दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary
जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा
प्रारंभिक भूमिका एवं दाय-स्वरूप मंगलाचरण
याज्ञवल्क्यस्मृति
दायभाग
टीकाकार
वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी
T 354
इन्स्टीट्यूट आफ ओरियन्टल फिलासफी
वृन्दावन ।
१९६६
CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
प्रकाशक :
इन्स्टीट्यूट आफ ओरियन्टल फिलासफी
वृन्दावन ( मथुरा )
मुद्रक :—
बैजनाथ दानो
लोक साहित्य प्रेस, मथुरा
दूरभाष संख्या २६४
CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
( २५ )
पति या श्वसुर ने स्त्री धन नदिया हो । यदि स्त्री धन दिया जा चुका है
तो दत्ते त्वर्धं प्रकल्पयेत् = दें देनें पर आधा दिया जाय ।
विशेषः---
१ यहां अर्ध शब्द समविभाग के वचन के लिये नहीं अपितु
पूर्व दत्त आधिवेदनिक के समजिनता हो उतना है ।
विभाग सन्देह होने पर निर्णय—
विभाग निह्नवे ज्ञाति बन्धु साक्ष्यभिलेखितैः
विभाग भावना ज्ञेयागृह क्षेत्रैश्च यौतकैः ।१४९।
अन्वयः----
विभाग निह्नवे ज्ञाति बन्धु साक्ष्यभि लिखितै विभाग
भावना ज्ञेया यौतकैः गृह क्षेत्रैश्च ॥
अर्थः--विभाग निह्नवे=विभाग छिपने पर, ज्ञाति--ज्ञाति
बन्धुः--पितृ बन्धु मातृ बन्धु, साक्षी, लिखितैः--विभाग पत्र से विभाग
भावना--विभाग निर्णय, ज्ञेया--जानना चाहिये । यौतकैः--पृथक् कृत,
गृह क्षेत्रैश्च--खेती आदि कार्य यज्ञादि धर्म स्वतन्त्रता से किये जा
सकते हैं ।
विशेष ----
१ जब तक बंटवारा न हो तब तक धर्म एक है विभक्त हो
जाने पर धर्म--श्राद्धादि भी पृथक् २ करने चाहिये ।
साक्षित्वंप्राति भाव्यं च दानं ग्रहण मेव च
विभक्ता भ्रातरः कुर्युर्नाविभक्ताः कथंचन ॥
[ ना० २३।४३ ]
—*—
CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
१३
...
...
...
...
...
: त्रैवार्षिकान्नशेषस्तु यस्य स्याद् ... ।
... स सोमं पातुमर्हति ॥
...
...
...
...
...
...
CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
SRI RUPA GOSVAMI'S
BHAKTI—RASAMRTA—SINDHUH
Text in Devnagari script, translitteration of the
Slokas, and English translation of the Text with
Three Commentaries.
By
Tridandi Swami Bhakti Hridaya Bon Maharaj,
Rector,
Institute of Oriental Philosophy, Vrindaban(U.P.)
Price : Rs. 32.00
शीघ्र प्रकाशित हो रही हैं:—
दाय भाग टीकाकार की अन्य कृतियां
१. महा कवि सोमनाथ
२. वृक्षारोपण
CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
शुभ सम्मति
प्राच्य प्रतीच्य विद्याविशारद श्री टीकम सिंह
तोमर एम. ए. अध्यक्ष—संस्कृत—हिन्दी
बलवन्त राजपूत कालेज, आगरा
अभी तक मुझे दाय भाग की कोई ऐसी टीका दृष्टिगोचर नहीं
हुई जो सर्वात्मना परीक्षार्थियों एवं मननार्थियों को उपयुक्त हो । दाय
भाग की व्याख्या की आवश्यकता इसलिये और भी अधिक थी कि
यह भाग अत्यधिक कठिन है । मिताक्षरा के ज्ञान के बिना यह प्रकरण
लिखा नहीं जा सकता । मिताक्षरा के जानने के लिये—व्याकरण
मीमांसा एवं धर्म शास्त्र के ज्ञान की अपेक्षा है ।
