धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० ] धम्मपद [ ३।११
कोसल देश नन्द (गोप)
४२-दिसो दिसं यन्तं कयिरा वेरी वा पन वेरिनं ।
मिच्छापणिहितं चित्तं पापियो'नं ततो करे ॥१०॥
( द्विट् द्विषं यत् कुर्यात् वैरी वा पुनः वैरिणम् ।
मिथ्याप्रणिहितं चित्तं पापीयांसं एनं ततः कुर्यात् ॥१०॥ )
अनुवाद—जितनी ( हानि ) शत्रु शत्रु की, और वैरी वैरी की करता
है, झूठे ( मार्गपर ) लगा चित्त उससे अधिक बुराई
करता है।
कोसल देश सोरय्य (थेर)
४३-न तं माता पिता कयिरा अन्ने चापि च जातका ।
सम्मापणिहितं चित्तं सेय्यसो'नं ततो करे ॥११॥
( न तत् मातापितरौ कुर्यातां अन्ये चापि च ज्ञातिकाः ।
सम्यक्प्रणिहितं चित्तं श्रेयांसं एनं ततः कुर्यात् ॥११॥
अनुवाद—जितनी ( भलाई ) न माता-पिता कर सकते हैं, न दूसरे
भाई-बन्धु; उससे ( अधिक ) भलाई ठीक ( मार्गपर )
लगा चित्त करता है।
३—चित्तवर्ग समाप्त