सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
दादू कहै सीख सुन मेरी, कहु करीम संभाल सबेरी ॥ 4 ॥
337. भंगताल
बार बार तन नहीं वावरे, काहे को बाद गँवावै रे ।
बिनसत बार कछू नहिं लागै, बहुरि कहाँ को पावै रे ॥ टेक ॥
तेरे भाग बड़े भाव धर कीन्हाँ, क्यों कर चित्र बनावै रे ।
सो तूँ लेइ विषय में डारे, कंचन छार मिलावै रे ॥ 1 ॥
तूँ मत जानै बहुरि पाइये, अब कै जनि डहिकावै रे ।
तीनि लोक की पूँजी तेरे, बनिज बेगि सो आवै रे ॥ 2 ॥
जब लग घट मैं श्वास वास है, तब लग काहे न ध्यावै रे ।
दादू तन धर नाम न लीन्हा, सो प्राणी पछतावै रे ॥ 3 ॥
338. ललित ताल
राम विसार्यो रे जगनाथ ।
हीरा हार्यो देखत ही रे, कौड़ी कीन्ही हाथ ॥ टेक ॥
काचहुता कंचन कर जानै, भूल्यो रे भ्रम पास ।
साचे सौं पल परिचय नाहीं, कर काचे की आस ॥ 1 ॥
विष ताको अमृत कर जानै, सो संग न आवै साथ ।
सेमल के फूलन पर फूल्यो, चूक्यो अब की घात ॥ 2 ॥
हरि भज रे मन सहज पिछानै, ये सुन साची बात ।
दादू रे अब तैं कर लीजै, आयु घटै दिन जात ॥ 3 ॥
339. मन । ललित ताल
मन चंचल मेरो कह्यो न मानै, दसों दिशा दौरावै रे ।
आवत जात बार नहि लागै, बहुत भाँति बौरावै रे ॥ टेक ॥
बेर बेर बरजत या मन को, किंचित सीख न मानै रे ।
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
ऐसे निकस जाइ या तन तैं, जैसे जीव न जानै रे ॥ 1 ॥
कोटिक जतन करत या मन को, निश्चल निमष न होई रे ।
चंचल चपल चहुँ दिशि भरमै, कहा करै जन कोई रे ॥ 2 ॥
सदा सोच रहत घट भीतर, मन थिर कैसे कीजे रे ।
सहजैं सहज साधु की संगति, दादू हरि भजि लीजे रे ॥ 3 ॥
३४०. माया । उत्सव ताल
इन कामिनी घर घाले रे ।
प्रीति लगाइ प्राण सब सोषै, बिन पावक जिय जाले रे ॥ टेक ॥
अंग लगाइ सार सब लेवै, इनतैं कोई न बाचै रे ।
यहु संसार जीत सब लीया, मिलन न देई साचै रे ॥ 1 ॥
हेत लगाइ सबै धन लेवै, बाकी कछु न राखै रे ।
माखन मांहि सोध सब लेवै, छाछ छिया कर नाखै रे ॥ 2 ॥
जे जन जानि जुगति सौं त्यागैं, तिन को निज पद परसै रे ।
काल न खाइ, मरै नहिं कबहुँ, दादू तिनको दरशै रे ॥ 3 ॥
३४१. विश्वास । उत्सव ताल
जनि सत छाड़ै बावरे, पूरक है पूरा ।
सिरजे की सब चिन्त है, देबे को सूरा ॥ टेक ॥
गर्भवास जिन राखिया, पावक तैं न्यारा ।
युक्ति यत्न कर सींचिया, दे प्राण अधारा ॥ 1 ॥
कुंज कहाँ धर संचरै, तहाँ को रखवारा ।
हिमहर तैं जिन राखिया, सो खसम हमारा ॥ 2 ॥
जल थल जीव जिते रहैं, सो सब को पूरै ।
संपट सिला में देत है, काहे नर झूरै ॥ 3 ॥
जिन यहु भार उठाइया, निर्वाहै सोई ।
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
दादू छिन न बिसारिये, तातैं जीवन होई ॥ 4 ॥
342. गजताल
सोई राम सँभाल जियरा, प्राण पिंड जिन दीन्हा रे ।
अम्बर आप उपावनहारा, मांहि चित्र जिन कीन्हा रे ।। टेक ।।
चंद सूर जिन किये चिराका, चरणों बिना चलावै रे ।
