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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

१५।५ ] सुखवग्गो [ ९१
अनुवाद—वैरियोंके प्रति ( भी ) अवैरी हो, अहो ! हम ( कैसा )
सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; वैरी मनुष्योंके बीच अवैरी
होकर हम विहार करते हैं। भयभीत मनुष्योंमें अभय हो,
अहो ! हम सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; भयभीत मनुष्यों
के बीच निर्भय होकर हम विहार करते हैं । उत्सुकौं
(=आसक्तों) में उत्सुकता-रहित हो० ।
पंचसाला ( ब्राह्मणग्राम, मगध ) मार -
२००-सुसुखं वत ! जीवाम येसं नो नत्थि किञ्चनं ।
पीतिमक्खा भविस्साम देवा आभस्सरा यथा ॥४॥
( सुसुखं वत ! जीवामो येषां नो नास्ति किंचन ।
प्रीतिभक्ष्या भविष्यामो देवा आभास्वरा यथा ॥४॥ )
अनुवाद—जिन हम ( लोगों ) के पास कुछ नहीं, अहो ! वह हम
कितना सुखसे जीवन बिता रहे हैं। हम आभास्वर देवताओं
की भाँति प्रीतिभक्ष्य (=प्रीति ही भोजन है जिनका ) हैं ।
जेतवन कोसलराज
२०१-जयं वेरं पसवति दुक्खं सेति पराजितो ।
उपसन्तो सुखं सेति हित्वा जयपराजयं ॥५॥
( जयो वैरं प्रसूते दुःखं शेते पराजितः ।
उपशान्तः सुखं शेते हित्वा जयपराजयौ ॥५॥ )
अनुवाद—विजय वैरको उत्पन्न करती है, पराजित ( पुरुष ) दुःखकी
( नींद ) सोता है; ( राग आदि दोष जिसके ) शान्त ( हैं,

१२ ] धम्मपदं [ १५/७
वह पुरुष ) जय ओर पराजयको छोड़ सुखकी (नींद)
सोता है।
जेतवन कोई कुलकन्या
२०२—नत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो कलि ।
नत्थि खन्धसमा दुक्खा नत्थि सन्तिपरं सुखं ॥६॥
( नास्ति रागसमोऽग्निः, नास्ति द्वेषसमः कलिः ।
नास्ति स्कन्धसमा दुःखाः, नास्ति शान्तिपरं सुखम् ॥६॥ )
अनुवाद—रागके समान अग्नि नहीं, द्वेषके समान मल नहीं, (पाँच)
स्कन्धो* के (=समुदाय) समान दुःख नहीं, शान्तिसे
बढ़कर सुख नहीं।
आलवी एक उपासक
२०३—जिघच्छा परमा रोगा, सङ्घारा परमा दुखा ।
एतं ञत्वा यथाभूतं निब्बाणं परमं सुखं ॥७॥
( जिघत्सा परमो रोगः, संस्काराः परमं दुःखम् ।
एतद् ज्ञात्वा यथाभूतं निर्वाणं परमं सुखम् ॥७॥ )
अनुवाद—भूख सबसे बड़ा रोग है, संस्कार सबसे बड़े दुःख हैं,

  • रूप, वेदना, सञ्ञा, सस्कार, विञ्ञान यह पाँच स्कन्ध हैं। वेदना, सञ्ञा,
    सस्कार विञ्ञानके अन्दर हैं । पृथिवी, जल, अग्नि, वायु ही रूप स्कध
    है। जिसमें न भारीपन है, और जो न जगह घेरता है, वह विञ्ञान स्कध
    है। रूप (=Matter) और विञ्ञान (=Mind) इन्हींके मेळसे सारा
    ससार बना है।

