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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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पृष्ठ 28

CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
अविभाज्य धन
पितृ द्रव्याबिरोधेन यदन्यत्स्वयमर्जिमम्
मैत्रमौद्वाहिकं चैव दायादानां न तद्भवेत् ॥५॥
अन्वय सरल है—
पितृ द्रव्य अविरोधेन = माता पिता के द्रव्य का विना
विनाश किये, यदन्यत् स्वय मर्जितम् = जो धन स्वयं पैदा किया है
मैत्रं = मित्र से प्राप्त, औद्वाहिकं = विवाह में प्राप्त, दायादानां =
भाइयों का, न तद्भवेत् = नहीं होता ।
विशेष:—
१—पितृ द्रव्याविरोधेन का अन्वय प्रत्येक के साथ
लगाना चाहिये ।
क्रमादभ्यागतं द्रव्यं तहृभप्युद्धरेत्तु यः ।
दायादेभ्यो न तद्दद्याद्विद्यया लब्धमेव च ॥६॥
क्रमादभ्यागतं द्रव्यम् = पितृ परम्परा से प्राप्त द्रव्य, हृत-
मपि = कोई लेकर निषेध करता हो उसे, यः उद्धरेत्तु = उससे निकल
वाये विद्यया लब्ध मेवच = विद्या से प्राप्त किया धन दायादेभ्यो =
भाइयों को, नदद्यात् = नहीं दिया जा सकता ।
विशेष:—
१—क्षेत्र में चतुर्थांश उद्धर्त्ता का शेष सब भाइयों का
समान होगा
२—अविरोध का आशय है कि पिता के विरोध से प्राप्त
किया प्रतिग्रहभी सम विभाज्य होगा ।
३—मनुने भी इसे स्वीकार किया है—
अनुपघ्नन् पितृ द्रव्यं श्रमेण यदुपार्जितम्
दायादेभ्यो न तद्दद्याद्विद्यया लब्ध मेव च ॥
मनुः ६। २०८