सौभाग्य से इन विषयों के अतिरिक्त भी अन्य शास्त्रों के भी
मर्मज्ञ ब्रज के प्रसिद्ध विद्वान्, एवं संस्कृत के उद्भट कविवर श्री वासु-
देव कृष्ण तुर्वेदी अध्यक्ष संस्कृत विभाग, इन्स्टीट्यूट ग्राफ ओरियन्टल
फिलासफी वृन्दावन द्वारा इसकी व्याख्या लिखी गई हैं । जिससे दाय
भाग के पाठकों एवं छात्रों को अत्यधिक लाभ होगा ।
मैं आशा करता हूँ कि यह विश्व विद्यालयों में सम्बन्धित पत्रों
में शीघ्र ही स्थान प्राप्त करेगी ।
लेखक का श्रम सराहनीय है
टीकम सिंह तोमर
CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
याज्ञवल्क्य स्मृति
दाय भाग
[ हिन्दी टीका सहित ]
टीकाकार
स्व० श्री श्रीवर शास्त्रि चतुर्वेद सूनु,
आचार्य वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी एम० ए० [सं० हि०]
नव्य व्याकरण-पुराण-इतिहास,-धर्म शास्त्र-सांख्य योग
साहित्य -वल्लभ वेदान्ताचार्य ३ खं०
अध्यक्ष, संस्कृत विभाग
इन्स्टीट्यूट आफ ओरियन्टल फिलासफी वृन्दावन
भूमिका
डा० हरिदत्त शास्त्री, एम० ए०एकादशतीर्थ
अध्यक्ष संस्कृत विभाग
डी. ए. वी. कालेज कानपुर
प्रकाशक
इन्स्टीट्यूट आफ ओरियन्टल फिलासफी
वृन्दावन
Rs 2 P 5 0
CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
समर्पणम्
श्री १००८ श्री मन्मध्व गौडेश्वराचार्यं
श्रीमद्भक्तिहृदयवनमहाराजानां करकमलेषु सादरम्
वन्द्य श्री भक्तिहृदयवनोपाह्व महर्षये
वासुदेवः स्वीयटीकां प्रश्रयेण समार्पिपत् ।
वासुदेव कृष्णः ।
CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
आमुख
CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
डा० हरिदत्त शास्त्री एम० ए० पी० एच० डी
संस्कृत वाङ् मय में स्मृतियों का अपना विशिष्ट स्थान है, भार-
तीय शासन व्यवस्था में, प्रत्यक्ष परोक्ष किसी न किसी रूप में ये अब
भी सहायक हैं ।
याज्ञवल्क्य स्मृति का प्रणयन याज्ञ वल्क्य महर्षि ने किया यह
सर्व विदित है । इस स्मृति पर मिताक्षरा टीका की सर्वाधिक प्रसिद्धि है ।
इसके प्रणेता विज्ञानेश्वर एवं अन्य कतिपय व्याख्याकारों का परिचय
यहाँ देना उचित ही होगा ।
विज्ञानेश्वर
इनके पिता का नाम पद्मनाभ भट्ट था । इनका
जन्म स्थान कल्याण पुर ( हैदराबाद ) था । विज्ञानेश्वर परमहंस
उत्तम के शिष्य थे, विक्रमादित्य देव या विक्रमार्क के ये समकालीन
थे क्यों कि इन्होंने उनका उल्लेख अपनी टीका के आरम्भ में किया है—
नासीदस्ति भविष्यति क्षिति तले कल्याण कल्प पुरम्
नो दृष्टः श्रुत एव वा क्षिति पतिः श्री विक्रमार्कोपमः
विज्ञानेश्वर पण्डितो न भजते किं चान्यदन्योपम—
श्चाकल्पं स्थिर मस्तु कल्प लतिका कल्प तदेतत्त्रयम् ॥
विज्ञानेश्वर लिखता है कि कल्याण पुर के समान अन्य कोई
नगर तो है और न 'होगा, और न विक्रमार्क की उपमा वाला अन्य कोई
विद्वज्जनप्रिय राजा ही है । इतना ही नहीं वह सुन्दर वक्ता एवं विद्वानों
के आश्चर्य की सीमा भी है—
स्रष्टा वाचां मधुर वपुषां विद्वदा श्चर्य सीम्नां
दातार्यानामतिशयजुषामर्थिसार्थार्थनीया
आच प्राचः समुद्रान्नत नृपति शिरोरत्न भा भा सुराङ्घ्रिः
