दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary
जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा
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दाय विभाग
दाय शब्द से जो धन स्वामि सम्बन्ध से ही निमित्त बनकर
अन्य का स्व होता है वह २ प्रकार का है—
१—अप्रति बन्ध
२—सप्रति बन्ध
पुत्र या पौत्र के सम्बन्ध से जो पिता या पितामह का धन
अपना होता है वह अप्रतिबन्ध [ बिना रुकावट ] है ।
यदि चाचा आदि निः सन्तान हैं या स्वामी का अभाव है वह
‘स्व, सप्रतिबन्ध होता है ।
विभाग—
द्रव्य समुदाय विषयक अनेक स्वामियों की सम्पत्ति को एक
देश में व्य वस्थित करने को विभाग कहते हैं
दाय भाग का लक्षण—
वि भागो ऽ र्थस्य पित्र्यस्य तनयै र्यत्र कल्प्यते
दाय भाग इति प्रोक्तं व्यवहार पदं बुधैः ॥
स्वत्व—शास्त्रैक समधिगम्य है या लौकिक है यह विवाद
पूर्ण है परन्तु गौतम का कथन है कि यह शास्त्रैक समधि गम्य है—
स्वामी रिक्थ क्रय संविभाग परिग्रहा धिगमेषु, ब्राह्मण स्या-
धिकं लब्धं ‘क्षत्रियस्य विजितं’ निर्विष्टं वैश्य–शूद्रयोः ।
लौकिक—अर्थ क्रिया साधन होने से लौकिक है ।
यदि केवल शास्त्रैक समधि गम्य स्वत्व मान लिया जाय तो
अन्यायोपार्जित द्रव्य, असत्प्रति ग्रह लब्ध द्रव्य स्वत्व कभी न हो सकेगा
और न शास्त्र उसके विभाजन की ही आज्ञा देगा, परन्तु लोक इसे कब