इक शीतल इक तारा डोलै, अनन्त कला दिखलावै रे ।। 1 ।।
धरती धरनि वरन बहु वाणी, रचिले सप्त समंदा रे ।
जल थल जीव सँभालनहारा, पूर रह्या सब संगा रे ।। 2 ।।
प्रकट पवन पानी जिन कीन्हा, वरषावै बहु धारा रे ।
अठारह भार वृक्ष बहु विधि के, सबका सींचनहारा रे ।। 3 ।।
पाँच तत्त्व जिन किये पसारा, सब करि देखन लागा रे ।
निश्चल राम जपो मेरे जियरा, दादू तातैं जागा रे ।। 4 ।।
343. परिचय । गज ताल
जब मैं रहते की रह जानी ।
क ाल काया के निकट न आवै, पावत है सुख प्राणी ।। टेक ।।
शोक संताप नैन नहिं देखूं, राग द्वेष नहिं आवै ।
जागत है जासों रुचि मेरी, स्वप्नै सोइ दिखावै ।। 1 ।।
भरम कर्म मोह नहिं ममता, वाद विवाद न जानूं ।
मोहन सौं मेरी बन आई, रसना सोई बखानूं ।। 2 ।।
निशिवासर मोहन तन मेरे, चरण कँवल मन जानै ।
निधि निरख देख सचु पाऊँ, दादू और न जानै ।। 3 ।।
344. राज मृगांक ताल
जब मैं साँचे की सुधि पाई ।
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तब तैं अंग और नहीं आवै, देखत हूँ सुखदाई ॥ टेक ॥
ता दिन तैं तन ताप न व्यापै, सुख दुख संग न जाऊँ ।
पावन पीव परस पद लीन्हा, आनंद भर गुन गाऊँ ॥ 1 ॥
सब सौं संग नहीं पुनि मेरे, अरस परस कुछ नाँहीं ।
एक अनंत सोई संग मेरे, निरखत हूँ निज मांहीं ॥ 2 ॥
तन मन मांहिं शोध सो लीन्हा, निरखत हूँ निज सारा ।
सोई संग सबै सुखदाई, दादू भाग्य हमारा ॥ 3 ॥
345. सच निदान । राज मृगांक ताल
हरि बिन निहचल कहीं न देखूं, तीन लोक फिरि सोधा रे ।
जे दीसै सो विनश जायगा, ऐसा गुरु परमोधा रे ॥ टेक ॥
धरती गगन पवन अरु पानी, चंद सूर थिर नाँहीं रे ।
रैनि दिवस रहत नहिं दीसै, एक रहै कलि मांहीं रे ॥ 1 ॥
पीर पैगम्बर शेख मुशायख, शिव विरंचि सब देवा रे ।
कलि आया सो कोई न रहसी, रहसी अलख अभेवा रे ॥ 2 ॥
सवा लाख मेरु गिरि पर्वत, समंद न रहसी थीरा रे ।
नदी निवान कछू नहिं दीसै, रहसी अकल शरीरा रे ॥ 3 ॥
अविनाशी वह एक रहेगा, जिन यहु सब कुछ कीन्हा रे ।
दादू जाता सब जग देखूं, एक रहत सो चीन्हा रे ॥ 4 ॥
346. पतिव्रत । राज विद्याधर ताल
मूल सींच बधै ज्यों बेला, सो तत तरुवर रहै अकेला ॥ टेक ॥
देवी देखत फिरै ज्यों भूलै, खाइ हलाहल विष को फूलै ।
सुख को चाहे पड़ै गल फाँसी, देखत हीरा हाथ तैं जासी ॥ 1 ॥
केई पूजा रच ध्यान लगावैं, देवल देखें खबर न पावैं ।
तोरैं पाती जुगति न जानी, इहि भ्रम भूल रहै अभिमानी ॥ 2 ॥
श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
तीर्थ व्रत न पूजै आसा, वन खंड जाहिं रहैं उदासा ।
यूं तप कर-कर देह जलावैं, भरमत डोलैं जन्म गवावैं ॥ ३ ॥
सतगुरु मिलै न संशय जाई, ये बँधन सब देइ छुड़ाई ।
तब दादू परम गति पावै, सो निज मूरति मांहि लखावै ॥ 4 ॥
347. साधु परीक्षा । दादरा
सोई साधु शिरोमणि, गोविंद गुण गावै ।
राम भजै विषिया तजै, आपा न जनावै ॥ टेक॥
