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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

१८ ] धम्मपद [ ३७
( दूरंगमं एकचरं ' अशरीरं गुहाशयम् ।
ये चित्तं संयंस्यन्ति मुच्यन्ते मारबन्धनात् ॥ ५ ॥ )
अनुवाद—दूरगामी, अकेला विचरनेवाले, निराकार, गुहाशायी
( इस ) चित्तका, जो संयम करेंगे, वही मारके बन्धनसे
मुक्त होंगे ।
सावत्थी चित्तहत्थ ( थेर )
३८-अनवट्ठितचित्तस्स सद्धम्मं अविजानतो ।
परिप्लवपसादस्स पञ्ञा न परिपूरति ॥६॥
( अनवस्थितचित्तस्य सद्धर्मं अविजानतः ।
परिप्लवप्रसादस्य प्रज्ञा न परिपूर्यते ॥ ६ ॥ )
अनुवाद—जिसका चित्त अवस्थित नहीं, जो सच्चे धर्मको नहीं जानता,
जिसका ( चित्त ) प्रसन्नताहीन है, उसे प्रज्ञा (=परम
ज्ञान ) नहीं मिल सकता ।
३६-अनवस्सुतचित्तस्स अनन्वाहतचेतसो ।
पुञ्जपापपहीणस्स नत्थि जागरतो भयं ॥७॥
( अनवस्स्रुतचित्तस्य अनन्वाहतचेतसः ।
पुण्यपापप्रहीणस्य नास्ति जाग्रतो भयम् ॥ ७॥ )
अनुवाद—जिसका चित्त मलरहित है, जिसका मन अकम्प्य है, जो
पाप-पुण्य-विहीन है, उस सजग रहनेवाले ( पुरुष ) केलिये
भय नहीं ।