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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
विज्ञानेश्वर की देन—
विज्ञानेश्वर ने दाय को अप्रतिबन्ध तथा सप्रतिबन्ध नामक
२ भागों में बाँटा है तथा बल पूर्वक कहा है कि पुत्र पौत्र एवं प्रपौत्र
वसीयत पर अधिकार जन्म से ही पाते हैं, जीमूत वाहन के मतों के
सर्व था विरोध में है ।
इनके शिष्य का नाम नारायण था, मिताक्षरा में विभाजन
के ४ अवसर बताये गये हैं किन्तु नारायण ने केवल २ अवसरों की
चर्चा की है ! पिता की इच्छा, तथा पुत्र या पुत्रों की इच्छा
तथा पिता की इच्छा पर उसमें और पुत्रों में विभाजन हो सकता
है । पति के अधिकार पर विधवाका अधिकार हो जाता है चाहें पतिके
भाई के साथ संयुक्त धन ही क्यों न हो, रिक्थाधिकार मृत व्यक्ति को
पिण्ड दान करने पर निर्भर करता है जीमूत वाहन का दायभाग,
बंगाल में अत्यधिक सम्मान प्राप्त कर चुका है इनका समय १०६०—
११३० के मध्य माना जाता है ।
मिताक्षरा की जी मूत वाहन ने आलोचना की है कहें तो
कोई अत्युक्ति नहीं ।
याज्ञवल्क्य स्मृति का समस्त भारत वर्ष के न्यायालयों में आज
भी सम्मान बना हुआ है यह इसके सर्वाधिक वैशिष्ट्य का द्योतक है ।
यह तो निर्विवाद है कि इनस्मृतियों में धर्म का विवेचन हुआ
है । धर्म एक ऐसा शब्द है जिसकी परिभाषा करना बड़ा कठिन है ।
वेद में धर्मन् शब्द का प्रयोग विशेषण या संज्ञा के रूप में आया है
धर्मन् शब्द, धृ धातु से बना है । जिसका तात्पर्य है धारण करना
आलम्बन देना, पालन करना, ऋग्वेद में यह शब्द पुल्लिंग तथा न०पुंसक
लिंग दोनों में ही व्यवहृत है ।