धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
DevanagariHindipublished213 पृष्ठ
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/ ३—चित्तवग्गो
चालिय पर्वत मेघिय (थेर)
३३-फन्दनं चपलं चित्तं दूरक्खं दुन्निवारयं ।
उजुं करोति मेधावी उसुकारो'व तेजनं ॥१॥
( स्पंदनं चपलं चित्तं दुरक्ष्यं दुर्নিবার्यम् ।
ऋजुं करोति मेधावी इषुकार इव तेजनम् ॥ १ ॥ )
अनुवाद--(इस) चचल, चपल, दुर्-रक्ष्य, दुर्-निवार्य चित्तको मेधावी
(पुरुष, उसी प्रकार) सीधा करता है, जैसे बाण बनाने-
वाला बाणको ।
३४-वारिजो'व थले खित्तो ओकमोकत उब्भतो ।
परिफन्दति'दं चित्तं मारधेय्यं पहातवे ॥२॥
( वारिजं इव स्थले क्षिप्तं उदकौकत उद्धृतम् ।
परिस्पन्दत इदं चित्तं मारधेयं प्रहातुम् ॥ २ ॥)
अनुवाद—जैसे जलाशयसे निकालकर स्थलपर फेंक दी गई मछली
(=वारिज) तड़फड़ाती है, (वैसे ही) मार (=राग,
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