धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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॥ शब्द ११ ॥
हमरे का करे हाँसी लोग ॥ टेक ॥
मोरा मन लागा सतगुरु से, भला होय कै खोर¹।
जब से सतगुरु ज्ञान भयो है, चलै न केहु कै जोर ॥ १ ॥
मात रिसाई पिता रिसाई, रिसाय बटोहिया लोग।
ज्ञान खड्ग तिरगुन को मारूँ, पाँच पचीसो चोर ॥ २ ॥
अब तो मोहिं ऐसी बनि आवै, सतगुरु रचा सँजोग।
आवत साध बहुत सुख लागै, जात बियापै रोग ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, सुनु हो बंदी-छोर।
जा को पद त्रयलोक से न्यारा, सो साहेब कस होय ॥ ४ ॥
॥ शब्द १२ ॥
जेहि सुमिरे गुन का भये, जा से कर्म न नासा ॥ टेक ॥
पौंड़त पौंड़त भवजले, काहू पार न पावा।
बूड़ि गये नइया मिलै, कहो केहिक चढ़ावा ॥ १ ॥
स्वाँति बुंद के कारने, चात्रिक चित लावै।
प्यास गये सलिता मिलै, कहो केहि क पियावै ॥ २ ॥
नौ कन्या के कारने, धरो बंक कराला।
कपट रूप पाखंड रच्यो, वोहि पैज सँवारा ॥ ३ ॥
औगुन है सब दास को, गुन साहेब तुम्हारा।
धरमदास बिनती करै, स्वाँसा धन धारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द १३ ॥
सतगुरु कहत नाम गुन न्यारा ॥ टेक ॥
कोइ निर्गुन कोइ सर्गुन गावै, कोइ किरतिम कोइ करता।
लख चौरासी जीव जंतु में, सब घट एकै रमिता ॥१॥
(१) बुरा।