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दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

प्रथम खण्ड: पैतृक दाय-विभाजन एवं स्त्रीधन निरूपण

CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
विज्ञानेश्वर की देन—
विज्ञानेश्वर ने दाय को अप्रतिबन्ध तथा सप्रतिबन्ध नामक
२ भागों में बाँटा है तथा बल पूर्वक कहा है कि पुत्र पौत्र एवं प्रपौत्र
वसीयत पर अधिकार जन्म से ही पाते हैं, जीमूत वाहन के मतों के
सर्व था विरोध में है ।
इनके शिष्य का नाम नारायण था, मिताक्षरा में विभाजन
के ४ अवसर बताये गये हैं किन्तु नारायण ने केवल २ अवसरों की
चर्चा की है ! पिता की इच्छा, तथा पुत्र या पुत्रों की इच्छा
तथा पिता की इच्छा पर उसमें और पुत्रों में विभाजन हो सकता
है । पति के अधिकार पर विधवाका अधिकार हो जाता है चाहें पतिके
भाई के साथ संयुक्त धन ही क्यों न हो, रिक्थाधिकार मृत व्यक्ति को
पिण्ड दान करने पर निर्भर करता है जीमूत वाहन का दायभाग,
बंगाल में अत्यधिक सम्मान प्राप्त कर चुका है इनका समय १०६०—
११३० के मध्य माना जाता है ।
मिताक्षरा की जी मूत वाहन ने आलोचना की है कहें तो
कोई अत्युक्ति नहीं ।
याज्ञवल्क्य स्मृति का समस्त भारत वर्ष के न्यायालयों में आज
भी सम्मान बना हुआ है यह इसके सर्वाधिक वैशिष्ट्य का द्योतक है ।
यह तो निर्विवाद है कि इनस्मृतियों में धर्म का विवेचन हुआ
है । धर्म एक ऐसा शब्द है जिसकी परिभाषा करना बड़ा कठिन है ।
वेद में धर्मन् शब्द का प्रयोग विशेषण या संज्ञा के रूप में आया है
धर्मन् शब्द, धृ धातु से बना है । जिसका तात्पर्य है धारण करना
आलम्बन देना, पालन करना, ऋग्वेद में यह शब्द पुल्लिंग तथा न०पुंसक
लिंग दोनों में ही व्यवहृत है ।

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१ अथर्व वेद में, धर्म शब्द का प्रयोग धार्मिक क्रिया संस्कार
करने से अर्जित गुण के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । ऐतरेय ब्राह्मण में धर्म
शब्द सकल धार्मिक कर्तव्य के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । २ छान्दोग्य के
अनुसार धर्म त्रिविध है, (१) यज्ञ-दान, अध्ययन । (२) तपस्या अर्थात्
तापस धर्म (३) ब्रह्मचर्य । यह धर्म शब्द आश्रमों के विलक्षण कर्तव्यों
की ओर संकेतित हैं । धर्म शब्द का अर्थ समय समय पर परिवर्तित
भी होता रहा है । सुप्रसिद्ध स्मृतिकार मनु ने वर्णधर्म-आश्रम धर्म-
वर्णाश्रम धर्म नैमित्तिक धर्म-गुण धर्म माने हैं ।
याज्ञवल्क्य आदि स्मृतिकारों ने भी धर्म के इस विकसित रूप
का विवेचन किया है । याज्ञवल्क्य की टीकाओं में विज्ञानेश्वर की
मिताक्षरा का सर्वत्र सम्मान है ।
विभिन्न परी क्षाओं में यह ग्रन्थ निर्धारित हैं, इसस्मृतिका
उपयोगी अंश दाय भाग है, बंगाल के भाग के अतिरिक्त अन्यत्र
भारतीय व्यवहार में इस मिताक्षरा का अत्यधिक आदर है ।
याज्ञ वल्क्य वैदिक ऋषि परंपरा में हैं । मिताक्षरा कार का
कथन है कि याज्ञ वल्क्य के किसी शिष्य ने धर्म शास्त्र को संक्षिप्त
करके कथनोपकथन के रूप में रखा है । याज्ञ वल्क्य स्मृति में १००६
श्लोक है । यह स्मृति मनुस्मृति से कलेवर में सूक्ष्म है । मनुस्मृति में
२७०० श्लोक है । यह स्मृति अनुष्टुप् छन्द में लिखी गई है । मिताक्षरा
कार ने याज्ञ वल्क्य की प्रतिभा का समुज्ज्वल रूप ही प्रदर्शित किया
है, दाय भाग में —
बंटवारा-इसका समय, विभाजन में स्त्री भाग, पिता मृत्यु
के बाद बँटवारा, विभाजन योग्य सम्पत्ति, पिता पुत्र का संयुक्त स्वा-
मित्व बारह प्रकार के पुत्र, शूद्रका अनौरस पुत्र, पुत्र हीन पिता के
१-अथ-६।६।१७
२-ऐत-ब्राः ७।१७

