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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

सोहर ६५
॥ राग गारी १ ॥
देवो न देवो प्रभु जन अपने को,
समरथ के गुन गाऔँ किहाँजू।
गगन मँदिल मोरे सजन बसत हैं,
उनहुँ को नेवत बोलाऔँ किहाँजू ॥ १ ॥
काम क्रोध मद लोभ पाँवड़े १.
भीतर भवन बुलाऔँ किहाँजू।
नयन के जल लै चरन पखारौँ,
चित चौका बैठारौँ किहाँजू ॥ २ ॥
करनी कै पातर कथनी कै दोना,
साखी कै सींक लगाऔँ किहाँजू।
भाव कै भात औ दाल दया कै,
सब्द कै बरा बनाऔँ किहाँजू ॥ ३ ॥
मनसा मंडे२ सरस बनाऔँ,
प्रेम कै घिरत चुवाऔँ किहाँजू।
सत कै दूध करनी कै खोवा,
सकर सुमति मिलाऔँ किहाँजू ॥ ४ ॥
सुख पाय जेवैँ सजन हमारे,
स्वाँस कै बायु डोलाऔँ किहाँजू।
सीसा सार भरे जल अमृत,
सो अचवन करवाऔँ किहाँजू ॥ ५ ॥
(१) कालीन या फर्श जो बड़े लोगों के चलने को बिछाया जाता है।
रोटी।