दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary
जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा
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द्वयामुष्यायण का भाग—
अपुत्रेण पर क्षेत्रे नियोगोत्पादितः सुतः
उभयो रप्यसौ रिक्थी पिण्ड दाता चधर्मतः ॥१४॥
अन्वय सरल—है
अपुत्रेण = देवर आदि ने, पर क्षेत्रे = पर भार्या में नियो
गोत्पादितः सुतः = गुरु नियोग से उत्पन्न किया पुत्र उभयोरपि रिक्थी
बीजि क्षेत्री इन दोंनो का धन लेंने व पिण्ड दान करने में समर्थ है
१—जो देवरादि नियुक्त किया गया हो वह अपुत्र हो
२—यदि नियोग कर्ता सपुत्र है जो सन्तति क्षेत्री की होगी
बीजी की नही ।
३—मनु के अनुसार—‘नियोग, देवर–सपिण्ड ही कर
सकता है ।
४—विधवा में नियोग विधि वर्जित है
५—बड़े भ्राता की मृत्यु के पश्चात्, यदि वाग्दान हो चुका
हैं तो छोटा भाई उस स्त्री का पतिबन सकता है ।
मुख्य--गौण पुत्रों की दाय ग्रहण व्यवस्था—
औरसो धर्मपत्नीजस्तत्समः पुत्रिका सुतः
क्षेत्रजः क्षेत्रजातास्तु सगोत्रेणोतरेण वा । १५ ।
अन्वय सरल—
औरसो धर्म पत्नीजः—सवर्ण विवाहिता में उत्पन्न पुत्र
औरस कहलाता है, तत्समः पुत्रिका सुतः—उसके समान लड़की का
लड़का भीं है, क्षेत्रजः०—इतर सपिण्ड या देवर से क्षेत्रजात तु--क्षेत्र
में उत्पन्न, पुत्र क्षेत्रज कहलाता है ।