space between धन्य and वादस्य!
Yes, धन्य वादस्य भाजनम् ॥ has a space between धन्य and वादस्य.
Now, let's look at the text before छात्राणां (or च्छात्राणां):
How many letters are there between विदु... and त्राणां?
Let's look at the print:
विदुषो or विदुषां?
There is:
वि दु षो (or षां)
Then a gap?
Then च छात्राणां?
Wait, look at the glyphs:
Is that च?
Wait, let's look at the couplet in the subhashita style:
Line 12-13:
दुर्बोधांयदतीव तद्विजहति स्पष्टार्थ मित्युक्तिभिः
Wait, look at Line 12:
दुर्बोधांयदतीव -> wait, is it दुर्बोधं यदतीव?
In the print:
दु र्बो धं य द ती व -> wait, is it दुर्बोधां or दुर्बोधं?
Look at दुर्बो: दु, र्बो (

दो शब्द
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श्री १०८ श्री श्रीवर शास्त्रि गुरु चरण कमले भ्यो नमः
बाचक वृन्द
याज्ञ वल्क्य स्मृति के दाय भाग का भारतवर्ष के अधिकांश
भाग में सम्मान है, भारतीय सांविधान इसी स्मृति की मिताक्षरा
टीका का अवलम्बन लेकर कतिपय गम्भीर विवादों का समाधान
करता है, आंग्ल शासकों ने भारतीय विवाह—दतकाधिकार आदि के
'कानून, बहुधा इसी के आधार पर बनाये थे।
दाय भाग में यद्यपि श्लोक संख्या ३४ है तथापि मिताक्षरा
कार का अभिप्राय लग-भग ४० पृष्ठों में पूर्ण हुआ है। मिताक्षरा की
भाषा प्रौढ़ एवं धर्म शास्त्रों के गहन मर्मों से परिपूर्ण है। धर्म शास्त्रा
चार्य परीक्षा में प्रविष्ट होते समय मेरा ध्यान इस ओर गया, परन्तु
उस समय यह कार्य पूर्ण न हुआ, गत वर्ष एम० ए० प्रथम वर्ष ( सं०
के छात्रों ने जब धर्म शास्त्र का प्रश्न पत्र लिया तब उनकी कठिनाई
का ध्यान रखकर इसकी हिन्दी टीका करने का विचार किया, यह
उसी विचार का पल्लवित रूप है।
यद्यपि यह हिन्दी टीका कई मास पूर्व लिखी जा चुकी थी
तथापि मुद्रण सम्बन्धी अव्यवस्था ने इसे अभी तक रोके रखा।
अकस्मात् श्री स्वामी जी महाराज ने इसे छात्रों की सुविधा
का ध्यान रखते हुए प्रोत्साहित किया यह उन्हीं की कृपा का फल है जो
इतनी शीघ्र प्रकाशित हो रही है।
इस साहाय्य के लिये मैं स्वामी जी से किन शब्दों में कृतज्ञता
प्रकट करूं नहीं जानता।

