दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary
जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा
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( ४ )
१. यदि स्त्री धन दिया गया हो तो पत्नि का अंश होगा
२. पत्न्यः-में बहुवचन है अतः सौतेली माता का भी
अधिकार है ।
३. यदि ज्येष्ठ को श्रेष्ठ भाग दिया गया हो तो पत्नि का
श्रेष्ठादि भाग में अंश न होगा ।
४. स्त्री धन के विषय में आपस्तम्ब का भी कथन है—
परीभांडं च गृहे ऽलंकारो भार्यायाः
( धः २।१४।६)
ज्येष्ठं वा श्रेष्ठ भागेन का अपवाद—
शक्तस्यानीह मानस्य किंचिद्दत्वा पृथक क्रिया
न्यूनाधिक विभक्तानां धर्म्यः पितृ कृतः स्मृतः ॥३॥
अन्वयः—शक्तस्य अनीहमानस्य किंचित् दत्वा पृथक् क्रिया
न्यूनाधिक विभक्तानां धर्म्यः पितृ कृतः स्मृतः । शक्तस्य = जो स्वयमेव
द्रव्य अर्जन करने में समर्थ है, तथा अनीहमानस्य = पितृ द्रव्य में से
अंश नहीं चाहता, उसे भी किंचिद्दत्वा = सार शून्य वस्तु भी देकर
पृथक् क्रिया = विभाग करना चाहिये-[ जिससे उसके लड़कों को
विभाजन में स्पृहान रहे ]
न्यूनाधिक विभक्तानां = अल्प तथा अधिक अंश का विभा-
जन धर्म्यः = धर्म शास्त्रोक्त क्रम से किया गया-पितृ कृतः स्मृतः = पितृ
कृत विभाजन अपरिवर्तिनीय होगा ।
विशेषः—
१-विभाजन मान्य वही है जो शास्त्र पूर्वकहो
२-यदि रोग ग्रस्त पिता है, कुपित या विषयासक्त वा
शास्त्र मर्यादा का अतिक्रमण करता हैं तो विभाजन उचित नहीं