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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

१. यमकवग्गो (यमक वर्ग)

१० ] धम्मपदं [ १।२०
( अल्पामपि संहितां भाषमाणो
धर्मस्य भवत्यनुधर्मचारी ।
रागं च द्वेषं च प्रहाय मोहं
सम्यक् प्रजानन् सुविमुक्तचित्तः।
अनुपादान इह वाऽमुत्र वा,
स भागवान् श्रामण्यस्य भवति ॥२०॥)
अनुवाद-चाहे अल्पमात्र ही सहिताका भाषण करे, किन्तु यदि
वह धर्मके अनुसार आचरण करनेवाला हो, राग,
द्वेष, और मोहको त्यागकर, अच्छी प्रकार सचेत और
अच्छी प्रकार मुक्तचित्त हो, यहाँ और वहाँ (दोनों
जगह) बटोरनेवाला न हो; (तो) वह श्रमणपनका भागी
होता है ।
१-यमकवर्ग समाप्त

२—अप्पमादवग्गो
कौशाम्बी (घोषिताराम) - सामावती (रानी)
२१—अप्पमादो अमत-पदं पमादो मच्चुनो पदं ।
अप्पमत्ता न मीयन्ति ये पमत्ता यथा मता ॥१॥
( अप्रमादोऽमृतपदं प्रमादो मृत्योः पदम् ।
अप्रमत्ता न म्रियन्ते ये प्रमत्ता यथा मृताः ॥१॥ )
२२-एतं विसेसतो ञत्वा अप्पमादम्हि पण्डिता ।
अप्पमादे पमोदन्ति अरियानं गोचरे रता ॥२॥
( एवं विशेषतो ज्ञात्वाऽप्रमादे, पण्डिताः ।
अप्रमादे प्रमोद्न्त आर्याणां गोचरे रताः ॥२॥ )
२३-ते झायिनो साततिका निच्चं दळ्ह-परक्कमा ।
फुसन्ति धीरा निब्वाणं योगक्खेमं अनुत्तरं ॥३॥
( ते ध्यायिनः साततिका नित्यं दृढपराक्रमाः ।
स्पृशन्ति धीरा निर्वाणं योगक्षेमं अनुत्तरम् ॥३॥ )
[ ११

१२ ] धम्मपदं [ २।५

अनुवाद—प्रमाद (=आलस्य ) न करना अमृतपद है, और प्रमाद
( करना ) मृत्युपद । अप्रमादी ( वैसे ) नहीं मरते, जैसे
कि प्रमादी मरते हैं। पंडित लोग अप्रमादके विषयमें
इस प्रकार विशेषतः जान, आर्योंके आचरणमें रत हो,
अप्रमादमें प्रमुदित होते हैं। (जो) वह निरन्तर ध्यानरत
निश्चय दृढ़ पराक्रमी हैं, वह धीर अनुपम योग-क्षेम ( आनन्द
मंगल ) वाले निर्वाणको प्राप्त करते हैं ।
राजगृह ( वेणुवन ) कुम्भघोसक
२४—उट्ठानवतो सतिमतो
सु चिकम्मस्स निसम्मकारिणो ।
सञ्‍ञतस्स च धम्मजीविनो
अप्प मत्तस्स यसोऽभिवड्ढति ॥४॥
( उत्थानवतः स्मृतिमन्तः शुचिकर्मणो निशाम्य-कारिणः ।
संयतस्य च धर्मजीविनोऽप्रमत्तस्य यशोभिवर्द्धते ॥४॥ )
अनुवाद—( जो ) उद्योगी, सचेत, शुचि कर्मवाला, तथा सोचकर
काम करनेवाला है, और संयत, धर्मानुसार जीविकावाला
एवं अप्रमादी है, ( उसका ) यश बढ़ता है ।
राजगृह ( वेणुवन ) चुल्लपन्थक ( थेर )
२५—उट्ठानेन'प्पमादेन संञमेन दमेन च ।
दीपं कयिराथ मेधावी यं ओघो नाभिकीरति ॥५॥
( उत्थानेनाऽप्रमादेन संयमेन दमेन च ।
द्वीपं कुर्यात् मेधावी यं ओघो नाभिकिरति ॥५॥ )