'मिताक्षरा सहित दाय भाग प्रकाशित करने का विचार था
परन्तु कतिपय मुद्रण सम्बन्धी अव्यवस्थाओं के कारण वह पूर्ण नहीं
हो पाया ।
भूमिका लेखक डा० हरिदत्त जी शास्त्री से निवेदन करने के
लिये मेरे पास मार्मिक शब्द नहीं हैं, उनकी असीम कृपा को व्यक्त
भी कैसे करूँ समझ में नहीं आता ।
अन्त में मैं प्रेस के अध्यक्ष श्री बैजनाथ जी दानी एवं कर्म
चारियों को भी धन्यवाद देकर विद्वानों से निवेदन करूंगा कि इसमें
यदि कोई त्रुटि रह गई हो वह मेरी समझें, जो ग्राह्य अंश अच्छा बन
गया हो मेरे गुरु जनों का आशीर्वाद समझ कर पढ़ें व मुझे उचित
परामर्श दें मैं उनका आभारी रहूँगा ।
गतश्रम टीला विदुषां वशंवदः
मथुरा वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी
रंगभरी एकादशी सम्वत् २०२२

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दाय भाग

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राम राम

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दाय विभाग
दाय शब्द से जो धन स्वामि सम्बन्ध से ही निमित्त बनकर
अन्य का स्व होता है वह २ प्रकार का है—
१—अप्रति बन्ध
२—सप्रति बन्ध
पुत्र या पौत्र के सम्बन्ध से जो पिता या पितामह का धन
अपना होता है वह अप्रतिबन्ध [ बिना रुकावट ] है ।
यदि चाचा आदि निः सन्तान हैं या स्वामी का अभाव है वह
‘स्व, सप्रतिबन्ध होता है ।
विभाग—
द्रव्य समुदाय विषयक अनेक स्वामियों की सम्पत्ति को एक
देश में व्य वस्थित करने को विभाग कहते हैं
दाय भाग का लक्षण—
वि भागो ऽ र्थस्य पित्र्यस्य तनयै र्यत्र कल्प्यते
दाय भाग इति प्रोक्तं व्यवहार पदं बुधैः ॥
स्वत्व—शास्त्रैक समधिगम्य है या लौकिक है यह विवाद
पूर्ण है परन्तु गौतम का कथन है कि यह शास्त्रैक समधि गम्य है—
स्वामी रिक्थ क्रय संविभाग परिग्रहा धिगमेषु, ब्राह्मण स्या-
धिकं लब्धं ‘क्षत्रियस्य विजितं’ निर्विष्टं वैश्य–शूद्रयोः ।
लौकिक—अर्थ क्रिया साधन होने से लौकिक है ।
यदि केवल शास्त्रैक समधि गम्य स्वत्व मान लिया जाय तो
अन्यायोपार्जित द्रव्य, असत्प्रति ग्रह लब्ध द्रव्य स्वत्व कभी न हो सकेगा
और न शास्त्र उसके विभाजन की ही आज्ञा देगा, परन्तु लोक इसे कब

( २ )
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स्वीकार करेगा। केवल लौकिक मानने से शास्त्र व्यर्थ पड़ता है अतः
दोनों को लक्ष्य में रखकर चलने से ही सिद्धिसम्भव है।
स्वत्व पर—जन्म से ही अधिकार यदि माना जाय तो पिता
आवश्यक कार्य भी नहीं कर सकेगा।
तथा—जिन वस्तुओं का विभाजन नहीं है उनपर भी जन्म
मात्र से जातक का अधिकार रहेगा—फलतः
शौर्य भार्या धने चो भे यच्च विद्या धनं भवेत्
त्रीण्येतान्यविभाज्यानि प्रसादोयश्च पैतृकः ॥
शौर्य—भार्या—विद्या—ये ३ धनअविभाज्य हैं
तथा पैतृक प्रसाद भी परन्तु जन्म ग्रहण से क्या पिता की
शूरता या विद्या का विभाजन हो सकेगा।
मणि मुक्ता के स्वामी पिता पुत्र दोनों ही होते है।
अतः स्वत्व ( अधिकार ) जन्म से नहीं अपितु स्वामि नाश
से या विभाग से ही सम्भव है।
[ विशेष मिताक्षरा देखिये ]
―――
दाय विभाग
विभाग की प्रक्रिया—
विभागं चेत्पिता कुर्या दिच्छ या विभजेत्सुतान् ।
ज्येष्ठं वा श्रेष्ठ भागेन सर्वेवास्युः समांशिन ॥१॥
अन्वयः—चेत् पिता विभागं कुर्यात् इच्छया सुतान् विभजेत्
ज्येष्ठं वा श्रेष्ठ भागेन वा सर्वे समांशिनः स्युः ॥