मिथ्या मुख बोलै नहीं, पर निंदा नाँहीं ।
औगुण छाड़ै गुण गहै, मन हरि पद माहीं ॥ 1 ॥
निर्वैरी सब आतमा, पर आतम जानै ।
सुखदाई समता गहै, आपा नहीं आनै ॥ 2 ॥
आपा पर अंतर नहीं, निर्मल निज सारा ।
सतवादी साचा कहै, लै लीन विचारा ॥ 3 ॥
निर्भय भज न्यारा रहै, काहू लिप्त न होई ।
दादू सब संसार में, ऐसा जन कोई ॥ 4 ॥
348. परिचय परीक्षा । पतिताल
राम मिल्या यूँ जानिये, जाको काल न व्यापै ।
जरा मरण ताको नहीं, अरु मेटै आपै ॥ टेक ॥
सुख दुख कबहूँ न ऊपजै, अरु सब जग सूझै ।
क रम को बाँधै नहीं, सब आगम बूझै ॥ 1 ॥
जागत है सो जन रहै, अरु जुग जुग जागै ।
अंतरजामी सौं रहै, कछु काई न लागै ॥ 2 ॥
काम दहै सहजैं रहै, अरु शून्य विचारै ।
दादू सो सब की लहै, अरु कबहूं न हारै ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
३४९. समता ज्ञान । त्रिताल
इन बातनि मेरा मन मानै ।
दुतिया दोइ नहीं उर अंतर, एक एक कर पीव कौं जानै ॥ टेक ॥
पूर्ण ब्रह्म देखै सबहिन में, भ्रम न जीव काहू तैं आनै ।
होइ दयालु दीनता सब सौं, अरि पाँचनि को करै किसानै ॥ 1 ॥
आपा पर सम सब तत चीन्हैं, हरि भजै केवल जस गानै ।
दादू सोई सहज घर आनै, संकट सबै जीव के भानै ॥ 2 ॥
३५०. परिचय । एक ताल
ये मन मेरा पीव सौं, औरनि सौं नाँहीं ।
पीव बिन पलहि न जीव सौं, यह उपजै मांहीं ॥ टेक ॥
देख देख सुख जीव सौं, तहँ धूप न छाहीं ।
अजरावर मन बंधिया, तातैं अनत न जाहीं ॥ 1 ॥
तेज पुंज फल पाइया, तहाँ रस खाहीं ।
अमर बेलि अमृत झरै, पीव पीव अघाहीं ॥ 2 ॥
प्राणपति तहँ पाइया, जहाँ उलट समाई ।
दादू पीव परचा भया, हियरे हित लाई ॥ 3 ॥
३५१. त्रिताल
आज प्रभात मिले हरि लाल ।
दिल की व्यथा पीड़ सब भागी, मिट्यो जीव को साल ॥ टेक ॥
देखत नैन संतोष भयो है, इहै तुम्हारो ख्याल ॥ 1 ॥
दादू जन सौं हिल-मिल रहिबो, तुम हो दीन दयाल ॥ 2 ॥
३५२. (सिंधी) निज स्थान निर्णय । उपदेश एकताल
अर्श इलाही रब्बदा, इथांई रहमान वे ।
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
मक्का बीचि मुसाफरीला, मदीना मुलतान वे ॥ टेक ॥
नबी नाल पैगम्बरे, पीरों हंदा थान वे ।
जन तहुँ ले हिकसा ला, इथां बहिश्त मुकाम वे ॥ 1 ॥
इथां आब जमजमा, इथांई सुबहान वे ।
तख्त रबानी कंगुरेला, इथांई सुलतान वे ॥ 2 ॥
सब इथां अंदर आव वे, इथांई ईमान वे ।
दादू आप वंजाइ बेला, इथांई आसान वे ॥ 3 ॥
353. (पंजाबी) क्रीड़ा ताल खंडनि
आसण रमदा रामदा, हरि इथां अविगत आप वे ।
काया काशी वंजणां, हरि इथैं पूजा जाप वे ॥ टेक ॥
महादेव मुनि देवते, सिद्धैंदा विश्राम वे ।
स्वर्ग सुखासण हुलणैं, हरि इथैं आत्माराम वे ॥ 1 ॥
अमी सरोवर आतमा, इथांई आधार वे ।
अमर थान अविगत रहै, हरि इथैं सिरजनहार वे ॥ 2 ॥
सब कुछ इथैं आव वे, इथां परमानन्द वे ।
दादू आपा दूर कर, इथांई आनंद वे ॥ 3 ॥
इति राग बिलावल सम्पूर्णः ॥ 21 ॥ पद 20 ॥
दादूराम
सत्यराम
