धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनाम लीला ७७
तीआ तीन त्रिबेनी संगम, जहाँ अगम अस्थाना।
तन मन की सब त्रिस्ना त्यागै, कोइ हरिजन करै अस्नाना ३
चौआ चार चतुर्भुज सोहै, पाँचवैं पद को धावै।
प्रेम हिँडोला झूला झूलै, उपजै चित अनुरागै ॥ ४ ॥
पाँचे पाँच पचीसो बस करि, साँचे होइ ठहरावै।
इंगला पिंगला सुखमनि सोधै, तब चरनोदक पावै ॥ ५ ॥
छठएँ छैयो चक्रै बेधै, सुन्न भवन मन लावै।
बिगसै कँवल काया के भीतर, तब चंदा दरसावै ॥ ६ ॥
सतएँ सात सत्त धुनि उपजै, धुनि सुनि आनँद बाढ़ी।
सहजै दीनदयाल कृपा-निधि, बूड़त भौजल काढ़ी ॥ ७ ॥
अठएँ आठै अष्ट कँवल में, ऊरध निरखै सोई।
आतम चीन्हि परमातम चीन्है, ताहि तुलै नहिँ कोई ॥ ८ ॥
नवएँ नवो द्वार होइ निरखै, जहँ बरै जगमग जोती।
दामिनि दमकै अमृत बरसै, अजर झरै जहँ मोती ॥ ६ ॥
दसएँ दसम द्वार चढ़ि बैठे, पढ़ि लै एक पहाड़ा।
धरमदास चरनन पड़ि बिनवै, निसु दिन बारम्बारा ॥१०॥
॥ नाम लीला ॥
साहेब अबिचल नाम, दया करि पाइये ॥ टेक ॥
प्रथम बन्दौँ गुरु चरन, सीस संतन को नाऊँ।
सतगुरु होयँ दयाल, तो नाम चरित्र सुनाऊँ ॥
सत्त सुकृत हिरदे बसै, कबहुँ न आवै हारि।
अविगति से परिचै भई, तो आवागवन निवारि ॥१॥
कहा आन की सेव, जीव को भर्म न भाजै।
अलख सरूपी आप, तहाँ अनहद धुनि गाजै ॥