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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 98 में से

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पृष्ठ 88

मिश्रित ७५
॥ शब्द १९॥
गाँठ परी पिया बोले न हम से ॥ १ ॥
माल मुलुक कछु संग न जैहै,
नाहक बैर कियो है जग से ॥ २ ॥
जो मैं जनितिउँ पिया रिसियै है,
नाहक प्रीति लगाती न जग से ॥ ३ ॥
निसु बासर पिय सँग मैं सूतिउँ,
नैन अलसानी निकरि गये घर से ॥ ४ ॥
जस पनिहारि धरे सिर गागर,
सुरति न टरै बतरावत१ सब से ॥ ५ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
साहेब कबीर को पावै भाग से ॥ ६ ॥
॥ शब्द २० ॥
मेरे मन बसि गये साहेब कबीर ॥ टेक ॥
हिन्दू के तुम गुरू कहाओ, मुसलमान के पीर ।
दोऊ दीन ने झगड़ा माड़ेव, पायौ नहीं सरीर ॥ १ ॥
सील संतोष दया के सागर, प्रेम प्रतीत मति-धीर ।
बेद कितेब मते के आगर, दोउ दीनन के पीर ॥ २ ॥
बड़े बड़े संतन हितकारी, अजरा अमर सरीर ।
धरमदास की बिनय गुसाँईं, नाव लगावो तीर ॥ ३ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अमर लोक से हम चलि आये, आये जगत मँझारा हो ।
स्याही छाप पर्वाना लाये, समरथ के कढ़िहारा हो ॥ १ ॥
जीवन दुखित देखि संसारा, तेहि कारन पग धारा हो ।
बंस बयालिस थाना रोपूँ, जंबू दीप मँझारा हो ॥ २ ॥
(१) बात चीत करती है।