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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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पृष्ठ 17

CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
१ अथर्व वेद में, धर्म शब्द का प्रयोग धार्मिक क्रिया संस्कार
करने से अर्जित गुण के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । ऐतरेय ब्राह्मण में धर्म
शब्द सकल धार्मिक कर्तव्य के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । २ छान्दोग्य के
अनुसार धर्म त्रिविध है, (१) यज्ञ-दान, अध्ययन । (२) तपस्या अर्थात्
तापस धर्म (३) ब्रह्मचर्य । यह धर्म शब्द आश्रमों के विलक्षण कर्तव्यों
की ओर संकेतित हैं । धर्म शब्द का अर्थ समय समय पर परिवर्तित
भी होता रहा है । सुप्रसिद्ध स्मृतिकार मनु ने वर्णधर्म-आश्रम धर्म-
वर्णाश्रम धर्म नैमित्तिक धर्म-गुण धर्म माने हैं ।
याज्ञवल्क्य आदि स्मृतिकारों ने भी धर्म के इस विकसित रूप
का विवेचन किया है । याज्ञवल्क्य की टीकाओं में विज्ञानेश्वर की
मिताक्षरा का सर्वत्र सम्मान है ।
विभिन्न परी क्षाओं में यह ग्रन्थ निर्धारित हैं, इसस्मृतिका
उपयोगी अंश दाय भाग है, बंगाल के भाग के अतिरिक्त अन्यत्र
भारतीय व्यवहार में इस मिताक्षरा का अत्यधिक आदर है ।
याज्ञ वल्क्य वैदिक ऋषि परंपरा में हैं । मिताक्षरा कार का
कथन है कि याज्ञ वल्क्य के किसी शिष्य ने धर्म शास्त्र को संक्षिप्त
करके कथनोपकथन के रूप में रखा है । याज्ञ वल्क्य स्मृति में १००६
श्लोक है । यह स्मृति मनुस्मृति से कलेवर में सूक्ष्म है । मनुस्मृति में
२७०० श्लोक है । यह स्मृति अनुष्टुप् छन्द में लिखी गई है । मिताक्षरा
कार ने याज्ञ वल्क्य की प्रतिभा का समुज्ज्वल रूप ही प्रदर्शित किया
है, दाय भाग में —
बंटवारा-इसका समय, विभाजन में स्त्री भाग, पिता मृत्यु
के बाद बँटवारा, विभाजन योग्य सम्पत्ति, पिता पुत्र का संयुक्त स्वा-
मित्व बारह प्रकार के पुत्र, शूद्रका अनौरस पुत्र, पुत्र हीन पिता के
१-अथ-६।६।१७
२-ऐत-ब्राः ७।१७