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चेत्=जब पिता विभाग करे, इच्छया=इच्छा पूर्व,
सुतान्=पुत्रों को विभजेत्=पृथक् कर दे । ज्येष्ठं वा श्रेष्ठ भागेन
बड़े लड़के को श्रेष्ठ भाग से, वा सर्वे सभांशिनः स्युः=अथवा सब
पुत्रों को समान अंश दे ।
विशेषः—
[ ज्येष्ठं = ज्येष्ठ को ज्येष्ठ भाग, मध्यम को मध्यम, कनिष्ठ
को कनिष्ठ भाग दिया जाय यह तात्पर्य है ]
मनु का कथन भी इसमें सम्मत है कि बड़े पुत्र को अधिक
दिया जाय—
"ज्येष्ठस्य विंश उद्धारः"
नारद का कथन है—विभाजन—पिता तथा माता की
मृत्यु के उपरान्त होवे । यदि पिता अधर्मी हो अथवा रोग ग्रस्त हो
माता रजोधर्म युक्त होती हो तब भी पुत्रों की इच्छा से विभाग हो
जाता है।
पिता की ईच्छा से २ प्रकार का विभाग दिखाया एक सम
दूसरा विषम सम विभाग में विशेष दृष्टव्य—
यदि कुर्यात् समानंशान् पत्न्यः कार्याः समांशिकाः
न दत्तं स्त्रो धनं यासाँ भर्त्रा वा श्वशुरेण वा ॥२॥
अन्वयः—यदि [पिता] समानंशान् कुर्यात् पत्न्यः समांशिकाः कार्या
यासां भर्ता वा श्वशुरेण वा स्त्री धनं न दत्तम् । यदि=जब पिता
सब, लड़कों को, समानंशान् कुर्यात्=सम विभाजन करता है तो
पत्न्यः=पत्नियों का समांशिकाः कार्याः=अंश भी पुत्रों के समान
करना चाहिये । यासां =जिन पत्नियों को 'भर्त्रा वा श्वशुरेण,=पति-
या श्वशुर ने, स्त्री धनं न दत्तम्=स्त्री धन न दिया हो ।

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( ४ )
१. यदि स्त्री धन दिया गया हो तो पत्नि का अंश होगा
२. पत्न्यः-में बहुवचन है अतः सौतेली माता का भी
अधिकार है ।
३. यदि ज्येष्ठ को श्रेष्ठ भाग दिया गया हो तो पत्नि का
श्रेष्ठादि भाग में अंश न होगा ।
४. स्त्री धन के विषय में आपस्तम्ब का भी कथन है—
परीभांडं च गृहे ऽलंकारो भार्यायाः
( धः २।१४।६)
ज्येष्ठं वा श्रेष्ठ भागेन का अपवाद—
शक्तस्यानीह मानस्य किंचिद्दत्वा पृथक क्रिया
न्यूनाधिक विभक्तानां धर्म्यः पितृ कृतः स्मृतः ॥३॥
अन्वयः—शक्तस्य अनीहमानस्य किंचित् दत्वा पृथक् क्रिया
न्यूनाधिक विभक्तानां धर्म्यः पितृ कृतः स्मृतः । शक्तस्य = जो स्वयमेव
द्रव्य अर्जन करने में समर्थ है, तथा अनीहमानस्य = पितृ द्रव्य में से
अंश नहीं चाहता, उसे भी किंचिद्दत्वा = सार शून्य वस्तु भी देकर
पृथक् क्रिया = विभाग करना चाहिये-[ जिससे उसके लड़कों को
विभाजन में स्पृहान रहे ]
न्यूनाधिक विभक्तानां = अल्प तथा अधिक अंश का विभा-
जन धर्म्यः = धर्म शास्त्रोक्त क्रम से किया गया-पितृ कृतः स्मृतः = पितृ
कृत विभाजन अपरिवर्तिनीय होगा ।
विशेषः—
१-विभाजन मान्य वही है जो शास्त्र पूर्वकहो
२-यदि रोग ग्रस्त पिता है, कुपित या विषयासक्त वा
शास्त्र मर्यादा का अतिक्रमण करता हैं तो विभाजन उचित नहीं

