धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 34, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें४।६ ] पुप्फवग्गो [ २३
(पुष्पाणि ह्येव प्रचिन्वन्तं व्यासक्तमनसं नरम्।
सुप्तं ग्रामं महोध इव मृत्युरादाय गच्छति ॥ ४ ॥
अनुवाद-(राग आदिके) फूलोंको चुननेवाले आसक्तियुक्त मनुष्य-
को मृत्यु (वैसे ही) पकड ले जाती है, जैसे सोये गाँवको
बड़ी बाढ़ ।
श्रावस्ती पतिपूजिका
४८-पुप्फानि हेव पचिनन्तं व्यासत्तमनसं नरं ।
अतित्तं येव कामेसु अन्तको कुरुते वसं ॥५॥
(पुष्पाणि ह्येव प्रचिन्वन्तं व्यासक्तमनसं नरम्
अतृप्तं एव कामेषु अन्तकः कुरुते वशम् ॥ ५ ॥ )
अनुवाद-(राग आदि) फूलोंको चुनते आसक्तियुक्त पुरुषको, (जब कि
अभी उसने) कामोंमें तृप्ति नहीं प्राप्त की (तभी)
यम (अपने) वशमें कर लेता है।
श्रावस्ती (कंजूस) कोसिय सेठ
४६-यथापि भमरो पुप्फं वण्णगन्धं अहेठयं ।
पलेति रसमादाय एवं गामे मुनी चरे ॥६॥
(यथापि भ्रमरः पुष्पं वर्णगन्धं अघ्नन् ।
पलायते रसमादाय, एवं ग्रामे मुनिश्चरेत ॥ ६ ॥ )
अनुवाद-जिस प्रकार भ्रमर फूलके वर्ण और गंधको बिना हानि
पहुँचाये, रसको लेकर चल देता है, वैसे ही गाँवमें
मुनि विचरण करे।