दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary
जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा
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,, ,, वैश्या में उत्पन्न प्रत्येक-२-२ भाग लें
,, ,, शूद्रा में उत्पन्न प्रत्येक-१-१ भाग लें
ब्राह्मण चारों वर्ण की पत्नी रख सकता है, क्षत्रिय, ३ वर्ण
की वैश्य २ वर्ण की शूद्र एक ही ।
१- ब्राह्मण से उत्पन्न क्षत्रियादि वर्ण की पत्नी में उत्पन्न
सुत को भूमि प्राप्ति का अधिकार नहीं है यदि पिता दे भी दे तो
उसकी मृत्यु के पश्चात् उनसे वापिस लेने का ब्राह्मणी पुत्र को
अधिकार है ।
सर्व विभाग शेष व्यवस्था—
अन्योन्यापहृतं द्रव्यं विभक्ते यत्तु दृश्यते
तत्पुनस्ते समैरंशैर्विभजेरन्निति स्थितिः ॥१३॥
अन्वय सरल है ।
अन्योन्यापहृतं द्रव्यं = सबका मिश्रित धन परस्पर हरण
किया गया भी—विभक्ते ० ==विभक्त हो जाने पर दिखाई दे जाय,
तत्पुनस्ते समैरंशैः—तो उसे फिर से समान अंशों के द्वारा, विभजेरन्
इतिस्थितिः = बांट ले यह शास्त्र मर्यादा है ।
विशेषः—
१—जिस पर वह धन दिखाई दे उसे भाग न दिया जाय
२—समुदाय में स्थित द्रव्य का अपहरण दोष जनक नहीं
३—मनु के मतानुसार ज्येष्ठ यदि अपहरण करे तो दोष
भागी है कनिष्ठ नहीं ।
(मनु०६। २१३)
४—साधारण द्रव्य जिसमें निज अधिकार भी है ग्रहण
करने में दोष नहीं ।