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माना जायगा ।
कहाभी है—व्याधितः कुपितश्चैव विषयासक्त मानसः
अन्यथा शास्त्रकारी च न विभागे पिता प्रभुः ।
[ नारदः १३।१६ ]
विभजेरन् सुताः पित्रोरूर्ध्व रिक्थं ऋणं समम्
मातुर्दुहितरः शेषमृणात् ताभ्य ऋतेऽन्वयः ।४।।
अन्वयः—
पित्रो रूर्ध्वं सुताः समम् रिक्थम् ऋणं विभजेरन्, ऋणात्
शेषं मातु र्दुहितरः ताभ्य ऋते अन्वयः ।
पित्रोरूर्ध्व = माता पिता के मरने के बाद, सुताः = पुत्र
समम् = समान रूप से रिक्थम् = धन, ऋणं = ऋण को विभजेरन् =
बांट लें । ऋणात् शेष = मातृकृत ऋण चुकाकर मातुः = माता का
द्रव्य — दुहितर = लड़की बांट लें, ताभ्य ऋते = लड़कियों के अभाव
में, अन्वयः = पुत्रादि सन्तति ले ।
विशेषः—
१—मनु ने ज्येष्ठ का अधिक अंश लिखा था यहां समान है
२—विषम विभाग शास्त्रीय होने पर भी लोक दृष्टि में
मान्य न होता अतः
अस्वर्ग्य लोक विद्विष्टं धर्म्यमप्याचरेन्नतु
आ० १५६ आप स्तंब
वाक्य का समाधान भी इसमें किया गया है
३—स्त्री धन दुहितृ गामी होता है क्योकि दुहिता में माता
का शारीरिक अंश भी तो अधिक होता है ।
४—गौतम ने कन्याओं के भी २ विभाग किये हैं प्रति
ष्ठित अप्रतिष्ठित, इनमें प्रथम अधिकार निर्धन का है । अविवाहिता
का सर्व प्रथम अधिकार है ।

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अविभाज्य धन
पितृ द्रव्याबिरोधेन यदन्यत्स्वयमर्जिमम्
मैत्रमौद्वाहिकं चैव दायादानां न तद्भवेत् ॥५॥
अन्वय सरल है—
पितृ द्रव्य अविरोधेन = माता पिता के द्रव्य का विना
विनाश किये, यदन्यत् स्वय मर्जितम् = जो धन स्वयं पैदा किया है
मैत्रं = मित्र से प्राप्त, औद्वाहिकं = विवाह में प्राप्त, दायादानां =
भाइयों का, न तद्भवेत् = नहीं होता ।
विशेष:—
१—पितृ द्रव्याविरोधेन का अन्वय प्रत्येक के साथ
लगाना चाहिये ।
क्रमादभ्यागतं द्रव्यं तहृभप्युद्धरेत्तु यः ।
दायादेभ्यो न तद्दद्याद्विद्यया लब्धमेव च ॥६॥
क्रमादभ्यागतं द्रव्यम् = पितृ परम्परा से प्राप्त द्रव्य, हृत-
मपि = कोई लेकर निषेध करता हो उसे, यः उद्धरेत्तु = उससे निकल
वाये विद्यया लब्ध मेवच = विद्या से प्राप्त किया धन दायादेभ्यो =
भाइयों को, नदद्यात् = नहीं दिया जा सकता ।
विशेष:—
१—क्षेत्र में चतुर्थांश उद्धर्त्ता का शेष सब भाइयों का
समान होगा
२—अविरोध का आशय है कि पिता के विरोध से प्राप्त
किया प्रतिग्रहभी सम विभाज्य होगा ।
३—मनुने भी इसे स्वीकार किया है—
अनुपघ्नन् पितृ द्रव्यं श्रमेण यदुपार्जितम्
दायादेभ्यो न तद्दद्याद्विद्यया लब्ध मेव च ॥
मनुः ६। २०८