१५।१० ] सुखवग्गो [ ९३
यह जान, यथार्थ निर्वाणको सबसे बड़ा सुख (कहा
जाता है)।
जेतवन ( पसेनदि कोसलराज )
२०४-आरोग्यपरमा लाभा सन्तुट्ठी परमं धनं ।
विस्सासपरमा ञाती निब्बाणं परमं सुखं ॥८॥
( आरोग्यं परमो लाभः, सन्तुष्टिः परमं धनम् ।
विश्वासः परमा ज्ञातिः, निर्वाणं परमं सुखम् ॥८॥ )
अनुवाद—निरोग होना परम लाभ है, सन्तोष परम धन है, विश्वास
सबसे बड़ा बन्धु है, निर्वाण परम (=सबसे बड़ा) सुख है।
वैशाली तिस्स (थेर)
२०५-पविवेकरसं पीत्वा रसं उपसमस्स च ।
निद्दरो होति निष्पापो धम्मपीतिरसं पिवं ॥६॥
( प्रविवेकरसं पीत्वा रसं उपशमस्य च ।
निर्दरो भवति निष्पापो धर्म प्रीतिरसं पिवन् ॥९॥ )
अनुवाद—एकान्त (चिन्तन)के रस, तथा उपशम (=शान्ति)के
रसको पीकर (पुरुष), निडर होता है, (और) धर्मका
प्रेमरस पानकर निष्पाप होता है।
बेल्लुवग्राम (वेणुग्राम, वैशालीके पास) सक्क (देवराज)
२०६-साधु दस्सनमरियानं सन्निवासो सदा सुखो ।
अदस्सनेन बालानं निच्चमेव सुखी सिया ॥१०॥

९४ ] धम्मपदं [ १५।१२
( साधु दर्शनमार्याणां सन्निवासः सदा सुखः ।
अदर्शनेन बालानां नित्यमेव सुखी स्यात् ॥१०)
२०७-बालसंगतिचारी हि दीघमद्धानं सोचति ।
दुक्खो बालेहि संवासो अमित्तेनेव सब्बदा ।
धीरो च सुखसंवासो ञातीनं 'व समागमो ॥११॥
( बालसंगतिचारी हि दीर्घमध्वानं शोचति ।
दुःखो बालैः संवासोऽमित्रेणैव सर्वदा ।
धीरश्च सुखसंवासो ज्ञातीनामिव समागमः ॥११॥)
अनुवाद—आर्यों* (=सत्पुरुषों) का दर्शन सुन्दर है, सन्तोंके साथ
निवास सदा सुखदायक होता है; मूढ़ोंके न दर्शन होनेसे
(मनुष्य) सदा सुखी रहता है। मूढ़ोंकी संगतिमें रहने-
वाला दीर्घ काल तक शोक करता है, मूढ़ोंका सहवास
शत्रु की तरह सदा दुःखदायक होता है, बन्धुओंके समागम-
की भाँति धीरोंका सहवास सुखद होता है।
वेलुवगाम सक्क (देवराज)
२०८-तस्मा हि धीरं च पञ्ञञ्च बहुस्सुतं च
धोरय्हसीलं वतवन्तमरियं ।
तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं
भजेथ नक्खत्तपथं 'व चन्दिमा ॥१२॥
*निर्वाणके पथपर अविचल रूपसे आरूढ़ स्रोतआपन्न, सकृदागामी,
अनागामी तथा निर्वाण-प्राप्त=अर्हत् इन चार प्रकारके पुरुषोंको आर्य कहते हैं।

१३. लोकवग्गो (लोक वर्ग)

१५।१२ ] सुखवग्गो [ ९५
( तस्माद्धि धीरं च प्राज्ञं च बहुश्रुतं च
धुर्यशीलं व्रतवन्तमार्यम् ।
तं तादृशं सत्पुरुषं सुमेधसं
भजेत नक्षत्रपथमिव चन्द्रमा ॥१२॥)
अनुवाद—इसलिये धीर, प्राज्ञ, बहुश्रुत, उद्योगी, व्रती, आर्य एवं
सुबुद्धि सत्पुरुषका वैसेही सेवन करे, जैसे चन्द्रमा नक्षत्र-
पथका ( सेवन करता है ) ।
१५—सुखवर्ग समाप्त