२८ ] अप्पमादवग्गो [ १३
अनुवाद—मेधावी (पुरुष) उद्योग, अप्रमाद, संयम, और दम द्वारा
(अपने लिये ऐसा) द्वीप बनावें, जिसे बाढ़ नहीं डुबा सके।
जेतवन बालनक्खतधुट्ठ (होळी)
२६—पमादमनुयुञ्जन्ति बाला दुम्मेधिनो जना ।
अप्पमादञ्च मेधावी धनं सेट्ठं 'व रक्खति ॥६॥
(प्रमादमनुयुञ्जन्ति बाला दुर्मेधसो जनाः ।
अप्रमादं च मेधावी धनं श्रेष्ठमिव रक्षति ॥६॥)
अनुवाद—मूर्ख दुर्मेध जन प्रमादमें लगते हैं; मेधावी श्रेष्ठ धनकी
भाँति अप्रमादकी रक्षा करता है।
२७-मा पमादमनुयुञ्जेथ मा कामरतिसन्थवं ।
अप्पमत्तो हि झायन्तो पप्पोति विपुलं सुखं ॥७॥
(मा प्रमादमनुयुंजीत मा कामरतिसंस्तवम् ।
अप्रमत्तो हि ध्यायन् प्राप्नोति विपुलं सुखम् ॥७॥)
अनुवाद—मत प्रमादमें फँसो, मत कामोंमें रत होओ, मत काम
रतिमें लिप्त हो । प्रमादरहित (पुरुष) ध्यान करते महान्
सुखको प्राप्त होता है।
जेतवन महाकस्सप (थेर)
२८—पमादं अप्पमादेन यदा नुदति पण्डितो ।
पञ्ञापासादमारुह्य असोको सोकिनिं पजं ।
पब्बतट्ठो 'व भूम्मट्ठे धीरो बाले अवेक्खति ॥८॥

१४ ] धम्मपदं [ २।१०
( प्रमादमप्रमादेन यदा नुदति पण्डितः ।
प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोकः शोकिनीं प्रजाम् ।
पर्वतस्थ इव भूमिस्थान् धीरो बालान् अवेक्षते ॥८॥
अनुवाद—पंडित जब अप्रमादसे प्रमादको हटाता है, तो निःशोक
हो शोकाकुल प्रजाको, प्रज्ञारूपी प्रासादपर चढ़कर—
जैसे पर्वतपर खड़ा ( पुरुष ) भूमिपर स्थित ( वस्तु )
को देखता है—( वैसे ही ) धीर ( पुरुष ) अज्ञानियोंको
( देखता है ) ।
जेतवन दो मित्र भिक्षु
२६—अप्पमत्तो पमत्तेसु सुत्तेसु बहुजागरो ।
अबलस्सं 'व सीघस्सो हित्वा याति सुमेधसो ॥६॥
( अप्रमत्तः प्रमत्तेषु सुप्तेषु बहुजागरः ।
अबलाश्वमिव शीघ्राश्वो हित्वा याति सुमेधाः ॥९॥
अनुवाद—प्रमादियोंके बीचमें अप्रमादी, सोतोंके बीचमें बहुत
जागनेवाला, अच्छी बुद्धिवाला ( पुरुष )—जैसे निर्बल घोड़ेको
( पीछे ) छोड़ शीघ्रगामी घोड़ा ( आगे ) चला जाता है—
( वैसे ही जाता है ) ।
वैशाली ( कूटागार ) महाली
३०-अप्पमादेन मघवा देवानं सेट्ठतं गतो ।
अप्पमादं पसंसन्ति पमादो गरहितो सदा ॥१०॥
( अप्रमादेन मघवा देवानां श्रेष्ठतां गतः ।
अप्रमादं प्रशंसन्ति प्रमादो गर्हितः सदा ॥१०॥ )

