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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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पृष्ठ 27

CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
माना जायगा ।
कहाभी है—व्याधितः कुपितश्चैव विषयासक्त मानसः
अन्यथा शास्त्रकारी च न विभागे पिता प्रभुः ।
[ नारदः १३।१६ ]
विभजेरन् सुताः पित्रोरूर्ध्व रिक्थं ऋणं समम्
मातुर्दुहितरः शेषमृणात् ताभ्य ऋतेऽन्वयः ।४।।
अन्वयः—
पित्रो रूर्ध्वं सुताः समम् रिक्थम् ऋणं विभजेरन्, ऋणात्
शेषं मातु र्दुहितरः ताभ्य ऋते अन्वयः ।
पित्रोरूर्ध्व = माता पिता के मरने के बाद, सुताः = पुत्र
समम् = समान रूप से रिक्थम् = धन, ऋणं = ऋण को विभजेरन् =
बांट लें । ऋणात् शेष = मातृकृत ऋण चुकाकर मातुः = माता का
द्रव्य — दुहितर = लड़की बांट लें, ताभ्य ऋते = लड़कियों के अभाव
में, अन्वयः = पुत्रादि सन्तति ले ।
विशेषः—
१—मनु ने ज्येष्ठ का अधिक अंश लिखा था यहां समान है
२—विषम विभाग शास्त्रीय होने पर भी लोक दृष्टि में
मान्य न होता अतः
अस्वर्ग्य लोक विद्विष्टं धर्म्यमप्याचरेन्नतु
आ० १५६ आप स्तंब
वाक्य का समाधान भी इसमें किया गया है
३—स्त्री धन दुहितृ गामी होता है क्योकि दुहिता में माता
का शारीरिक अंश भी तो अधिक होता है ।
४—गौतम ने कन्याओं के भी २ विभाग किये हैं प्रति
ष्ठित अप्रतिष्ठित, इनमें प्रथम अधिकार निर्धन का है । अविवाहिता
का सर्व प्रथम अधिकार है ।