पायादाचन्द्र तारं जगदिदमखिलं विक्रमादित्य देवः ॥
इनकी सुप्रसिद्ध कृति—'मिताक्षरा'— याज्ञवल्क्य स्मृति की
CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
( ४ )
टीका है। नाम से ही ज्ञात होता है कि यह एक संक्षिप्त विवरण
वाली रचना है, पूर्व मीमांसा के अनेक गूढ विषयों के विवेचन से
स्पष्ट होता है कि ये पूर्व मीमांसा के पूर्ण ज्ञाता थे। धर्मशास्त्र साहित्य
में इसका अनुपम स्थान हैं, पतञ्जलि कृत महाभाष्य, मम्मट कृत
काव्य प्रकाश, शङ्कर कृत भाष्य का जो सम्मान है वही मिताक्षरा
का है।
मिताक्षरा के विषय परिशीलन से ज्ञात होता है कि सहस्त्रों
वर्ष पूर्व के मतों का सार ग्रहण करके अपनी बुद्धि के ढांचे में ऐसा
ढाला जिसमे अनेक सिद्धान्तों का विकास हुआ। यह ग्रन्थ न केवल
याज्ञवल्क्य स्मृतिका एक भाष्य मात्र है अपितु यह एक स्मृति सम्बन्धी
निबन्ध है। मिताक्षरा में—प्रसहाय—विश्व रूप, मेधातिथि, श्रीकर,
भारुवि, तथा भाजदेव का नामोल्लेख है। पाणिनि—प्राभाकर का
नाम भी प्राप्त होता है।
देवणण भट्ट की स्मृति चन्द्रिका जिसकी रचना लग-भग १२००
ई० है, ने मिताक्षरा के सिद्धान्तों का उल्लेख किया है, लक्ष्मी धर के
कल्पतरु में विज्ञानेश्वर का नाम है इस ग्रन्थ की रचना १२ वीं.
शताब्दी के मध्य मानी गई है। विश्वरूप मेधातिथि धारेश्वर के नाम
मिताक्षरा में हैं अतः यह १०५० के पश्चात तथा १२ई० के पूर्व लगभग
११२० की रचना मानी जा सकती है
१०७०—११०० ई० के मध्य अन्य प्रमाणों के अनुसार म
जाता है। विज्ञानेश्वर के अनेक भाष्य हुए जिसमें विश्वेश्वर—
पण्डित एवं बालम्भट्ट के नाम अति प्रसिद्ध हैं।
विश्वेश्वर भट्ट—द्रविड़ देश के निवासी थे। आधुनिक
कानून की बनारसी शाखा के विश्वेश्वर भट्ट एक नामी प्रा
लेखक माने जाते हैं। याज्ञवल्क्य की मिताक्षरापर इन्होंने सु
नामक टीका लिखी है—इसके अतिरिक्त इन्होंने—तिथिनि
स्मृति कौमुदी, स्मृति महार्णव, मदन पारि जात नामक ग्रन्थ
CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
थे । इनके आश्रय दाता—मदनपाल राजा थे ।
नन्द पण्डित
ये दक्षिण के मूल निवासी थे, पश्चात् बनारस में आकर रहे
थे । इन्होंने सहारन पुर के सहगिल कुल के परमानन्द के आग्रहपर--
श्राद्ध कल्पलता का महेन्द्र कुल के हरिवंश वर्मा के आग्रहपर स्मृति
सिन्धु, का एवं मधुरा के केशब नायक के आग्रहपर बैजयन्ती का
प्रणयन किया ।
पराशर स्मृति पर—विद्वन्मनोहरा, तथा मिताक्षरा पर
एक भाष्य लिखा जिसे प्रमिताक्षरा या प्रतीताक्षरा कहते है । कहीं कहीं
मिताक्षरा का खण्डन भी किया है । दत्तक मीमांसा के कारण इनकी
अत्यधिक प्रसिद्धि हुई । इनका रचना काल १५६५ से १६३० ई पर्यन्त
माना जाता है ।
बाल म्भट्टी
बालकृष्ण का ग्रन्थ ही बालम्भट्टी के नाम से प्रसिद्ध है ।
इनका काल १७३०-एवं १८२० ई के मध्य कहा जा सकता है ।
कतिपय विद्वान् इन्हें वैद्यनाथ पायगुण्डे (जो नागेश भट्ट के प्रसिद्ध
शिष्य थे) का पुत्र मानते हैं, पर अभी पूर्ण परिचय प्राप्त नहीं बालं-
भट्टी मिताक्षरा पर भाष्य है, किंवदन्ती है कि इसका प्रणयन लक्ष्मी
देवी ने किया । कुछ विद्वान् बालकृष्ण की माता का नाम लक्ष्मी