१६—पियवग्गो
जेतवन तीन भिक्षु
२०९-अयोगे युञ्जमत्तानं योगस्मिञ्च अयोजयं ।
अत्थं हित्वा पियग्गाही पिहेत'त्तानुयोगिनं ॥१॥
(अयोगे युंजन्नात्मानं योगे चायोजयन् ।
अर्थं हित्वा प्रिय-ग्राही स्पृहयेदात्मानुयोगिनम् ॥१॥)
२१०-मा पियेहि समागच्छि अप्पियेहि कदाचनं ।
पियानं अदस्सनं दुक्खं अप्पियानञ्च दस्सनं ॥२॥
(मा प्रियैः समागच्छ, अप्रियैः कदाचन ।
प्रियाणां अदर्शनं दुःखं, अप्रियाणां च दर्शनम् ॥२॥)
२११-तस्मा पियं न कयिराथ पियापायो हि पापको ।
गन्था तेसं न विज्जन्ति येसं नत्थि पियाप्पियं ॥३॥
(तस्मात् प्रियं न कुर्यात्, प्रियापायो हि पापकः ।
ग्रन्थाः तेषां न विद्यन्ते येषां नास्ति प्रियाप्रियम् ॥३॥)
९६]

१६।५ ] पियवग्गो [ ९७
अनुवाद—अयोग(=अनासक्ति) में अपनेको लगानेवाले, योग
(=आसक्ति) में न योग देनेवाले, अर्थ (=स्वार्थ) छोड
प्रियका ग्रहण करनेवाले आत्माऽनुयोगी (पुरुष) की स्पृहा
करे । प्रियोंका संग मत करो, और न कभी अप्रियों ही
(का संग करो), प्रियोका न देखना दुःखद् होता है,
और अप्रियोंका देखना (भी)। इसलिये प्रिय न बनावे,
प्रियका नाश बुरा (लगता है); उनके (दिलमें) गाँठ
नहीं पडती, जिनके प्रिय अप्रिय नहीं होते ।
जेतवन कोई कुटुम्बी
२१२-पियतो जायते सोको पियतो जायते भयं ।
पियतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ? ॥४॥
(प्रियतो जायते शोकः प्रियतो जायते भयम् ।
प्रियतो विप्रमुक्तस्य नास्ति शोकः कुतो भयम् ?॥४॥)
अनुवाद—प्रिय (वस्तु) से शोक उत्पन्न होता है, प्रियसे भय उत्पन्न
होता है; प्रिय(के बन्धन) से जो मुक्त है, उसे शोक
नहीं है, फिर भय कहाँसे (हो) ?
जेतवन विशाखा (उपासिका)
२१३-पेमतो जायते सोको पेमतो जायते भयं ।
पेमतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ? ॥५॥
(प्रेम्तो जायते शोकः प्रेम्तो जायते भयम् ।
प्रेम्तो विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ?॥५॥
७

९८ ] धम्मपदं [ १६।८
अनुवाद—प्रेमसे शोक उत्पन्न होता है, प्रेमसे भय उत्पन्न होता है,
प्रेमसे मुक्तको शोक नहीं, फिर भय कहाँसे ?
वैशाली (कूटागारशाला) लिच्छवि लोग
२१४-रतिया जायते सोको रतिया जायते भयं ।
रतिया विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ॥६॥
(रत्या जायते शोको रत्या जायते भयम् ।
रत्या विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ॥६॥)
अनुवाद—रति(=राग) से शोक उत्पन्न होता है, रतिसे भय उत्पन्न
होता है० ।
जेतवन अनित्यगन्धकुमार
२१५-कामतो जायते सोको कामतो जायते भयं ।
कामतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ॥७॥
(कामतो जायते शोकः कामतो जायते भयम् ।
कामतो विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ? ॥७॥)
अनुवाद—कामसे शोक उत्पन्न होता है० ।
जेतवन कोई ब्राह्मण
२१६-तणहाय जायते सोको तणहाय जायते भयं ।
तणहाय विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ?॥८॥
(तृष्णाया जायते शोकः तृष्णाया जायते भयम् ।
तृष्णाया विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ? ॥८॥)