( ७ )
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अपवादः—
सामान्यार्थ समुत्थाने विभागस्तुऽममः स्मृतः
अनेकपितृकाणां तु पितृतो भाग कल्पना ॥७॥
अन्वय सरल है—
सामान्यार्थ समुत्थाने—अविभक्त भाइयों का, कृषि वाणिज्य
आदिसे अर्जितधन एकत्रित हो चाहें उसे एक ने ही अधिक
बढ़ाया हो ।
विभागस्तु समः स्मृतः—सम विभाग होगा । अर्जित करने
वाले के २ अंश नहीं, ( पितामह के धन का विभाग—
अनेक पितृकाणां तु = पितामह के द्रव्य में भी, पितृतः =
पिता द्वारा ही— मात्र कल्पना = विभाजन उचित होगा ।
१ - एक पिता के - नाती अनेक हैं तो वे अपनी संख्या के
कारण अंश के अधिकारी नहीं अपितु वे पिता के अंश के ही
अधिकारी हैं ।
२—पितामह के समक्ष ही-पिता की मृत्यु हो जाय तब भी
पौत्रों का पितामह के द्रव्य पर अधिकार होगा ।
पिता द्वारा विभाजन निम्न वस्तुओं में ग्राह्य नहीं—
अन्वयः—
भूर्या पिता महोपात्ता निबन्धो द्रव्यमेव च
तत्र स्यात् सदृशं स्वाम्यं पितुः पुत्रस्य चैव हि ॥८॥
पितामहोपात्ता या भू : निबन्धः वा द्रव्यमेव
तत्र पितु : पुत्रस्य चैव हि सदृशं स्वाम्यं स्यात् ।
पितामहोपात्ता—पितामह द्वारा अधिकृत, या भूः - जो क्षेत्र
निबन्ध = एक पर्व भरक के इतने पर्व, एक क्रमुक फल भरक के
इतने फल, इत्यादि लक्षण युक्त । द्रव्य = सुवर्ण रजतादि

त्तं..." verse 7 or 10?
WAIT! Look at the number at the bottom:
Is that ॥१०॥ or something else?
Wait! Look at ॥१०॥:
It's ॥ १० ॥? No, wait!
Look at the characters:
॥ then a vertical line १? No, wait!
Is that ॥ १० ॥?
Wait, look at ॥ १० ॥:
First is ।, second is ।.
Then १, then ०? No, wait!
Look at: हरेत् ॥ १० ॥ or हरेत् ॥ ७ ॥?
WAIT! Look at ॥ १० ॥:
Does it say ॥ १० ॥?
Wait!
The first stroke is । (danda).
The second stroke is । (danda).
Then comes a digit: १?
Then another digit: ०?
Wait, look at the bottom line:
पितुरूर्ध्वं विभजतां माता ऽप्यंशंसमं हरेत् ॥ १० ॥
Wait, between हरेत् and ॥:
There is ॥ (double danda).
Then १ and ०!
Wait, is there a double danda AFTER १०?
Yes, `॥

द्वितीय खण्ड: उत्तराधिकार क्रम एवं दायभाग उपसंहार

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अन्वय-सरल है—
पितृभ्यां = माता पिता ने, पूर्व विभक्त पुत्रों में किसो को
यद्दत्तं = जो कुछ अलंकारादि दिया, हो तत्तस्यैवधनं भवेत्-वह उसी का
धन होगा ।
पिता के मरण पश्चात् विभाग में माता काभी अंश है—
पितुरूर्ध्वं विभजतां = पिता के ऊर्ध्वलोक जाने के पश्चात्
माताप्यंश समं हरेत् = माता भी समान अंश ग्रहण करे ।
१—यदि स्त्री धन प्राप्त न हो तभी समान अंश है अथवा
“दत्ते त्वर्द्धांशहारिणी” अर्ध अंश की अधिकारिणी है ।
पिता के मरजाने पर असंस्कृत भाई हैं तो उनके संस्कार
की व्यवस्था—
असंस्कृतास्तु संस्कार्या भ्रातृभिः पूर्व संस्कृतैः
भगिन्यश्च निजादंशाद्दत्त्वैशंतु तुरीयकम् ।११।
अन्वयः—
असंस्कृतास्तु पूर्व संस्कृतैः भ्रातृभिः संस्कार्या
भगिन्यश्च निजादंशात् तुरीयकम् अंशं दत्वा
[ संस्कार्या ]
पिता के पश्चात् विभक्त होने वाले भाइयों को = पूर्व
संस्कृतैः = जिनका पहिले संस्कार हो चुका है, असंस्कृताः = असंस्कृत
भाइयों का संस्कार्या = संस्कार करना चाहिये । भगिन्यश्च = बहिनों
को भी, यदि उनका संस्कार नहीं हुआ है तो संस्कार कराना चाहिये
निजादंशात् तुरीयकम् दत्त्वा—अपने अंश से चतुर्थ भाग निकाल कर
विशेषः—
१-कन्या ब्राह्मणी है तो ब्राह्मण भाई का अंश ¼ लेगी

