धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० ] धम्मपद [ १८।११
( मलं स्त्रिया दुश्चरितं मात्सर्यं ददतो मलम् ।
मलं वै पापका धर्म्मा अस्मिन् लोके परत्र च ॥८॥ )
२४३-ततो मला मलतरं अविज्जा परमं मलं ।
एतं मलं पहत्वान निम्मला होथ भिक्खवो ॥६॥
( ततो मलं मलतरं अविद्या परमं मलम् ।
एतत् मलं प्रहाय निर्मला भवत भिक्षवः ॥९॥ )
अनुवाद—स्त्रीका मल दुराचार है, कृपणता ( = कजूसी ) दाताका
मल है, पाप इस लोक और पर( लोक दोनों )में मल है
फिर मलोंमें भी सबसे बडा मल—महामल अविद्या है। हे
भिक्षुओ ! इस ( अविद्या ) मलको त्याग कर निर्मल बनो।
जेतवन ( चुल्ल ) सारी
२४४-सुजीवं अहिरीकेन काकसूरेन धंसिना ।
पक्खन्दिना पग्गब्भेन संकिलिट्ठेन जीवितं ॥१०॥
( सुजीवितं अहीकेण काकशूरेण ध्वंसिना ।
प्रस्कन्दिना प्रगल्भेन संक्लिष्टेन जीवितम् ॥१०॥)
अनुवाद—( पापाचारके प्रति ) निर्लज्ज, कौए समान ( स्वार्थमें )
शूर, ( परहित-)विनाशी, पतित, उच्छृंखल और मलिन
(पुरुष)का जीवन सुखपूर्वक बीतता ( देखा जाता ) है।
जेतवन ( चुल्ल ) सारी
२४५-हिरीमता च दुज्जीवं निच्चं सुचिगवेसिना ।
अलीनेन'प्पगब्भेन सुद्धार्जीवेन पस्सता ॥११॥