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राग सूहा
अथ राग सूहा २२
(गायन समय दिन 9 से 12) 354. विनती । एक ताल
तुम बिच अंतर जनि परै, माधव ! भावै तन धन लेहु ।
भावै स्वर्ग नरक रसातल, भावै करवत देहु ॥ टेक ॥
भावै विपति देहु दुख संकट, भावै संपति सुख शरीर ।
भावै घर वन राव रंक कर, भावै सागर तीर, माधव ॥ 1 ॥
भावै बँध मुक्त कर, माधव ! भावै त्रिभुवन सार ।
भावै सकल दोष धर माधव, भावै सकल निवार, माधव ॥ 2 ॥
भावै धरणि गगन धर, माधव ! भावै शीतल सूर ।
दादू निकटि सदा संग, माधव ! तूँ जनि होवै दूर, माधव ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग सूहा 22
३55. परिचय । पंजाबी त्रिताल
अब हम राम सनेही पाया, अगम अनहद सौं चित लाया ॥ टेक ॥
तन मन आतम ताकों दीन्हा, तब हरि हम अपना कर लीन्हा।
वाणी विमल पाँच परानां, पहिली शीश मिले भगवानां ॥ 1 ॥
जीवत जन्म सुफल कर लीन्हा, पहली चेते तिन भल कीन्हा।
अवसर आपा ठौर लगावा, दादू जीवित ले पहुँचावा ॥ 2 ॥
इति राग सूहा सम्पूर्णः ॥ 22 ॥ पद 2 ॥
दादूराम
सत्यराम
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कायाबेली ग्रंथ
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अथ काया बेली ग्रन्थ २३
३५६. पिंड ब्रह्माण्ड शोधन । पंजाबी त्रिताल
साचा सतगुरु राम मिलावे, सब कुछ काया मांहि दिखावे ॥ टेक ॥
काया माँही सिरजनहार, काया माँही ओंकार।
काया माँही है आकाश, काया माँही धरती पास ॥ १ ॥
काया माँही पवन प्रकाश, काया माँही नीर निवास ।
काया माँही शशिहर सूर, काया माँही बाजे तूर ॥ २ ॥
काया माँही तीनों देव, काया माँही अलख अभेव ।
काया माँही चारों वेद, काया माँही पाया भेद ॥ ३ ॥
काया माँही चारों खानी, काया माँही चारों वाणी ।
काया माँही उपजै आइ, काया माँही मर मर जाइ ॥ ४ ॥
काया माँही जामै मरै, काया माँही चौरासी फिरै ।
काया माँही ले अवतार, काया माँही बारम्बार ॥ ५ ॥
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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23
काया माँही रात दिन, उदय अस्त इकतार।
दादू पाया परम गुरु, कीया एकंकार ॥ 6 ॥
357. त्रिताल
काया माँही खेल पसारा, काया माँही प्राण अधारा।
काया माँही अठारह भारा, काया माँही उपावनहारा ॥ 1 ॥
काया माँही सब वन राइ, काया माँही रहे घर छाइ।
काया माँही कंदलि वास, काया माँही है कैलास ॥ 2 ॥
काया माँही तरुवर छाया, काया माँही पंखी माया।
काया माँही आदि अनंत, काया माँही है भगवन्त ॥ 3 ॥
काया माँही त्रिभुवन राइ, काया माँही रहे समाइ।
काया माँही चौदह भुवन, काया माँही आवागवन ॥ 4 ॥
काया माँही सब ब्रह्मांड, काया माँही हैं नव खण्ड।
काया माँही स्वर्ग पयाल, काया माँही आप दयाल ॥ 5 ॥
काया माँही लोक सब, दादू दिये दिखाइ।
मनसा वाचा कर्मणा, गुरु बिन लख्या न जाइ ॥ 6 ॥
358.रंगताल
