धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१९ ] चित्तवग्गो [ १९
श्रावस्ती पाँच सौ विपश्यक भिक्षु
४०—कुम्भूपमं कायमिमं विदित्वा
नगरूपमं चित्तमिदं ठपेत्वा ।
योधेथ मारं पञ्ञायुधेन
जितं च रक्खे अनिवेसनो सिया ॥८॥
( कुम्भोपमं कायमिमं विदित्वा
नगरोपमं चित्तमिदं स्थापयित्वा ।
युध्येत मारं प्रज्ञायुधेन जितं
च रक्षेत् अनिवेशनः स्यात् ॥८॥ )
अनुवाद—इस शरीरको घड़ेके समान ( भंगुर ) जान, इस चित्तको
गढ़ (=नगर)के, समान क़ायम कर, प्रज्ञारूपी हथियारसे
मारसे युद्ध करे । जीतनेके बाद ( अपनी ) रक्षा करे,
( तथा ) आसक्तिरहित होवे ।
श्रावस्ती पूतिगत्त तिस्स ( थेर )
४१—अचिरं वत'यं कायो पठविं अधिसिस्सति ।
छुड्डो अपेतविञ्ञाणो निरत्थं 'व कलिङ्गरं ॥६॥
( अचिरं बतायं कायः पृथिवीं अधिशेष्यते ।
क्षुद्रोऽपेतविज्ञानो निरर्थ इव कलिङ्गरम् ॥९॥ )
अनुवाद—अहो ! यह तुच्छ शरीर शीघ्र ही चेतनारहित हो निरर्थक
काठकी भाँति पृथिवीपर पड़ रहेगा ।