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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

२।१२ ] अप्पमादवग्गो [ १५
अनुवाद—अप्रमाद (=आलस्य रहित होने ) के कारण इन्द्र देव-
ताओंमें श्रेष्ठ बना। अप्रमादकी प्रशंसा करते हैं, और
प्रमादकी सदा निन्दा होती है ।
जेतवन कोई भिक्षु
३१—अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा ।
सञ्ञोजनं अणुं थूलं डहं अग्गीव गच्छति ॥११॥
( अप्रमादरतो भिक्षुः प्रमादे भयदर्शी वा ।
संयोजनं अणुं स्थूलं दहन् अग्निरिव गच्छति ॥११॥ )
अनुवाद—( जो ) भिक्षु अप्रमादमें रत है, या प्रमादसे भय खाने-
वाला ( हे ), ( वह ), आगकी भाँति छोटे मोटे बन्धनोंको
जलाते हुये जाता है ।
जेतवन ( निगम-वासी ) तिस्स ( थेर )
३२-अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा ।
अभब्बो परिहाणाय निब्बाणस्सेव सन्तिके ॥१२॥
( अप्रमादरतो भिक्षुः प्रमादे भयदर्शी वा ।
अभव्यः परिहाणाय निर्वाणस्यैव अन्तिके ॥१२॥ )
अनुवाद—( जो ) भिक्षु अप्रमादमें रत है, या प्रमादसे भय खाने-
वाला है, उसका पतन होना सम्भव नहीं, ( वह ) निर्वाण-
के समीप है ।
२—अप्रमादवर्ग समाप्त