ ४ ॥
बालक बुद्धि अजान, कछू मन में नहिँ आने ।
खेले सहज सुभाव, जहाँ आपन मन माने ॥
अधर कलोले होइ रह्यो, ना काहू को मान ।
भली बुरी ना चित धरै, बारह बरस समान ॥ ५ ॥
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