धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
DevanagariHindipublished98 पृष्ठ
पृष्ठ 86, कुल 98 में से
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मिश्रित
॥ शब्द १६ ॥
भव सागर नदिया बहुत अगम है,
केहि बिधि उतरौं पारा हो ॥ टेक ॥
यह भव देख जिया मोर काँपै,
नैन बहै जल धारा हो ।
वार पार कछु सूझत नाहीं,
मोह लहर झकझोरा हो ॥ १ ॥
नहिँ देखौँ नाव न देखौँ बेरा,
नहिँ देखौँ खेवनहारा हो ।
येहि औसर प्रभु केकाँ¹ गोहराऔँ,
बूड़त हौं मँझ धारा हो ॥ २ ॥
असी कोस बालू कै रतिया,
असी कोस अँधियारा हो ।
असी चार चौरासी जोजन,
जहँवाँ जम रखवारा हो ॥ ३ ॥
जोग जाप एको नहिँ कीन्हा,
ना गुरु से ब्योहारा हो ।
खाल खैँचि जम भूसा भरिहै,
बढ़ई चलावै जस आरा हो ॥ ४ ॥
अगम भूमि से गुरु चलि आये,
सुनि के सब्द हमारा हो ।
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा,
अपने जनहिँ उबारा हो ॥ ५ ॥
(१) किस को।
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