१६।११ ] पियवग्गो [ ९९

अनुवाद—तृष्णासे शोक उत्पन्न होता है० ।
राजगृह (वेणुवन) पाँच सौ बालक
२१७–सीलदस्सनसम्पन्नं धम्मट्ठं सच्चवादिनं ।
अत्तनो कम्म कुब्बानं तं जनो कुरुते पियं ॥६॥
( शीलदर्शनसम्पन्नं धर्मिष्ठं सत्यवादिनम् ।
आत्मनः कर्म कुर्वाणं तं जनः कुरुते प्रियम् ॥९॥ )
अनुवाद—जो शील (=आचरण) और दर्शन (=विद्या) से सम्पन्न,
धर्ममें स्थित, सत्यवादी और अपने कामको करनेवाला है,
उस (पुरुष) को लोग प्रेम करते हैं ।
जेतवन (अनागामी)
२१८–छन्दजातो अनक्खाते मनसा च फुटो सिया ।
कामेसु च अप्पटिबद्धचित्तो उद्धंसोतो 'ति वुच्चति ॥१०॥
( छन्दजातोऽनाख्याते मनसा च स्फुरितः स्यात् ।
कामेषु चाऽप्रतिबद्धचित्त ऊर्ध्वस्रोता इत्युच्यते ॥१०॥ )
अनुवाद—जो अकथ्य (-वस्तु=निर्वाण) का अभिलाषी है, (उसमें)
जिसका मन लगा है, कामो(=भोगों) में जिसका चित्त बद्ध
नहीं, वह ऊर्ध्वस्र्रोत कहा जाता है ।
ऋषिपत्तन नन्दियपुत्त
२१६–चिरप्पवासिं पुरिसं दूरतो सोत्थिमागतं ।
ञातिमित्ता सुहज्जा च अभिनन्दन्ति आगतं ॥११॥

१०० ] धम्मपदं [ १६।१२
( चिरप्रवासिनं पुरुषं दूरतो स्वस्त्यागतम् ।
ज्ञातिमित्राणि सुहृदश्चाऽभिनन्दन्त्यागतम् ॥११॥ )
२२०--तथेव कतपुञ्ञम्पि अस्मा लोका परं गतं ।
पुञ्ञानि पतिगण्हन्ति पियं ञातीव आगतं ॥१२॥
( तथैव कृतपुण्यमप्यस्मात् लोकात् परं गतम् ।
पुण्यानि प्रतिगृह्णन्ति प्रियं ज्ञातिमिवागतम् ॥१२॥ )
अनुवाद--चिर-प्रवासी (=चिर काल तक परदेशमें रहे) दूर (देश)
से सानन्द लौटे पुरुषका, जातिवाले, मित्र और सुहृद् अभि-
नन्दन करते हैं; इसी प्रकार पुण्यकर्मा (पुरुष) को इस
लोकसे पर(लोक) में जानेपर, (उसके) पुण्य (कर्म)
प्रिय जाति(वालों) की भाँति स्वीकार करते हैं।
१६-प्रियवर्ग समाप्त

१४. बुद्धवग्गो (बुद्ध वर्ग)

१७—कोधवग्गो
कपिलवस्तु ( न्यग्रोधाराम ) रोहिणी
२२१-कोधं जहे विप्पजहेय्य मानं
संयोजनं सब्बमतिकम्मेय्य ।
तं नाम-रूपस्मिं असज्जमानं
अकिञ्चनं नानुपतन्ति दुक्खा ॥ १॥
(क्रोधं जह्याद् विप्रजह्यात् मानं
संयोजनं सर्वमतिक्रामेत् ।
तं नाम-रूपयोरसज्यमानं
अकिंचनं नाऽनुपतन्ति दुःखानि ॥१॥)
अनुवाद—क्रोधको छोड़े, अभिमानका त्याग करे, सारे संयोजनों
(=बंधनों) से पार हो जाये, ऐसे नाम-रूपमें आसक्त न
होनेवाले, तथा परिग्रहरहित (पुरुष)को दुःख संताप
नहीं देते।