२।१२ ] अप्पमादवग्गो [ १५
अनुवाद—अप्रमाद (=आलस्य रहित होने ) के कारण इन्द्र देव-
ताओंमें श्रेष्ठ बना। अप्रमादकी प्रशंसा करते हैं, और
प्रमादकी सदा निन्दा होती है ।
जेतवन कोई भिक्षु
३१—अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा ।
सञ्ञोजनं अणुं थूलं डहं अग्गीव गच्छति ॥११॥
( अप्रमादरतो भिक्षुः प्रमादे भयदर्शी वा ।
संयोजनं अणुं स्थूलं दहन् अग्निरिव गच्छति ॥११॥ )
अनुवाद—( जो ) भिक्षु अप्रमादमें रत है, या प्रमादसे भय खाने-
वाला ( हे ), ( वह ), आगकी भाँति छोटे मोटे बन्धनोंको
जलाते हुये जाता है ।
जेतवन ( निगम-वासी ) तिस्स ( थेर )
३२-अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा ।
अभब्बो परिहाणाय निब्बाणस्सेव सन्तिके ॥१२॥
( अप्रमादरतो भिक्षुः प्रमादे भयदर्शी वा ।
अभव्यः परिहाणाय निर्वाणस्यैव अन्तिके ॥१२॥ )
अनुवाद—( जो ) भिक्षु अप्रमादमें रत है, या प्रमादसे भय खाने-
वाला है, उसका पतन होना सम्भव नहीं, ( वह ) निर्वाण-
के समीप है ।
२—अप्रमादवर्ग समाप्त

/ ३—चित्तवग्गो
चालिय पर्वत मेघिय (थेर)
३३-फन्दनं चपलं चित्तं दूरक्खं दुन्निवारयं ।
उजुं करोति मेधावी उसुकारो'व तेजनं ॥१॥
( स्पंदनं चपलं चित्तं दुरक्ष्यं दुर्নিবার्यम् ।
ऋजुं करोति मेधावी इषुकार इव तेजनम् ॥ १ ॥ )
अनुवाद--(इस) चचल, चपल, दुर्-रक्ष्य, दुर्-निवार्य चित्तको मेधावी
(पुरुष, उसी प्रकार) सीधा करता है, जैसे बाण बनाने-
वाला बाणको ।
३४-वारिजो'व थले खित्तो ओकमोकत उब्भतो ।
परिफन्दति'दं चित्तं मारधेय्यं पहातवे ॥२॥
( वारिजं इव स्थले क्षिप्तं उदकौकत उद्धृतम् ।
परिस्पन्दत इदं चित्तं मारधेयं प्रहातुम् ॥ २ ॥)
अनुवाद—जैसे जलाशयसे निकालकर स्थलपर फेंक दी गई मछली
(=वारिज) तड़फड़ाती है, (वैसे ही) मार (=राग,
१६]

३५ ] चित्तवग्गो [ १७
द्वेष, मोह ) के फन्देसे निकलनेके लिए यह चित्त
( तडफडाता है ) ।
श्रावस्ती कोई
३५-दुन्निग्गहस्स लहुनो यत्थ कामनिपातिनो ।
चित्तस्स दमथो साधु चित्तं दन्तं सुखावहं ॥ ३॥
( दुर्निग्रहस्य लघुनो यत्र-काम-निपातिनः ।
चित्तस्य दमनं साधु, चित्तं दान्तं सुखावहम् ॥ ३ ॥ )
अनुवाद—( जो ) कठिनाईसे निग्रह योग्य, शीघ्रगामी, जहाँ
चाहता है वहाँ चला जानेवाला है; ( ऐसे ) चित्तका दमन
करना उत्तम है; दमन किया गया चित्त सुखप्रद होता है ।
श्रावस्ती कोई उत्कण्ठित भिक्षु
३६-सुदुद्दसं सुनिपुणं यत्थ कामनिपातिनं ।
चित्तं रक्खेय्य मेधावी, चित्तं गुत्तं सुखावहं ॥४॥
( सुदुर्दर्शं सुनिपुणं यत्र-कामनिपाति ।
चित्तं रक्षेत् मेधावी, चित्तं गुप्तं सुखावहम् ॥ ४ ॥ )
अनुवाद—कठिनाईसे जानने योग्य, अत्यन्त चालाक, जहाँ चाहे
वहाँ ले जानेवाले चित्तकी, बुद्धिमान् रक्षा करे; सुर-
क्षित चित्त सुखप्रद होता है ।
श्रावस्ती सङ्घरक्खित ( थेर )
३७-दूरङ्गमं एकचरं असरीरं गुहासयं ।
ये चित्तं सञ्ञमेस्सन्ति मोक्खन्ति मारबन्धना ॥५॥
२

