सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 98 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 79

६६ सोहर
पाँच पचीस पकरि नौ नारी,
सजन को गारी गवाओँ किहाँजू ।
तत्त तमोलिन सुघर सुमति ले,
सजन को बीरा खवाओँ किहाँजू ॥ ६ ॥
एकइस खंड महल के भीतर,
निर्भय पलँग बिछाओँ किहाँजू ।
धर्मदास कहे साहेब मोरे,
मुक्ति मनोरथ पाओँ किहाँजू ॥ ७ ॥
॥ राग गारी २ ॥
सतगुरु आये द्वार, सुरति रस बिंजना ।
काहे कै बैठक देउँ, सुरति रस बिंजना ॥ १ ॥
चंदन पीढ़ी बैठक, सुरति रस बिंजना ।
नारी नर चरन पखारो, सुरति रस बिंजना ॥ २ ॥
भात रीँधो रस दूध, सुरति रस बिंजना ।
धोइ मूँग कै दाल, सुरति रस बिंजना ॥ ३ ॥
काहे को थाल परोसाँ, सुरति रस बिंजना ।
काहे कटोरी आन दूध, सुरति रस बिंजना ॥ ४ ॥
सोने कै थार परोसो, सुरति रस बिंजना ।
रूपे कटोरी आन दूध, सुरति रस बिंजना ॥ ५ ॥
जेँ इ लेहु सतगुर पाहुन, सुरति रस बिंजना ।
मुख भर देहु असीस, सुरति रस बिंजना ॥ ६ ॥
पाथर को का पूजै, सुरति रस बिंजना ।
मुख बोलै ना खाय, सुरति रस बिंजना ॥ ७ ॥
साँचे पूजहु साध, सुरति रस बिंजना ।
मुख बोलै औ खाय, सुरति रस बिंजना ॥ ८ ॥