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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 98 में से

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पृष्ठ 91

यह धुनि सुनि अबिचल रहो, इत उत मन नहिँ जाय ।
अमृत केरी बुन्द है, सो अमृत माहिँ समाय ॥ २ ॥
प्रथम पुरुष पग धरयो सत्त, सतजुग मेँ आये ।
परमारथ के काज, जीव की बन्दि छोड़ाये ॥
कागा तैं हंसा किया, जाति बरन कुल खोय ।
जम से तिनुका तोरि के, गंज न सकै कोय ॥ ३ ॥
सतजुग गयो व्यतीत, सुनो त्रेता की बानी ।
धरयो मुनिन्द्र को रूप, आप सत सुकृत ज्ञानी ॥
हंसन को परमोधि के, आप रह्यो नीनार ।
नाम प्रतीत बसे जो जिव को, सो जन उतरे पार ॥ ४ ॥
त्रेता गयो व्यतीत, सुनो द्वापर की बानी ।
करुनामय को रूप धरयो, सत सुकृत ज्ञानी ॥
चेतनहारा चेतियो, बहुरि न चेता जाय ।
सत्त सुकृत चीन्हे बिना, काल सबन को खाय ॥ ५ ॥
कलिजुग प्रगट कबीर, काल को देखा जोरा ।
किये कासी प्रस्थान, आप भै बन्दीछोरा ॥
मुनि पंडित सब बादहीँ, कोई न पहुंचे ज्ञान ।
निर्गुन लीला धारि के, आप पुरुष निर्बान ॥ ६ ॥
कलिजुग कर्म अपार, जीव कोइ कहा न मानै ।
सीखे साखी सब्द, उलटि के बाद बखानै ॥
बाद किये पहुँचे नहीँ, मन ममता के जोर ।
लख चौरासी जिया जोनि मेँ, भ्रमै नरक अघोर ॥ ७ ॥
कठिन काल को रूप, अंत कोइ जानि न भाई ।
जब आवै मृतु अंध, जीव कहँ जाय पराई ॥