काया माँही सागर सात, काया माँही अविगत नाथ।
काया माँही नदिया नीर, काया माँही गहर गंभीर ॥ 1 ॥
काया माँही सरवर पाणी, काया माँही बसै बिनाणी।
काया माँही नीर निवान, काया माँही हंस सुजान ॥ 2 ॥
काया माँही गंग तरंग, काया माँही जमुना संग।
काया माँही है सरस्वती, काया माँही द्वारावती ॥ 3 ॥
काया माँही काशी स्थान, काया माँही करै स्नान।
काया माँही पूजा पाती, काया माँही तीर्थ जाती ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23
काया माँही मुनिवर मेला, काया माँही आप अकेला ।
काया माँही जपिये जाप, काया माँही आपै आप ॥ 5 ॥
काया नगर निधान है, माँही कौतिक होइ ।
दादू सद्गुरु संग ले, भूल पड़े जनि कोइ ॥ 6 ॥
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रंगताल
काया माँही विषमी बाट, काया माँही औघट घाट।
काया माँही पट्टण गाँव, काया माँही उत्तम ठाँव ॥ 1 ॥
काया माँही मण्डप छाजै, काया माँही आप विराजै।
काया माँही महल आवास, काया माँही निश्चल बास ॥ 2 ॥
काया माँही राजद्वार, काया माँही बोलणहार।
काया माँही भरे भण्डार, काया माँही वस्तु अपार ॥ 3 ॥
काया माँही नौ निधि होइ, काया माँही अठ सिधि सोइ।
काया माँही हीरा साल, काया माँही निपजैं लाल ॥ 4 ॥
काया माँही माणिक भरे, काया माँही ले ले धरे।
काया माँही रत्न अमोल, काया माँही मोल न तोल ॥ 5 ॥
काया माँही कर्तार है, सो निधि जानै नाँहि।
दादू गुरुमुख पाइये, सब कुछ काया मांहि ॥ 6 ॥ -
वर्णभिन्न ताल
काया माँही सब कुछ जाण, काया मांहै लेहु पिछाण।
काया माँही बहु विस्तार, काया माँही अनन्त अपार ॥ 1 ॥
काया माँही अगम अगाध, काया माँही निपजे साध।
काया माँही कह्या न जाइ, काया माँही रहे ल्यौ लाइ ॥ 2 ॥
काया माँही साधन सार, काया माँही करे विचार।
काया माँही अमृत वाणी, काया माँही सारंग प्राणी ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23
काया माँही खेलै प्राण, काया माँही पद निर्वाण।
काया माँही मूल गह रहै, काया मांही सब कुछ लहै ॥ 4 ॥
काया माँही निज निरधार, काया माँही अपरम्पार।
काया माँही सेवा करै, काया माँही नीझर झरै ॥ 5 ॥
काया माँही वास कर, रहै निरंतर छाइ।
दादू पाया आदि घर, सद्गुरु दिया दिखाइ ॥ 6 ॥
361. वर्ण भिन्न ताल
काया माँही अनुभै सार, काया माँही करै विचार।
काया माँही उपजै ज्ञान, काया माँही लागै ध्यान ॥ 1 ॥
काया माँही अमर स्थान, काया माँही आतमराम।
काया माँही कला अनेक, काया माँही कर्ता एक॥ 2 ॥
काया माँही लागै रंग, काया माँही सांई संग।
काया माँही सरवर तीर, काया माँही कोकिल कीर ॥ 3 ॥
काया माँही कच्छप नैन, काया माँही कूँजी बैन।
काया माँही कमल प्रकाश, काया माँही मधुकर वास ॥ 4 ॥
काया माँही नाद कुरंग, काया माँही ज्योति पतंग।
काया माँही चातक मोर, काया माँही चंद चकोर ॥ 5 ॥
काया माँही प्रीति कर, काया माँही सनेह।