१०२ ] धम्मपदं [ १७।४
आळवी ( अग्गाळव चैत्य ) कोई भिक्षु
२२२-यो वे उप्पतितं कोधं रथं भन्तं 'व धारये ।
तमहं सारथिं ब्रूमि, रस्मिग्गाहो इतरो जनो ॥२॥
( यो वै उत्पतितं क्रोधं रथं भ्रान्तमिव धारयेत् ।
तमहं सारथिं ब्रवीमि, रश्मिग्राह इतरो जनः ॥२॥ )
अनुवाद—जो चढ़े क्रोधको भ्रमण करते रथकी भाँति पकड़ ले,
उसे मैं सारथी कहता हूँ, दूसरे लोग लगाम पकड़नेवाले
( मात्र ) हैं ।
राजगृह ( वेणुवन ) उत्तरा ( उपासिका )
२२३-अक्कोधेन जिने कोधं असाधुं साधुना जिने ।
जिने कदरियं दानेन सच्चेन अलिकवादिनं ॥३॥
( अक्रोधेन जयेत् क्रोधं, असाधुं साधुना जयेत् ।
जयेत् कदर्यं दानेन सत्येनाऽलीकवादिनम् ॥३॥ )
अनुवाद—अक्रोधसे क्रोधको जीते, असाधुको साधु (=भलाई ) से
जीते, कृपणको दानसे जीते, झूठ बोलनेवालेको सत्यसे
( जीते ) ।
जेतवन महामोग्गलान ( थेर )
२२४-सच्चं भणे न कुज्झेय्य, दज्जा'प्पस्मिम्पि याचितो ।
एतेहि तीहि ठानेहि गच्छे देवान सन्तिके ॥४॥
( सत्यं भणेत् न क्रुध्येत्, दद्यादल्पेऽपि याचितः ।
एतैस्त्रिभिः स्थानैः गच्छेद् देवानामान्तके ॥४॥ )

१७६ ] कोधवग्गो [ १०३
अनुवाद—सच बोले, क्रोध न करे, थोडा भी माँगनेपर दे, इन तीन
बातोसे ( पुरुष ) देवताओके पास जाता है ।
साकेत (=अयोध्या ) ब्राह्मण
२२५-अहिंसका ये मुनयो निच्चं कायेन संवुता ।
ते यन्ति अच्चुतं ठानं यत्थ गन्त्वा न सोचरे ॥५॥
( अहिंसका ये मुनयो नित्यं कायेन संवृताः ।
ते यन्ति अच्युतं स्थानं यत्र गत्वा न शोचन्ति ॥५॥ )
अनुवाद—जो मुनि ( लोग ) अहिंसक, सदा कायामें संयम करनेवाले
हैं, वह ( उस ) अच्युत स्थान (=जिस स्थान पर पहुँच
फिर गिरना नहीं होता )को प्राप्त होते हैं, जहाँ जाकर
फिर नहीं शोक किया जाता ।
राजगृह ( गृध्रकूट ) राजगृह-श्रेष्ठीका पुत्र
२२६-सदा जागरमानानं अहोरत्तानुसिक्खिनं ।
निब्बाणं अधिमुत्तानं अत्थं गच्छन्ति आसवा ॥६॥
( सदा जाग्रतां अहोरात्रं अनुशिक्षमाणानाम् ।
निर्वाणं अधिमुक्तानां अस्तं गच्छन्ति आस्रवाः ॥६॥ )
अनुवाद—जो सदा जागता (=सचेत ) रहता है, रातदिन ( उत्तम )
सीख सीखनेवाला होता है, और निर्वाण ( प्राप्त कर )
मुक्त हो गया है, उसके आस्रव (=चित्त मल ) अस्त हो
जाते हैं ।

