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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

९४ ] धम्मपदं [ १५।१२
( साधु दर्शनमार्याणां सन्निवासः सदा सुखः ।
अदर्शनेन बालानां नित्यमेव सुखी स्यात् ॥१०)
२०७-बालसंगतिचारी हि दीघमद्धानं सोचति ।
दुक्खो बालेहि संवासो अमित्तेनेव सब्बदा ।
धीरो च सुखसंवासो ञातीनं 'व समागमो ॥११॥
( बालसंगतिचारी हि दीर्घमध्वानं शोचति ।
दुःखो बालैः संवासोऽमित्रेणैव सर्वदा ।
धीरश्च सुखसंवासो ज्ञातीनामिव समागमः ॥११॥)
अनुवाद—आर्यों* (=सत्पुरुषों) का दर्शन सुन्दर है, सन्तोंके साथ
निवास सदा सुखदायक होता है; मूढ़ोंके न दर्शन होनेसे
(मनुष्य) सदा सुखी रहता है। मूढ़ोंकी संगतिमें रहने-
वाला दीर्घ काल तक शोक करता है, मूढ़ोंका सहवास
शत्रु की तरह सदा दुःखदायक होता है, बन्धुओंके समागम-
की भाँति धीरोंका सहवास सुखद होता है।
वेलुवगाम सक्क (देवराज)
२०८-तस्मा हि धीरं च पञ्ञञ्च बहुस्सुतं च
धोरय्हसीलं वतवन्तमरियं ।
तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं
भजेथ नक्खत्तपथं 'व चन्दिमा ॥१२॥
*निर्वाणके पथपर अविचल रूपसे आरूढ़ स्रोतआपन्न, सकृदागामी,
अनागामी तथा निर्वाण-प्राप्त=अर्हत् इन चार प्रकारके पुरुषोंको आर्य कहते हैं।