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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 98 में से

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पृष्ठ 77

६४ सोहर
इहवाँ कोइ नहिँ आपन, केहि सँग बोलै हो ।
बिच तरवर मैदान, अकेला (हंसा) डोलै हो ॥ ५ ॥
लख चौरासी भरमि, मनुख तन पाइल हो ।
मानुख जनम अमोल, अपन सोंँ खोइल हो ॥ ६ ॥
साहेब कबीर सोहर गावल, गाइ सुनावल हो ।
सूनहु हो धर्मादास, एही चित चेतहु हो ॥ ७ ॥
॥ शब्द ४ ॥
खेलत रहलूँ अँगनवा, सखी सँग साथी हो ।
आइ गवन निगिचाय, बदन भयो धूमिल हो ॥ १ ॥
पहिले गवनवाँ ऐलूँ, पनियाँ के भेजलन हो ।
देखि कुवाँ कै रूप, मनै पछितैलूँ हो ॥ २ ॥
कुवाँ भीर भई भारी, तो गागर फूटल हो ।
कौन उत्तर घर देँव, हाथ दोउ छूछे हो ॥ ३ ॥
घर मोरी सासु दारुनी, तो ननद हठीली हो ।
केहि से कहब दुख आपन, संगी न साथी हो ॥ ४ ॥
ठाढ़ि मोहारे१ धनि सुसुकै, मनै पछिताइल हो ।
पिया मो से मुखहुँ न बोले, कवन गुन लागल हो ॥ ५ ॥
सजन की ऊँची अटरिया, तो चढ़त लजाऊँ हो ।
कल नहिँ लेत पहरुआ, कवन बिधि जाइब हो ॥ ६ ॥
गल गज मोती कै हार, तो दीपक हाथे हो ।
झमकि के चढ़लूँ अटरिया, पुरुष के पासे हो ॥ ७ ॥
कहैँ कबीर पुकारि, सुनो धर्मे आगर हो ।
बहुत हंस लै साथ, उतरु भव सागर हो ॥ ८ ॥
(१) दरवाजे पर ।