१०४ ] धम्मपदं [ १७।९
जेतवन अतुल (उपासक)
२२७–पोराणमेतं अतुल ! नेतं अज्जतनामिव ।
निन्दन्ति तुण्हीमासीनं निन्दन्ति बहुभाणिनं ।
मितभाणिनम्पि निन्दन्ति
नत्थि लोके अनिन्दितो ॥७॥
( पुराणमेतद् अतुल ! नैतद् अद्यतनमेव ।
निन्दन्ति तूष्णीमासीनं निन्दन्ति बहुभाणिनम् ।
मितभाणिनमपि निन्दन्ति नाऽस्ति लोकेऽनिन्दितः ॥७॥ )
२२८–न चाहु न च भविस्सन्ति न चेतरहि विज्जति ।
एकन्तं निन्दितो पोसो, एकन्तं वा पसंसितो ॥८॥
( न चाऽभूत् न च भविष्यति न चैतर्हि विद्यते ।
एकान्तं निन्दितः पुरुष एकान्तं वा प्रशंसितः ॥८॥ )
अनुवाद—हे अतुल ! यह पुरानी बात है, आजकी नहीं—(लोग)
चुप बैठे हुये की निन्दा करते हैं, और बहुत बोलनेवालेकी
भी, मितभाषीकी भी निन्दा करते हैं; दुनियामें अनिन्दित
कोई नहीं है । बिल्कुल ही निन्दित या बिल्कुल ही प्रशंसित
पुरुष न था, न होगा, न आजकल है ।
जेतवन अतुल (उपासक)
२२९–यञ्चे विञ्ञू पसंसन्ति अनुविच्च सुवे सुवे ।
अच्छिद्दवुत्तिं मेधाविं पञ्ञासीलसमाहितं ॥६॥

१७।११ ] कोधवग्गो [ १०५
( यञ्चेद् विज्ञाः प्रशंसन्ति अनुविच्च श्वः श्वः ।
अच्छिद्रवृत्तिं मेधाविनं प्रज्ञाशीलसमाहितम् ॥९॥ )
२३०-नेक्खं जम्बोनदस्सेव को तं निन्दितुमर्हति ।
देवापि तं पसंसन्ति ब्रह्मणाऽपि पसंसितो ॥१०॥
( निष्कं जाम्बूनदस्येव कस्तं निन्दितुमर्हति ।
देवा अपि तं प्रशंसन्ति ब्रह्मणाऽपि प्रशंसितः ॥१०॥ )
अनुवाद—अपने अपने (दिलमें) जान कर विज्ञ लोग अच्छिद्र वृत्ति
(=दोषरहित स्वभाववाले) मेधावी, प्रज्ञा-शील-संयुक्त
जिस (पुरुष)की प्रशंसा करते हैं; जाम्बूनद (सुवर्ण)
की अशर्फीके समान उसकी कौन निन्दा कर सकता है;
देवता भी उसकी प्रशंसा करते हैं, ब्रह्माद्वारा भी वह
प्रशंसित होता है।
वेणुवन वज्जिप (भिक्षु)
२३१-कायप्पकोपं रक्खेय्य कायेन संवुतो सिया ।
कायदुच्चरितं हित्वा कायेन सुचरितं चरे ॥११॥
( कायप्रकोपं रक्षेत् कायेन संवृतः स्यात् ।
कायदुश्चरितं हित्वा कायेन सुचरितं चरेत् ॥११॥ )
२३२-वचीपकोपं रक्खेय्य वाचाय संवुतो सिया ।
वची दुच्चरितं हित्वा वची सुचरितं चरे ॥१२॥
( वाचः प्रकोपं रक्षेद् वाचा संवृतः स्यात् ।
वचो दुश्चरितं हित्वा वाचा सुचरितं चरेत् ॥१२॥ )