१८ ] धम्मपद [ ३७
( दूरंगमं एकचरं ' अशरीरं गुहाशयम् ।
ये चित्तं संयंस्यन्ति मुच्यन्ते मारबन्धनात् ॥ ५ ॥ )
अनुवाद—दूरगामी, अकेला विचरनेवाले, निराकार, गुहाशायी
( इस ) चित्तका, जो संयम करेंगे, वही मारके बन्धनसे
मुक्त होंगे ।
सावत्थी चित्तहत्थ ( थेर )
३८-अनवट्ठितचित्तस्स सद्धम्मं अविजानतो ।
परिप्लवपसादस्स पञ्ञा न परिपूरति ॥६॥
( अनवस्थितचित्तस्य सद्धर्मं अविजानतः ।
परिप्लवप्रसादस्य प्रज्ञा न परिपूर्यते ॥ ६ ॥ )
अनुवाद—जिसका चित्त अवस्थित नहीं, जो सच्चे धर्मको नहीं जानता,
जिसका ( चित्त ) प्रसन्नताहीन है, उसे प्रज्ञा (=परम
ज्ञान ) नहीं मिल सकता ।
३६-अनवस्सुतचित्तस्स अनन्वाहतचेतसो ।
पुञ्जपापपहीणस्स नत्थि जागरतो भयं ॥७॥
( अनवस्स्रुतचित्तस्य अनन्वाहतचेतसः ।
पुण्यपापप्रहीणस्य नास्ति जाग्रतो भयम् ॥ ७॥ )
अनुवाद—जिसका चित्त मलरहित है, जिसका मन अकम्प्य है, जो
पाप-पुण्य-विहीन है, उस सजग रहनेवाले ( पुरुष ) केलिये
भय नहीं ।

२. अप्पमादवग्गो (अप्रमाद वर्ग)

३१९ ] चित्तवग्गो [ १९
श्रावस्ती पाँच सौ विपश्यक भिक्षु
४०—कुम्भूपमं कायमिमं विदित्वा
नगरूपमं चित्तमिदं ठपेत्वा ।
योधेथ मारं पञ्ञायुधेन
जितं च रक्खे अनिवेसनो सिया ॥८॥
( कुम्भोपमं कायमिमं विदित्वा
नगरोपमं चित्तमिदं स्थापयित्वा ।
युध्येत मारं प्रज्ञायुधेन जितं
च रक्षेत् अनिवेशनः स्यात् ॥८॥ )
अनुवाद—इस शरीरको घड़ेके समान ( भंगुर ) जान, इस चित्तको
गढ़ (=नगर)के, समान क़ायम कर, प्रज्ञारूपी हथियारसे
मारसे युद्ध करे । जीतनेके बाद ( अपनी ) रक्षा करे,
( तथा ) आसक्तिरहित होवे ।
श्रावस्ती पूतिगत्त तिस्स ( थेर )
४१—अचिरं वत'यं कायो पठविं अधिसिस्सति ।
छुड्डो अपेतविञ्ञाणो निरत्थं 'व कलिङ्गरं ॥६॥
( अचिरं बतायं कायः पृथिवीं अधिशेष्यते ।
क्षुद्रोऽपेतविज्ञानो निरर्थ इव कलिङ्गरम् ॥९॥ )
अनुवाद—अहो ! यह तुच्छ शरीर शीघ्र ही चेतनारहित हो निरर्थक
काठकी भाँति पृथिवीपर पड़ रहेगा ।

