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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

१६।५ ] पियवग्गो [ ९७
अनुवाद—अयोग(=अनासक्ति) में अपनेको लगानेवाले, योग
(=आसक्ति) में न योग देनेवाले, अर्थ (=स्वार्थ) छोड
प्रियका ग्रहण करनेवाले आत्माऽनुयोगी (पुरुष) की स्पृहा
करे । प्रियोंका संग मत करो, और न कभी अप्रियों ही
(का संग करो), प्रियोका न देखना दुःखद् होता है,
और अप्रियोंका देखना (भी)। इसलिये प्रिय न बनावे,
प्रियका नाश बुरा (लगता है); उनके (दिलमें) गाँठ
नहीं पडती, जिनके प्रिय अप्रिय नहीं होते ।
जेतवन कोई कुटुम्बी
२१२-पियतो जायते सोको पियतो जायते भयं ।
पियतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ? ॥४॥
(प्रियतो जायते शोकः प्रियतो जायते भयम् ।
प्रियतो विप्रमुक्तस्य नास्ति शोकः कुतो भयम् ?॥४॥)
अनुवाद—प्रिय (वस्तु) से शोक उत्पन्न होता है, प्रियसे भय उत्पन्न
होता है; प्रिय(के बन्धन) से जो मुक्त है, उसे शोक
नहीं है, फिर भय कहाँसे (हो) ?
जेतवन विशाखा (उपासिका)
२१३-पेमतो जायते सोको पेमतो जायते भयं ।
पेमतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ? ॥५॥
(प्रेम्तो जायते शोकः प्रेम्तो जायते भयम् ।
प्रेम्तो विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ?॥५॥
७