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२—१ ब्राह्मणी पत्नी, १ कन्या १ पुत्र है तो पिता के धन
के १/२ भाग करके १ भाग के १/४ भाग करके चतुर्थांश भाग कन्या को
देकर शेष को पुत्र ले
३—यदि १ पुत्र २ कन्या हैं तो पितृधन को १/३ करके १ भाग
को १/४ भाग करके चतुर्थांश दे ।
४—यदि ब्राह्मणी पुत्र १ क्षत्रिय कन्या १ तब ७ भाग करके
क्षत्रिया पुत्र भाग को ४/३ विभाग करके चतुर्थांश क्षत्रिया को दे शेष को
ब्राह्मणी पुत्र ले ।
५—यदि २ ब्राह्मणी पुत्र—१ क्षत्रिय कन्या तब ११ १ ३
अंशों को क्षत्रिया पुत्र भाग को ४ में बांटे चतुर्थांश क्षत्रिया कन्या के
दे शेष को ब्राह्मणी पुत्र बांट लें ।
६—जीवित पिता कुछ भाग कन्या को दे वही उसका है ।
पूर्व निर्णय समान जातीय भाइयों के सम्बन्ध में है अब
भिन्न जातीय भ्राताओं का विभाग लिखा जाता है—
चतुस्त्रिद्व्येक भागाः स्युर्वर्णशो ब्राह्मणात्मजाः
क्षत्रजास्त्रिद्व्येक भागा विड्जास्तु द्व्येक भागिनः॥१२॥
अन्वयः—
ब्राह्मणात्मजाः वर्णशः चतुः त्रि द्वि एक भागास्युः
क्षत्रजा स्त्रि द्वि एक भागा, विड्जास्तु द्वि एक भागिनः।
ब्राह्मणादि वर्ग की स्त्रियों की सन्तति का विभाजन
ब्राह्मणात्मजाः वर्णशः—वर्ण वर्ण में ब्राह्मण से उत्पन्न यथा क्रम,
४, ३, २, १ भाग प्राप्त करें ।
ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मणी में उत्पन्न एक-एक—४-४ भाग ले
ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिय में उत्पन्न, प्रत्येक—३,३ भाग लें

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,, ,, वैश्या में उत्पन्न प्रत्येक-२-२ भाग लें
,, ,, शूद्रा में उत्पन्न प्रत्येक-१-१ भाग लें
ब्राह्मण चारों वर्ण की पत्नी रख सकता है, क्षत्रिय, ३ वर्ण
की वैश्य २ वर्ण की शूद्र एक ही ।
१- ब्राह्मण से उत्पन्न क्षत्रियादि वर्ण की पत्नी में उत्पन्न
सुत को भूमि प्राप्ति का अधिकार नहीं है यदि पिता दे भी दे तो
उसकी मृत्यु के पश्चात् उनसे वापिस लेने का ब्राह्मणी पुत्र को
अधिकार है ।
सर्व विभाग शेष व्यवस्था—
अन्योन्यापहृतं द्रव्यं विभक्ते यत्तु दृश्यते
तत्पुनस्ते समैरंशैर्विभजेरन्निति स्थितिः ॥१३॥
अन्वय सरल है ।
अन्योन्यापहृतं द्रव्यं = सबका मिश्रित धन परस्पर हरण
किया गया भी—विभक्ते ० ==विभक्त हो जाने पर दिखाई दे जाय,
तत्पुनस्ते समैरंशैः—तो उसे फिर से समान अंशों के द्वारा, विभजेरन्
इतिस्थितिः = बांट ले यह शास्त्र मर्यादा है ।
विशेषः—
१—जिस पर वह धन दिखाई दे उसे भाग न दिया जाय
२—समुदाय में स्थित द्रव्य का अपहरण दोष जनक नहीं
३—मनु के मतानुसार ज्येष्ठ यदि अपहरण करे तो दोष
भागी है कनिष्ठ नहीं ।
(मनु०६। २१३)
४—साधारण द्रव्य जिसमें निज अधिकार भी है ग्रहण
करने में दोष नहीं ।

CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh ( ६२ )
द्वयामुष्यायण का भाग—
अपुत्रेण पर क्षेत्रे नियोगोत्पादितः सुतः
उभयो रप्यसौ रिक्थी पिण्ड दाता चधर्मतः ॥१४॥
अन्वय सरल—है
अपुत्रेण = देवर आदि ने, पर क्षेत्रे = पर भार्या में नियो
गोत्पादितः सुतः = गुरु नियोग से उत्पन्न किया पुत्र उभयोरपि रिक्थी
बीजि क्षेत्री इन दोंनो का धन लेंने व पिण्ड दान करने में समर्थ है
१—जो देवरादि नियुक्त किया गया हो वह अपुत्र हो
२—यदि नियोग कर्ता सपुत्र है जो सन्तति क्षेत्री की होगी
बीजी की नही ।
३—मनु के अनुसार—‘नियोग, देवर–सपिण्ड ही कर
सकता है ।
४—विधवा में नियोग विधि वर्जित है
५—बड़े भ्राता की मृत्यु के पश्चात्, यदि वाग्दान हो चुका
हैं तो छोटा भाई उस स्त्री का पतिबन सकता है ।
मुख्य--गौण पुत्रों की दाय ग्रहण व्यवस्था—
औरसो धर्मपत्नीजस्तत्समः पुत्रिका सुतः
क्षेत्रजः क्षेत्रजातास्तु सगोत्रेणोतरेण वा । १५ ।
अन्वय सरल—
औरसो धर्म पत्नीजः—सवर्ण विवाहिता में उत्पन्न पुत्र
औरस कहलाता है, तत्समः पुत्रिका सुतः—उसके समान लड़की का
लड़का भीं है, क्षेत्रजः०—इतर सपिण्ड या देवर से क्षेत्रजात तु--क्षेत्र
में उत्पन्न, पुत्र क्षेत्रज कहलाता है ।

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विशेष:—
१ पुत्रिका सुत--विवाह के समय वचन पूर्वक दी गई कन्या
कि इसमें उत्पन्न पुत्र मेरा होगा पुत्रिका सुत कहलाता है ।
गूढ़ज--कानीन पुत्रों की परिभाषा—
गृहे प्रच्छन्न उत्पन्नो गूढजस्तु सुतः स्मृतः ।
कानीनः कन्यका जातो मातामह सुतो मतः ॥ १६॥
गूढजस्तु सुतः गृहे प्रच्छन्न उत्पन्नः--गूढज पुत्र वह कहलाता
है जो पति के घर में ही हीनाधिक जाति के पुरुष से उत्पन्न हुआ हो ।
कानीन०--कन्य का में उत्पन्न पुत्र कानीन कहलाता है यह
नाना का पुत्र कहलाता है ।
१-मनु ने भी कहा है—
पितृ वेश्मनि कन्या तु यं पुत्रं जनयेद्रहः
तं कानीनं वदेन्नाम्ना वोढुः कन्य समुद्भवम् ॥
पौन र्भव--दत्तक की परिभाषा—
अक्षतायां क्षतायां वा जातः पौनर्भवः सुतः
दद्यान्माता पिता वा यं स पुत्रो दत्तको भवेत् ॥
अन्वय सरल—
अक्षतायां०--अक्षत या क्षत—पनर्भुस्त्री में सवर्ण से
उत्पन्न पुत्र पौनर्भव कहलाता है । दद्यान्माता पिता वायं—जिसे माता
पति की आज्ञा लेकर पति की मृत्यु के पश्चात् या दोनों जिसे दे दें वह
पुत्र दत्तक कहलाता है ।
विशेष:—
१—आपत्ति में पुत्र दिया जाय यह मनुका मत हैं