१०६ ] धम्मपदं [ १७।१४
२३३-मनोप्पकोपं रक्खेय्य मनसा संवुतो सिया ।
मनोदुच्चरितं हित्वा मनसा सुचरितं चरे ॥१३॥
(मनः प्रकोपं रक्षेत् मनसा संवृतः स्यात् ।
मनोदुश्चरितं हित्वा मनसा सुचरितं चरेत् ॥१३॥ )
२३४-कायेन संवृता धीरा अथो वाचाय संवृता ।
मनसा संवृता धीरा ते वे सुपरिसंवुता ॥१४॥
( कायेन संवृता धीरा अथ वाचा संवृताः ।
मनसा संवृता धीराः ते वै सुपरिसंवृता ॥१४॥ )
अनुवाद—कायाकी चञ्चलतासे रक्षा करे, कायासे संयत रहे, कायिक
दुश्चरितको छोड़ कायिक सुचरितका आचरण करे । वाणी
की चंचलतासे रक्षा करे, वाणीसे संयत रहे, वाचिक
दुश्चरितको छोड, वाचिक सुचरितका आचरण करे । मनकी
चंचलतासे रक्षा करे, मनसे सयत रहे, मानसिक दुश्चरितको
छोड, मानसिक सुचरितका आचरण करे ।
१७-क्रोधवर्ग समाप्त

१८-मलवग्गो
जेतवन गोघातक-पुत्र
२३५-पाण्डुपलासो'वदानिसि, यमपुरिसापि च तं उपट्ठिता।
उय्योगमुखे च तिट्ठसि पाथेय्यम्पि च ते न विज्जति ॥१॥
(पाण्डुपलासमिवेदानीमसि यमपुरुषाअपि चत्वां उपस्थिताः।
उद्योगमुखे च तिष्ठसि पाथेयमपि च ते न विद्यते ॥१॥)
२३६-सो करोहि दीपमत्तनो खिप्पं वायम पण्डितो भव ।
निद्धन्तमलो अनङ्गणो दिब्बं अरियभूमिमेहिसि ॥२॥
(स कुरु द्वीपमात्मनः क्षिप्रं व्यायच्छस्व पण्डितो भव ।
निर्धूतमलोऽनंगणो दिव्यां आर्यभूमिं एष्यसि ॥२॥)
अनुवाद-पीले पत्तेके समान इस वक्त तू है, यमदूत तेरे पास आ
खडे हैं, तू प्रयाणके लिये तय्यार है, और पाथेय तेरे पास
कुछ नहीं है। सो तू अपने लिये द्वीप ( = रक्षास्थान )
बना, उद्योग कर, पंडित बन, मल प्रक्षालित कर, दोष-
रहित बन आर्योंके दिव्य पदको पायेगा।

१०८ ] धम्मपदं [ १८।५
जेतवन गोघातक-पुत्र ।
२३७-उपनीतवयो च दानिऽसि सम्पयातोसि यमस्स सन्तिके ।
वासोपि च ते नत्थि अन्तरा पाथेय्यम्पि च तेन विज्जति ॥३॥
( उपनीतवयाइदानीमसि
सम्प्रयातोऽसि यमस्याऽन्तिके ।
वासोऽपि च ते नाऽस्ति अन्तरा
पाथेयमपि च ते न विद्यते ॥३॥
२३८-सो करोहि दीपमत्तनो खिप्पं वायम पण्डितो भव ।
निद्धन्तमलो अनङ्गणो न पुन जातिजरं उपेहिसि ॥४॥
( स कुरु द्वीपमात्मनः क्षिप्रं व्याच्छ्रस्व पण्डितो भव ।
निर्धूततमोऽनंगणो न पुनर्जातिजरे उपेष्यसि ॥४॥ )
अनुवाद—आयु तेरी समाप्त हो गई, यमके पास पहुँच चुका, निवास
( स्थान ) भी तेरा नहीं है, ( यात्राके ) मध्यके लिये तेरे
पास पाथेय भी नहीं । सो तू अपने लिये० ।
जेतवन कोई ब्राह्मण
२३६-अनुपुब्बेन मेधावी थोकथोकं खणे खणे ।
कम्मारो रजतस्सेव निद्धमे मलमत्तनो ॥५॥
( अनुपूर्वेण मेधावी स्तोकं स्तोकं क्षणे क्षणे ।
कर्मारो रजतस्येव निर्धमेत् मलमत्मनः ॥५॥ )
अनुवाद—बुद्धिमान् ( पुरुष ) क्षण क्षण क्रमशः थोड़ा थोड़ा अपने
मलको ( वैसे ही ) ( जलावे ), जैसे कि सोनार चाँदीके
( मलको ) जलाता है ।

