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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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पृष्ठ 94

मुक्ति लीला ८१
अजर अमर बिनसै नहीं, सुख सागर में बास ।
केवल नाम कबीर है, गावै धनि धर्मदास ॥२०॥
॥ मुक्ति लीला ॥
हीरा जन्म न बारम्बार, समुझि मन चेत हो ॥ टेक ॥
जैसे कीट पतंग पषान, भये पसु पच्छी ।
जल तरंग जल माहिँ, रहे कच्छा औ मच्छी ॥
अंग उघारे रहे सदा, कबहुँ न पावै सुक्ख ।
सत्य नाम जाने बिना, जन्म जन्म बड़ दुक्ख ॥ १ ॥
सीतल पासा ढारि, दाव खेलो संम्हारी ।
जीतौ पक्की सार, आव जनि जैहौ हारी ॥
रामै राम पुकारि के, लीन्हो नरक निवास ।
मूड़ गड़ाय रहे जिव, गर्भ माहिँ दस मास ॥ २ ॥
गर्भ दुक्ख तैं काढ़ि, प्रगट प्रभु बाहर कीन्हो ।
भक्ति अंग को छापि, अंक दस्तक लिखि दीन्हो ॥
वा को नाम बिसरि गयो, जिन पठयो संसार ।
रंचक सुख के कारने, बिसरि गयो निज सार ॥ ३ ॥
नहिँ जाने केहि पुन्य, प्रगट भे मानुष देही ।
मन बच कर्म सुभाव, नाम से कर ले नेही ॥
लख चौरासी भर्मि के, पायो मानुष देह ।
सो मिथ्या कस खोवते, झूठी प्रीति सनेह ॥ ४ ॥
बालक बुद्धि अजान, कछू मन में नहिँ आने ।
खेले सहज सुभाव, जहाँ आपन मन माने ॥
अधर कलोले होइ रह्यो, ना काहू को मान ।
भली बुरी ना चित धरै, बारह बरस समान ॥ ५ ॥
११