सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 46 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 29

( ७ )
CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
अपवादः—
सामान्यार्थ समुत्थाने विभागस्तुऽममः स्मृतः
अनेकपितृकाणां तु पितृतो भाग कल्पना ॥७॥
अन्वय सरल है—
सामान्यार्थ समुत्थाने—अविभक्त भाइयों का, कृषि वाणिज्य
आदिसे अर्जितधन एकत्रित हो चाहें उसे एक ने ही अधिक
बढ़ाया हो ।
विभागस्तु समः स्मृतः—सम विभाग होगा । अर्जित करने
वाले के २ अंश नहीं, ( पितामह के धन का विभाग—
अनेक पितृकाणां तु = पितामह के द्रव्य में भी, पितृतः =
पिता द्वारा ही— मात्र कल्पना = विभाजन उचित होगा ।
१ - एक पिता के - नाती अनेक हैं तो वे अपनी संख्या के
कारण अंश के अधिकारी नहीं अपितु वे पिता के अंश के ही
अधिकारी हैं ।
२—पितामह के समक्ष ही-पिता की मृत्यु हो जाय तब भी
पौत्रों का पितामह के द्रव्य पर अधिकार होगा ।
पिता द्वारा विभाजन निम्न वस्तुओं में ग्राह्य नहीं—
अन्वयः—
भूर्या पिता महोपात्ता निबन्धो द्रव्यमेव च
तत्र स्यात् सदृशं स्वाम्यं पितुः पुत्रस्य चैव हि ॥८॥
पितामहोपात्ता या भू : निबन्धः वा द्रव्यमेव
तत्र पितु : पुत्रस्य चैव हि सदृशं स्वाम्यं स्यात् ।
पितामहोपात्ता—पितामह द्वारा अधिकृत, या भूः - जो क्षेत्र
निबन्ध = एक पर्व भरक के इतने पर्व, एक क्रमुक फल भरक के
इतने फल, इत्यादि लक्षण युक्त । द्रव्य = सुवर्ण रजतादि