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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 98 में से

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पृष्ठ 80

मिश्रित
आइ पिया सुख पाउ, सुरति रस बिंजना ।
करि लेहु सब्द सिँगार, सुरति रस बिंजना ॥ ६ ॥
बिँजना बिँजना¹ सब कहै, सुरति रस बिंजना ।
बिंजन लखे न कोइ, सुरति रस बिंजना ॥१०॥
कहैँ कबीर धर्मदास, सुरति रस बिंजना ।
रहत अमर पुर छाय, सुरति रस बिंजना ॥११॥
मिश्रित का अंग
॥ शब्द १ ॥
गुरू बिन कौन हरै मोरी पीरा ॥ टेक ॥
रहत अलीन मलीन जुगन जुग, राई बिनत पाये एक हीरा १
पाये हीरा रहै नहिँ धीरा, लेइ के चले वोहि पारख तीरा २
सो हीरा साधू सब परखे, तब से भयो मन धीरा ३
धरमदास बिनवै कर जोरी, अजर अमर गुरु पाये कबीरा ४
॥ शब्द २ ॥
आये दीन-दयाल दया कीन्हा ॥ टेक ॥
दीन जानि गुरु समरथ आये, बिमल रूप दरसन दीन्हा १
चरन धोइ चरनामृत लीन्हा, सिंहासन बैठक दीन्हा २
करूँ आरती प्रेम निछावर, तन मन धन अरपन कीन्हा ३
धरमदास पर दाया कीन्हा, सार सब्द सुमिरन दीन्हा ४
॥ शब्द ३ ॥
बरनौँ मैं साहेब तुम्हरे चरना ॥ टेक ॥
संतन सुखदायक लायक प्रभु दुख हरना ॥ १ ॥
(१) विंजन विंजन ।