२० ] धम्मपद [ ३।११
कोसल देश नन्द (गोप)
४२-दिसो दिसं यन्तं कयिरा वेरी वा पन वेरिनं ।
मिच्छापणिहितं चित्तं पापियो'नं ततो करे ॥१०॥
( द्विट् द्विषं यत् कुर्यात् वैरी वा पुनः वैरिणम् ।
मिथ्याप्रणिहितं चित्तं पापीयांसं एनं ततः कुर्यात् ॥१०॥ )
अनुवाद—जितनी ( हानि ) शत्रु शत्रु की, और वैरी वैरी की करता
है, झूठे ( मार्गपर ) लगा चित्त उससे अधिक बुराई
करता है।
कोसल देश सोरय्य (थेर)
४३-न तं माता पिता कयिरा अन्ने चापि च जातका ।
सम्मापणिहितं चित्तं सेय्यसो'नं ततो करे ॥११॥
( न तत् मातापितरौ कुर्यातां अन्ये चापि च ज्ञातिकाः ।
सम्यक्प्रणिहितं चित्तं श्रेयांसं एनं ततः कुर्यात् ॥११॥
अनुवाद—जितनी ( भलाई ) न माता-पिता कर सकते हैं, न दूसरे
भाई-बन्धु; उससे ( अधिक ) भलाई ठीक ( मार्गपर )
लगा चित्त करता है।
३—चित्तवर्ग समाप्त

४-पुप्फवग्गो
श्रावस्ती पाँच सौ भिक्षु
४४-को इमं पठविं विजेस्सति यमलोकञ्च इमं सदेवकं ।
को धम्मपदं सुदेसितं कुसलो पुप्फमिव पच्चेस्सति ॥१॥
( क इमां पृथिवीं विजेष्यते यमलोकं च इमं सदेवकम् ।
को धर्मपदं सुदेशितं कुशलः पुष्पमिव प्रचेष्यति ॥१॥ )
अनुवाद—देवताओं सहित उस यमलोक और इस पृथिवीको कौन
विजय करेगा ; सुन्दर प्रकारसे उपदिष्ट धर्मके पदोंको कौन
चतुर (पुरुष) पुष्पकी भाँति चयन करेगा ?
४५-सेखो पठविं विजेस्सति यमलोकञ्च इदं सदेवकं ।
सेखो धम्मपदं सुदेसितं कुसलो पुप्फमिव पच्चेस्सति ॥२॥
( शैक्षः पृथिवीं विजेष्यते यमलोकं च इमं सदेवकम् ।
शैक्षो धर्मपदं सुदेशितं कुशलः पुष्पमिव प्रचेष्यति ॥२॥ )
[ २१

२२ ] धम्मपदं [ ४।४
अनुवाद—शैक्ष¹ देवताओं सहित इस यमलोक और पृथिवीको विजय
करेगा। चतुर शैक्ष सुन्दर प्रकारसे उपदिष्ट धर्मके पदोंको
पुष्पकी भाँति चयन करेगा।
श्रावस्ती मरीचि ( कम्मट्ठानिक थेर )
४६—फेणूपमं कायमिमं विदित्वा
मरीचिधम्मं अभिसम्बुधानो ;
छेत्वान मारस्स पपुप्फकानि
अदस्सनं मच्चुराजस्स गच्छे ॥३॥
(फेनोपमं कायमिमं विदित्वा
मरीचिधर्मं अभिसम्बुधानः ।
छित्त्वा मारस्य प्रपुष्पकाणि
अदर्शनं मृत्युराजस्य गच्छेत् ॥ ३ ॥)
अनुवाद—इस कायाको फेनके समान जान, या ( मरु-) मरीचिका के
समान मान, फन्देको तोडकर, यमराजको फिर न
देखनेवाले बनो।
श्रावस्ती विडूडभ
४७-पुप्फानि हेव पचिनन्तं व्यासत्तमनसं नरम् ।
सुत्तं गामं महोघो'व मच्चू आदाय गच्छति ॥ ४॥
¹ निर्वाणके मार्गपर जो इस प्रकार आरूढ हो गये हैं, कि फिर उनका
उससे पतन नहीं हो सकता, ऐसे पुरुषको शैक्ष कहते हैं। उनके तीन भेद हैं—
स्रोतआपन्न, सकृदागामी, अनागामी ।