तथा वैद्यनाथ की रचना मानते हैं अतः इस विषय में अभी अधिक
नहीं लिखा जा सकता ।
अपरादित्य याअपरार्क—
याज्ञ वल्क्य की बिस्तृतटीका है, मिताक्षरा से इसका
CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
ग्राकार अधिक बड़ा है, ये जीमूत वाहन कुल में उत्पन्न राजाशिलाहार
अपरादित्य कहे जाते हैं । समय १०.-१२०० ई० के मध्य ।
शूलपाणि—
ने याज्ञ वल्क्य स्मृति पर दीपकलिका नामक टीका लिखी है
इनका समय १३१५—१४४० ई० ३० माना जाता है । साहु डियाल
ब्राह्मणों में इन्हें माना जाता है, इनकी दायभाग कृति में विभिन्न
ग्रन्थ कारों के नाम उपलब्ध होते हैं । ।
कुल्लूक भट्ट—
मनु स्मृति की प्रसिद्ध टीका मन्वर्थ मुक्तावली के रचयिता
कुल्लूक भट्ट हैं, इनका भाष्य संक्षिप्त, स्पष्ट एवं उद्देश्य पूर्ण कहा जा
सकता है । पूर्व व्याख्या कारों का कहीं कही उल्लेख करते हुए उनकी
कटु आलो चना भी की है । ये बंगाल के वारेन्द्र कुल में नन्दन निवासी
भट्ट दिवाकर के पुत्र कहे जाते हैं । पण्डितों की सन्निधि में यह भाष्य
वाराणसी में लिखा गया है जैसा कि निम्नलिखित श्लोक से स्पष्ट है ।
गौडे नन्दन वासिनाम्नि सुजनै र्वन्द्य वरेन्द्र यां कुले
श्री मद्भट्ट दिवाकरस्य तनयः कुल्लूक भट्टोऽभवत्
काश्यामउत्तर वाहि जन्हु तनया तीरे समं पण्डितै—
स्तेनेयं क्रियते हिताय विदुषां मन्वर्थ मुक्तावली ।।
मनु सर्वज्ञ हैं मैं अल्पज्ञ, तथापि अन्य टीका कारों के प्रसंग से
टीका लिखने का साहस कर रहा हूँ ।
सर्व ज्ञस्य मनो रसर्वविदपि व्याख्यामि यद्वाङ् मयं
युतया तद्बहुभिर्यतो मुनिवरैरेतद्वहुव्याहृतम्
तां व्याख्यामधुनातनैरपिकृतां न्याय्यां ब्रुवाणास्तमे
CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
भक्त्या मानव वाङ्मये भवभिदे भूयादशेषेश्वरः ॥
टीका कार सब शस्त्रों का ज्ञाता था—
मीमाँसे बहु सेवितासि सुहृदस्तर्काः समस्ताः स्थ मे
वेदान्ताः परमात्मबोध गुरवो यूयं मयोपासिताः
जाता व्याकरणानि बालसखिता युष्माभिरम्यर्थये
प्राप्तोऽयं समयो मनूक्त विवृतौ साहाय्यमालम्ब्यताम् ॥
मानव वृतावस्यां ज्ञे या व्याख्या नवा मयोद्भिन्ना
प्राचीनाः अभिरुचिरा व्याख्यातॄणामशेषाणाम् ॥
गोविन्द राजा
१०५०—११६० ई० के मध्य
इनके पिता का नाम माधव था । य गंगा किनारे के रहने वाले
थे । बनारस के राजा की तुलना कुछ लोग इन से करते थे उसका
पी. वी. काने महोदय ने खण्डन किया है, क्यों कि राजा क्षत्रिय थे ।
और गोविन्द राज ब्राह्मण ।
दाय भाग की विषय वस्तु—दाय की परिभाषा, पूर्वजों की
सम्पति पर पिता का प्रभाव या स्वत्व पिता या पिता मह की सम्पति
का विभाजन, पिता की मृत्यु के उपरान्त भाइयों में बंटवारा, स्त्री धन
की परिभाषा, श्रेणी करण एवं निक्षेपण, असमर्थता के कारण दाय
एवं बटवारे से कौन लोग पृथक् किये जा सकते हैं, पुत्र हीन के अधिकार
की विधि, गुप्त धन प्राप्त होने पर रिक्थाधि कारियों में वंट वारा
विभाजन प्रकाशन ।
मिताक्षरा दाय भाग से अनेक वैधर्म्य जीमूत वाहन कृत
दायभाग में उपलब्ध हैं । दायभाग में पैतृकसम्पत्ति पर जन्म से ही
अधिकार नहीं हैं ।