धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाटौ मैंँ पेड़ जमिरिया, तौ पलँगा बिनाइब हो।
तेहि पर सोवै मोर साहेब, बेनिया डोलाइब हो ॥ २ ॥
सास मोर सुतल अगरिया१ ननद गजओबर२ हो।
सैंयाँ मोर सुतल धौरहरिया३, मैंँ कैसे जगाइब हो ॥ ३ ॥
उठो मोरी लहुरी ननदिया, तुम ठाकुराइन हो।
पाँच चोर घर मूसैँ, तो दियना जगाइब हो ॥ ४ ॥
एहि नगरी बसै पिय मोर, तो कोइ न जगावल हो।
नइहर के अभिमानी, पिया नहिँ चीन्हल हो ॥ ५ ॥
इहाँ कै नाच भवनवा, नीक नहिँ लागै हो।
घटहि मेंँ एक खिदुनिया४, नाच तहँ देखब हो ॥ ६ ॥
छोट मोट पेड़ जमिरिया, तो फुलवा लहर करै हो।
तेहि तरे बाजन बाजै, तो सब्द सुनावल हो ॥ ७ ॥
साहेब कबीर कै सोहर, संत जन गावल हो।
सुनहु हो धर्मदास, अमर पद पावल हो ॥ ८ ॥
॥ शब्द ३ ॥
कहँवाँ से जिव आइल, कहँवाँ समाइल हो।
कहँवाँ कइल मुकाम, कहाँ लपटाइल हो ॥ १ ॥
निरगुन से जिव आइल, सर्गुन समाइल हो।
कायागढ़ कइल मुकाम, माया लपटाइल हो ॥ २ ॥
एक बुंद से काया महल उठावल हो।
बुंद परे गलि जाय, पाछे पछितावल हो ॥ ३ ॥
हंस कहै भाइ सरवर, हम उड़ि जाइब हो।
मोर तोर एतन दिदार, बहुरि नहिँ पाइब हो ॥ ४ ॥
(१) बाहर। (२) भीतर। (३) ऊपर। (४) छेद अर्थात् तीसरा तिल।