४।६ ] पुप्फवग्गो [ २३
(पुष्पाणि ह्येव प्रचिन्वन्तं व्यासक्तमनसं नरम्।
सुप्तं ग्रामं महोध इव मृत्युरादाय गच्छति ॥ ४ ॥
अनुवाद-(राग आदिके) फूलोंको चुननेवाले आसक्तियुक्त मनुष्य-
को मृत्यु (वैसे ही) पकड ले जाती है, जैसे सोये गाँवको
बड़ी बाढ़ ।
श्रावस्ती पतिपूजिका
४८-पुप्फानि हेव पचिनन्तं व्यासत्तमनसं नरं ।
अतित्तं येव कामेसु अन्तको कुरुते वसं ॥५॥
(पुष्पाणि ह्येव प्रचिन्वन्तं व्यासक्तमनसं नरम्
अतृप्तं एव कामेषु अन्तकः कुरुते वशम् ॥ ५ ॥ )
अनुवाद-(राग आदि) फूलोंको चुनते आसक्तियुक्त पुरुषको, (जब कि
अभी उसने) कामोंमें तृप्ति नहीं प्राप्त की (तभी)
यम (अपने) वशमें कर लेता है।
श्रावस्ती (कंजूस) कोसिय सेठ
४६-यथापि भमरो पुप्फं वण्णगन्धं अहेठयं ।
पलेति रसमादाय एवं गामे मुनी चरे ॥६॥
(यथापि भ्रमरः पुष्पं वर्णगन्धं अघ्नन् ।
पलायते रसमादाय, एवं ग्रामे मुनिश्चरेत ॥ ६ ॥ )
अनुवाद-जिस प्रकार भ्रमर फूलके वर्ण और गंधको बिना हानि
पहुँचाये, रसको लेकर चल देता है, वैसे ही गाँवमें
मुनि विचरण करे।

२४ ] धम्मपदं [ ४१९
श्रावस्ती पाठिक ( आजीवक साधु )
५०-न परेस विलोमानि न परेस कताकतं ।
अत्तनो'व अवेक्खेय्य कतानि अकतानि च ॥७॥
( न परेषां विलोमानि न परेषां कृताकृतम् ।
आत्मन एव अवेक्षेत कृतानि अकृतानि च ॥ ७ ॥ )
अनुवाद-न दूसरोके विरोधी ( काम ) करे, न दूसरोंके कृत-अकृत-
के खोजमें रहे, ( आदमीको चाहिये कि वह ) अपने
ही कृत (=किये) और अकृत (=न किये ) की
(खोज करे ) ।
श्रावस्ती छत्तपाणि ( उपासक )
५१-यथापि रुचिरं पुप्फं वण्णवन्तं अगन्धकं ।
एवं सुभासिता वाचा अफला होति अकुब्बतो ॥८॥
( यथापि रुचिरं पुष्पं वर्णवद् अगन्धकम् ।
एवं सुभाषिता वाक् अफला भवति अकुर्वतः ॥ ८ ॥ )
अनुवाद-जैसे रुचिर और वर्णयुक्त ( किन्तु ) गंधरहित फूल है,
वैसे ही ( कथनानुसार ) आचरण न करनेवालेकी सुभाषित
वाणी भी निष्फल है ।
५२-यथापि रुचिरं पुप्फं वण्णवन्तं सगन्धकं ।
एवं सुभासिता वाचा सफला होति कुब्बतो ॥६॥
( यथापि रुचिरं पुष्पं वर्णवत् सगन्धकम् ।
एवं सुभाषिता वाक् सफला भवति कुर्वतः ॥ ९ ॥ )

