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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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पृष्ठ 31

CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
अन्वय-सरल है—
पितृभ्यां = माता पिता ने, पूर्व विभक्त पुत्रों में किसो को
यद्दत्तं = जो कुछ अलंकारादि दिया, हो तत्तस्यैवधनं भवेत्-वह उसी का
धन होगा ।
पिता के मरण पश्चात् विभाग में माता काभी अंश है—
पितुरूर्ध्वं विभजतां = पिता के ऊर्ध्वलोक जाने के पश्चात्
माताप्यंश समं हरेत् = माता भी समान अंश ग्रहण करे ।
१—यदि स्त्री धन प्राप्त न हो तभी समान अंश है अथवा
“दत्ते त्वर्द्धांशहारिणी” अर्ध अंश की अधिकारिणी है ।
पिता के मरजाने पर असंस्कृत भाई हैं तो उनके संस्कार
की व्यवस्था—
असंस्कृतास्तु संस्कार्या भ्रातृभिः पूर्व संस्कृतैः
भगिन्यश्च निजादंशाद्दत्त्वैशंतु तुरीयकम् ।११।
अन्वयः—
असंस्कृतास्तु पूर्व संस्कृतैः भ्रातृभिः संस्कार्या
भगिन्यश्च निजादंशात् तुरीयकम् अंशं दत्वा
[ संस्कार्या ]
पिता के पश्चात् विभक्त होने वाले भाइयों को = पूर्व
संस्कृतैः = जिनका पहिले संस्कार हो चुका है, असंस्कृताः = असंस्कृत
भाइयों का संस्कार्या = संस्कार करना चाहिये । भगिन्यश्च = बहिनों
को भी, यदि उनका संस्कार नहीं हुआ है तो संस्कार कराना चाहिये
निजादंशात् तुरीयकम् दत्त्वा—अपने अंश से चतुर्थ भाग निकाल कर
विशेषः—
१-कन्या ब्राह्मणी है तो ब्राह्मण भाई का अंश ¼ लेगी