धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनाम लीला ७९
नाम बिना बाचै नहीं, केतौ करै उपाथ ।
तीरथ जाय सकल भ्रमि आवै, जम को त्रास न जाय ॥ ८ ॥
बहुत ज्ञान बहु गम्य, बहुत मूरत को पूजै ।
दीपक बरै अनेक, अंध को आँखि न सूझै ॥
बहुतक जुग भरमत फिरै, कितहुँ न पावै दाद ।
सात दीप नौ खंड में, सत्य नाम बिनु बाद ॥ ६ ॥
सतगुरु का उपदेस, संत कोउ बिरला जानै ।
करे तत्त्व का खोज, बहुरि संकट नहिँ आनै ॥
ऐसे सुरति लगाइये, जैसे चन्द चकोर ।
कठिन पड़े सुख दुख सहै, प्रीत निभावै ओर ॥ १० ॥
अविगति अगम अपार, और सब दीसै बाजी ।
पढ़ि पढ़ि बेद कितेब, भुले पंडित औ काजी ॥
अगम गम्य जाने नहीं, बीचहिँ परे भुलाय ।
जैसे ज्वारी जुवा खेलि के, सरबस चले गँवाय ॥ ११॥
नहिँ सागर नहिँ सिखर, नहीं तहँ पवन न पानी ।
नहिँ धरती आकास, नहीं कछु और निसानी ॥
चन्द सूर वा घर नहीं, नहीं दिवस नहिँ राति ।
जहाँ पुरुष आपै बसै, तहँ कुल कर्म न पाँति ॥ १२॥
वहाँ नहीं तीरथ ब्रत, नहिँ तहँ बेद बिचारा ।
नहिँ देवी नहिँ देव, नहीं कछु नेम अचारा ॥
जरा मरन वा घर नहीं, नहीं लाभ नहिँ हान ।
प्रेम मगन हंसा रहै, लौ धरै पुरुष को ध्यान ॥ १३॥
जहाँ पुरुष रहै आप, तहाँ हंसन को बासा ।
तहँ नहिँ माया मोह, नहीं तहँ तृष्ना आसा ॥