४।११ ] पुप्फवग्गो [ २५
अनुवाद—जैसे रुचिर वर्णयुक्त और गन्धसहित फूल होता है,
वैसे ही (वचनके अनुसार काम) करनेवालेकी सुभाषित
वाणी सफल होती है ।
श्रावस्ती पूर्वाराम विशाखा (उपासिका)
५३-यथापि पुप्फरासिम्हा कयिरा मालागुणे बहू ।
एवं जातेन मच्चेन कत्तब्बं कुसलं बहुं ॥१०॥
(यथापि पुष्पराशेः कुर्यात् मालागुणान् बहून् ।
एवं जातेन मर्त्येन कर्त्तव्यं कुशलं बहु ॥ १० ॥ )
अनुवाद—जिस प्रकार पुष्पराशिसे बहुतसी मालायें बनाये, उसी
प्रकार उत्पन्न हुये प्राणीको चाहिये कि वह बहुतसे भले
(कर्मोंको) करे ।
श्रावस्ती आनन्द (थेर)
५४-न पुप्फगन्धो पटिवातमेति
न चन्दनं तगरमल्लिका वा ।
सतञ्च गन्धो पटिवातमेति
सब्बा दिसा सप्पुरिसो पवाति ॥११॥
(न पुष्पगन्धः प्रतिवातमेति
न चन्दनं तगर-मल्लिके वा ।
सतां च गन्धः प्रतिवातमेति
सर्वा दिशः सत्पुरुषः प्रवाति ॥११॥)

३. चित्तवग्गो (चित्त वर्ग)

२६ ] धम्मपदं [ ४।१४
अनुवाद—फूलकी सुगंध हवासे उलटी ओर नहीं जाती, न चन्दन,
तगर या चमेली (की गंध ही वैसा करती है);
किन्तु सज्जनोंकी सुगंध हवासे उलटी ओर जाती है,
सत्पुरुष सभी दिशाओंमें (सुगंध) बहाते हैं।
५५-चन्दनं तगरं वापि उप्पलं अथ वस्सिकी।
एतेसं गन्धजातानं सीलगन्धो अनुत्तरो ॥१२॥
(चन्दनं तगरं वापि उत्पलं अथ वार्षिकी।
एतेषां गन्धजातानां शीलगन्धोऽनुत्तरः ॥१२॥)
अनुवाद—चन्दन या तगर, कमल या जूही, इन सभी (की) सुगंधों-
से सदाचारकी सुगंध उत्तम है।
राजगृह (वेणुवन) महाकस्सप
५६—अप्पमत्तो अयं गन्धो या'यं तगरचन्दनी।
यो च सीलवतं गन्धो वाति देवेसु उत्तमो ॥१३॥
(अल्पमात्रोऽयं गन्धो योऽयं तगरचन्दनी।
यश्च शीलवतां गन्धो वाति देवेषु उत्तमः ॥१३॥)
अनुवाद—तगर और चन्दनकी जो यह गंध फैलती है, वह अल्प-
मात्र है; और जो यह सदाचारियोंकी गंध है, (वह) उत्तम
(गंध) देवताओंमें फैलती है।
राजगृह (वेणुवन) गोधिक (थेर)
५७-तेसं सम्पन्नसीलानं अप्पमादविहारिनं ।
सम्मदञ्ञाविमुत्तानं मारो मग्गं न विन्दति ॥१४॥

