धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमिश्रित ६९
का संझा का प्रात सबेरा,
जहँ देखूँ जहँ साहेब मेरा ॥ २ ॥
अर्ध उर्ध बिच लगन लगी है,
साहेब घट मेंँ कीन्हा डेरा ॥ ३ ॥
साहेब कबीर एक माला दीन्हा,
धरमदास घट ही बिच फेरा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
साहेब मोरे दीन्ही चोलिया नई ॥ टेक ॥
तीन पाँच मोरि चोलिया कै घुंडी,
लागो कुमति सुमतिया की पाती ॥ १ ॥
यह चोलिया मोरे ससुरे से आई,
चोलिया पहिरि धनि भई अलमाती ॥ २ ॥
सुनहु हो मोरी पार परोसिन,
यह चोलिया बिरला जन जानी ॥ ३ ॥
पहिले बियाह मोर भयो सतगुरु से,
चोलिया के बँद मोरे सतगुरु खोली ॥ ४ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
बिसरि गई नइहरवा की बोली ॥ ५ ॥
॥ शब्द ८ ॥
साहेब मोरे पठई चोली अनमोल ॥ टेक ॥
यह चोलिया मोरे ससुरे से आई,
चोलिया पहिरि हम भईँ अतोल ॥ १ ॥
यह चोलिया मेंँ सहस बँद लागे,
चोलिया के बँद मोरे सतगुरु खोल ॥ २ ॥