१८।८ ] मलवग्गो [ १०९
जेतवन तिस्स (थेर)
२४०-अयसा ऽव मलं समुट्ठितं तदुट्ठाय तमेव खादति ।
एवं अतिधोनचारिनं सानि कम्मानि नयन्ति दुग्गतिं ॥६॥
( अयस इव मलं समुत्थितं त(स्मा)द्
उत्थाय तदेव खादति ।
एवं अतिधावन्तचारिणं स्वानि
कर्माणि नयन्ति दुर्गतिम् ॥६॥)
अनुवाद-लोहेसे उत्पन्न मल (= मुर्चा) जैसे जिसीसे उत्पन्न
होता है, उसे ही खा डालता है; इसी प्रकार अति चंचल
(पुरुष)के अपने ही कर्म उसे दुर्गतिको ले जाते हैं ।
जेतवन ( ळाल ) उदायी ( थेर )
२४१-असज्झायमला मन्ता अनुट्ठानमला घरा ।
मलं वण्णस्स कोसज्जं पमादो रक्खतो मलं ॥७॥
( अस्वाध्यायमला मंत्रा अनुत्थानमला गृहाः ।
मलं वर्णस्य कौसीद्यं, प्रमादो रक्षतो मलम् ॥७॥ )
अनुवाद-स्वाध्याय (= स्वरपूर्वक पाठकी आवृत्ति) न करना
(वेद-)मंत्रोंका मल (= मुर्चा) है, (लीप पोत
मरम्मत कर) न उठाना घरोंका मुर्चा है। शरीरका मुर्चा
आलस्य है, असावधानी रक्षकका मुर्चा है ।
राजगृह ( वेणुवन ) कोई कुलपुत्र
२४२-मलिथिया दुच्चरितं मच्छेरं ददतो मलं ।
मला वे पापका धम्मा अस्मिं लोके परम्हि च ॥८॥

१५. सुखवग्गो (सुख वर्ग)

११० ] धम्मपद [ १८।११
( मलं स्त्रिया दुश्चरितं मात्सर्यं ददतो मलम् ।
मलं वै पापका धर्म्मा अस्मिन् लोके परत्र च ॥८॥ )
२४३-ततो मला मलतरं अविज्जा परमं मलं ।
एतं मलं पहत्वान निम्मला होथ भिक्खवो ॥६॥
( ततो मलं मलतरं अविद्या परमं मलम् ।
एतत् मलं प्रहाय निर्मला भवत भिक्षवः ॥९॥ )
अनुवाद—स्त्रीका मल दुराचार है, कृपणता ( = कजूसी ) दाताका
मल है, पाप इस लोक और पर( लोक दोनों )में मल है
फिर मलोंमें भी सबसे बडा मल—महामल अविद्या है। हे
भिक्षुओ ! इस ( अविद्या ) मलको त्याग कर निर्मल बनो।
जेतवन ( चुल्ल ) सारी
२४४-सुजीवं अहिरीकेन काकसूरेन धंसिना ।
पक्खन्दिना पग्गब्भेन संकिलिट्ठेन जीवितं ॥१०॥
( सुजीवितं अहीकेण काकशूरेण ध्वंसिना ।
प्रस्कन्दिना प्रगल्भेन संक्लिष्टेन जीवितम् ॥१०॥)
अनुवाद—( पापाचारके प्रति ) निर्लज्ज, कौए समान ( स्वार्थमें )
शूर, ( परहित-)विनाशी, पतित, उच्छृंखल और मलिन
(पुरुष)का जीवन सुखपूर्वक बीतता ( देखा जाता ) है।
जेतवन ( चुल्ल ) सारी
२४५-हिरीमता च दुज्जीवं निच्चं सुचिगवेसिना ।
अलीनेन'प्पगब्भेन सुद्धार्जीवेन पस्सता ॥११॥