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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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( २ )
CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
स्वीकार करेगा। केवल लौकिक मानने से शास्त्र व्यर्थ पड़ता है अतः
दोनों को लक्ष्य में रखकर चलने से ही सिद्धिसम्भव है।
स्वत्व पर—जन्म से ही अधिकार यदि माना जाय तो पिता
आवश्यक कार्य भी नहीं कर सकेगा।
तथा—जिन वस्तुओं का विभाजन नहीं है उनपर भी जन्म
मात्र से जातक का अधिकार रहेगा—फलतः
शौर्य भार्या धने चो भे यच्च विद्या धनं भवेत्
त्रीण्येतान्यविभाज्यानि प्रसादोयश्च पैतृकः ॥
शौर्य—भार्या—विद्या—ये ३ धनअविभाज्य हैं
तथा पैतृक प्रसाद भी परन्तु जन्म ग्रहण से क्या पिता की
शूरता या विद्या का विभाजन हो सकेगा।
मणि मुक्ता के स्वामी पिता पुत्र दोनों ही होते है।
अतः स्वत्व ( अधिकार ) जन्म से नहीं अपितु स्वामि नाश
से या विभाग से ही सम्भव है।
[ विशेष मिताक्षरा देखिये ]
―――
दाय विभाग
विभाग की प्रक्रिया—
विभागं चेत्पिता कुर्या दिच्छ या विभजेत्सुतान् ।
ज्येष्ठं वा श्रेष्ठ भागेन सर्वेवास्युः समांशिन ॥१॥
अन्वयः—चेत् पिता विभागं कुर्यात् इच्छया सुतान् विभजेत्
ज्येष्ठं वा श्रेष्ठ भागेन वा सर्वे समांशिनः स्युः ॥