दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary
जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा
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चेत्=जब पिता विभाग करे, इच्छया=इच्छा पूर्व,
सुतान्=पुत्रों को विभजेत्=पृथक् कर दे । ज्येष्ठं वा श्रेष्ठ भागेन
बड़े लड़के को श्रेष्ठ भाग से, वा सर्वे सभांशिनः स्युः=अथवा सब
पुत्रों को समान अंश दे ।
विशेषः—
[ ज्येष्ठं = ज्येष्ठ को ज्येष्ठ भाग, मध्यम को मध्यम, कनिष्ठ
को कनिष्ठ भाग दिया जाय यह तात्पर्य है ]
मनु का कथन भी इसमें सम्मत है कि बड़े पुत्र को अधिक
दिया जाय—
"ज्येष्ठस्य विंश उद्धारः"
नारद का कथन है—विभाजन—पिता तथा माता की
मृत्यु के उपरान्त होवे । यदि पिता अधर्मी हो अथवा रोग ग्रस्त हो
माता रजोधर्म युक्त होती हो तब भी पुत्रों की इच्छा से विभाग हो
जाता है।
पिता की ईच्छा से २ प्रकार का विभाग दिखाया एक सम
दूसरा विषम सम विभाग में विशेष दृष्टव्य—
यदि कुर्यात् समानंशान् पत्न्यः कार्याः समांशिकाः
न दत्तं स्त्रो धनं यासाँ भर्त्रा वा श्वशुरेण वा ॥२॥
अन्वयः—यदि [पिता] समानंशान् कुर्यात् पत्न्यः समांशिकाः कार्या
यासां भर्ता वा श्वशुरेण वा स्त्री धनं न दत्तम् । यदि=जब पिता
सब, लड़कों को, समानंशान् कुर्यात्=सम विभाजन करता है तो
पत्न्यः=पत्नियों का समांशिकाः कार्याः=अंश भी पुत्रों के समान
करना चाहिये । यासां =जिन पत्नियों को 'भर्त्रा वा श्वशुरेण,=पति-
या श्वशुर ने, स्त्री धनं न दत्तम्=स्त्री धन न दिया हो ।