सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 98 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 89

७६ पहाड़ा
दसो मोकाम की भक्ति दृढ़ाऊँ, चौका पान पर्वाना हो ।
बारह पंथ चलैँगे आगे, घर घर बोध पसारा हो ॥ ३ ॥
गुरू सहित सब चेला डूबे, फिर फिर गर्भ मँझारा हो ।
बचन बंस को बीरा पावै, तब होइहै निरबारा हो ॥ ४ ॥
तेरह पीढ़ी ज्ञान रजधानी, चूरामनि औतारा हो ।
उनके अंग छाँह नहिँ होइहै, देह बिदेह अपारा हो ॥ ५ ॥
उनके आगे जुग मति चलिहै, राज नोति उठि जाई हो ।
पाँच सब्द की इच्छा नाहीं, यह गति सब में आई हो ॥ ६ ॥
जब लौँ कौल पूर नहिँ आवै, तब लग भेद छिपावो हो ।
कोटिन करै बहुत को थापै, फेरि काल घर आवै हो ॥ ७ ॥
पाँच हजार पचीस के बीते, सत्त चाल ठहराई हो ।
पारस पान जबै पुनि उगिहै, जग निद्रा मिटि जाई हो ॥ ८ ॥
जो कोइ होय सत्त कै तिनुका, सोई मोहिँ पतियाई हो ।
की तो अमी अंकुरै वा में, की गुरु चरन सिधाई हो ॥ ६ ॥
ना गुरु सरन न नाम की करनी, कैसे हंस कहावै हो ।
बारह पंथ मिलैँगे आगे, छाँड़ कपट चतुराई हो ॥ १०॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, आगम तोहि लखाऊँ हो ।
जो कोइ हंसा होइ हमारा, तिन का देहु लखाई हो ॥ ११॥
॥ पहाड़ा ॥
कोई लोढ़त संत सुआन, काया बन फूलि रहा ॥ टेक ॥
एका एक मिलै गुरु पूरा, मूल मंत्र तब पावै ।
सब साधन की बानी बूझै, मन परतीत बढ़ावै ॥ १ ॥
दूआ दुई तजै मन दुबिधा, रज गुन मन से त्यागै ।
सतगुरु ऊरध१ माहीं निरखै, सोवन से उठि जागै ॥ २ ॥
(१) ऊँचे ।