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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 98 में से

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पृष्ठ 93

८० नाम लीला
हर्ष सोक वा घर नहीं, नहीं कर्म ब्यवहार ।
हंसा परम अनंद में, (सो) छूटे भ्रम जंजार ॥ १४॥
चारो जुग के हंस, सत्य सतलोक सिधाये ।
भ्रमत फिरे सब काग, दूत बैठे रखवाये ॥
मुनि पंडित जोगी जती, घरे काल को ध्यान ।
तीन लोक के बाहरे, कोई न पाये जान ॥ १५॥
भ्रमत फिरे जुग चारि, रूप कीन्हा बिस्तारा ।
अजहुँ न समुझे अंध, परे जम काल की धारा ॥
बहुत भाँति परमोधिया, कोइ कोइ लीन्हा मान ।
आदि अंत के हंस हैं, सो प्रगट भये हैं आन ॥ १६॥
अनजाने को दूरि, जाने को निकट बिराजै ।
सब्द सनेही संत, सोई सब ऊपर छाजै ॥
मगन होय मन को गहै, हंस रूप आनन्द ।
सुमिरन दीनदयाल को, ज्यौँ उड़गन१ में चन्द ॥ १७॥
बहुत गुरू संसार रहत, घर कोइ न बतावै ।
आपन स्वारथ लागि, सीस पर भार चढ़ावै ॥
सार सब्द चीन्हें नहीं, बीचहिँ पर भुलाय ।
सत्त सुकृत चीन्हे बिना, सब जुग काल चबाय ॥ १८॥
यह लीला निर्वान, भेद कोइ बिरला जाने ।
सब जग भरमे डार, मूल कोइ बिरला माने ॥
मूल नाम एक पुरुष है, पुष्कद्वीप में बास ।
सतगुरु मिलैँ तो पाइये, पूरन प्रेम बिलास ॥ १६॥
नाम सनेही होय, दूत जम निकट न आवै ।
परमतत्त्व पहिचानि, सत्त साहेब गुन गावै ॥
(१) तारा ।