४।१६ ] पुप्फवग्गो [ २७
(तेषां सम्पन्नशीलानां अप्रमाद-विहारिणाम् ।
सम्यग्-ज्ञा-विमुक्तानां मारो मार्गं न विन्दति ॥१४॥ )
अनुवाद—( जो ) वे सदाचारी निरालस हो विहरनेवाले, यथार्थ
ज्ञान द्वारा मुक्त ( हो गये हैं ), ( उनके ) मार्गको मार
नहीं पकड सकता ।
जेतवन गरहादिन्न
५८-यथा संकारधानस्मिं उज्झितस्मिं महापथे ।
पदुमं तत्थ जायेथ सुचिगन्धं मनोरमं ॥१५॥
( यथा संकारधान उज्झिते महापथे ।
पद्म तत्र जायेत शुचिगन्धं मनोरमम् ॥१५॥ )
५६-एवं संकारभूतेसु अन्धभूते पृथुज्जने ।
अतिरोचति पञ्ञाय सम्मासम्बुद्धसावको ॥१६॥
( एवं संकारभूते अन्धभूते पृथग्जने ।
अतिरोचते प्रज्ञया सम्यक्-संबुद्ध-श्रावकः ॥१६॥ )
अनुवाद—जैसे महापथपर फेंके कूड़ेके ढेरपर मनोरम, शुचिगंध,
गुलाब ( =पद्म ) उत्पन्न होवे, इसी प्रकार कूड़े समान
अन्धे अज्ञजनों ( =पृथग्-जनों ) में सम्यक्-संबुद्ध ( =यथार्थ
ज्ञानी ) का अनुगामी ( अपनी ) प्रज्ञासे प्रकाशमान
होता है ।
४-पुष्पवर्ग समाप्त

५'—बालवग्गो
श्रावस्ती ( जेतवन ) दरिद्र सेवक
६०-दीघा जागरतो रत्ति दीघं सन्तस्स योजनं ।
दीघो बालानं संसारो सद्धम्मं अविजानतं ॥ १॥
( दीर्घा जाग्रतो रात्रिः दीर्घं श्रान्तस्य योजनम् ।
दीर्घो बालानां संसारः सद्धर्मं अविजानताम् ॥१॥ )
अनुवाद—जगतेको रात लम्बी होती है, थकेके लिये योजन लम्बा
होता है, सच्चे धर्मको न जाननेवाले मूढोंके लिये संसार
( = आवागमन ) लम्बा है।
राजगृह सार्द्धविहारी (=शिष्य )
६१-चरञ्चे नाधिगच्छेय्य सेय्यं सदिसमत्तनो ।
एकचरियं दळ्हं कयिरा नत्थि बाले सहायता ॥२॥
( चरन् चेत् नाधिगच्छेत् श्रेयांसं सदृशं आत्मनः ।
एकचर्यां दृढं कुर्यात् नास्ति बाले सहायता ॥२॥ )
२८ ]

५।२ ] बालवग्गो [ २९
अनुवाद—यदि विचरण करते अपने अनुरूप भलेमानुषको न पाये,
तो दृढ़ताके साथ अकेला ही विचरे, मूर्खसे मित्रता
नहीं निभ सकती ।
श्रावस्ती आनन्द ( सेठ )
६२—पुत्ता म'त्थि धनम्म'त्थि इति बालो विहञ्ञति ।
अत्ता हि अत्तनो नत्थि कुतो पुत्तो कुतो धनं ॥३॥
( पुत्रा मे सन्ति धनं मे ऽस्ति इति बालो विहन्यते ।
आत्मा हि आत्मनो नास्ति कुतः पुत्रः कुतो धनम् ॥३॥ )
अनुवाद—"पुत्र मेरा है", "धन मेरा है" ऐसा ( करके ) अज्ञ
( नर ) उत्पीड़ित होता है, जब आत्मा ( = शरीर ) ही
अपना नहीं, तो कहाँसे पुत्र और धन ( अपना होगा ) ।
जेतवन गिरहकट चोर
६३—यो बालो मञ्ञती बाल्यं पण्डितो चापि तेन सो ।
बालो च पण्डितमानी, स वे बालो'ति वुच्चति ॥४॥
( यो बालो मन्यते बाल्यं पण्डितश्चापि तेन स ।
बालश्च पंडितमानी स, वै बाल इत्युच्यते ॥४॥ )
अनुवाद—जो ( कि वह ) अज्ञ होकर ( अपनी ) अज्ञताको जानता
है, इस ( अंश ) से वह पंडित ( = जानकार ) है । वस्तुतः
अज्ञ होकर भी जो पंडित होनेका दम भरता है, वही अज्ञ
( =बाल ) कहा जाता है ।