काया माँही प्रेम रस, दादू गुरुमुख येह ॥ 6 ॥
362. राज विद्याधर ताल
काया माँही तारणहार, काया माँही उतरे पार।
काया माँही दुस्तर तारे, काया माँही आप उबारे ॥ 1 ॥
काया माँही दुस्तर तिरे, काया माँही होइ उद्धरे।
काया माँही निपजै आइ, काया माँही रहै समाइ ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23
काया माँही खुले कपाट, काया माँही निरंजन हाट।
काया माँही है दीदार, काया माँही देखणहार ॥ 3 ॥
काया माँही राम रंग राते, काया माँही प्रेम रस माते।
काया माँही अविचल भये, काया माँही निहचल रहे ॥ 4 ॥
काया माँही जीवै जीव, काया माँही पाया पीव।
काया माँही सदा आनंद, काया माँही परमानन्द ॥ 5 ॥
काया माँही कुशल है, सो हम देख्या आइ।
दादू गुरुमुख पाइये, साधु कहैं समझाइ ॥ 6 ॥
363. राज विद्याधर ताल
काया माँही देख्या नूर, काया माँही रह्या भरपूर।
काया माँही पाया तेज, काया माँही सुन्दर सेज ॥ 1 ॥
काया माँही पुंज प्रकाश, काया माँही सदा उजास।
काया माँही झिलमिल सारा, काया माँही सब तैं न्यारा ॥ 2 ॥
काया माँही ज्योति अनन्त, काया माँही सदा बसन्त।
काया माँही खेलें फाग, काया माँही सब वन बाग ॥ 3 ॥
काया माँही खेलें रास, काया माँही विविध विलास।
काया माँही बाजैं बाजे, काया माँही नाद धुनि साजे ॥ 4 ॥
काया माँही सेज सुहाग, काया माँही मोटे भाग।
काया माँही मंगलाचार, काया माँही जै जैकार ॥ 5 ॥
काया अगम अगाध है, माँही तूर बजाइ।
दादू प्रकट पीव मिल्या, गुरुमुख रहे समाइ ॥ 6 ॥
इति कायाबेली ग्रन्थ सम्पूर्णः ॥ 23 ॥ पद 10 ॥
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राग
बसंत
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अथ राग बसंत २४
(गायन समय प्रभात ३ से ६ तथा बसंत ऋतु)
३६४. भजन भेद । मल्लिका मोद ताल
निर्मल ना मन लीयो जाइ, जाके भाग बड़े सोई फल खाइ ॥ टेक ॥
मन माया मोह मद माते, कर्म कठिन ता मांहि परे ।
विषय विकार मान मन मांही, सकल मनोरथ स्वाद खरे ॥ १ ॥
काम क्रोध ये काल कल्पना, मैं मैं मेरी अति अहंकार ।
तृष्णा तृप्ति न मानै कबहूँ, सदा कुसंगी पाँच विकार ॥ २ ॥
अनेक जोध रहैं रखवाले, दुर्लभ दूर फल अगम अपार ।
जाके भाग बड़े सोई फल पावै, दादू दाता सिरजनहार ॥ ३ ॥
३६५. (गुजराती) विरह । धीमी ताल
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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24
तूँ घर आवने माहरे रे, हूँ जाऊँ वारणे ताहरे रे ॥ टेक ॥
रैन दिवस मूनै निरखतां जाये ।
वेलो थई घर आवे रे, वाहला आकुल थाये ॥ 1 ॥
तिल तिल हौं तो तारी वाटड़ी जोऊँ ।
एने रे आँसूड़े वाहला, मुखड़ो धोऊँ ॥ 2 ॥
ताहरी दया करि घर आवे रे वाहला ।
दादू तो ताहरो छे रे, मा कर टाला ॥ 3 ॥
366. करूणा विनती । तेवरा ताल
मोहन दुख दीरघ तूँ निवार, मोहि सतावै बारम्बार ॥ टेक ॥
काम कठिन घट रहै मांहि, तातैं ज्ञान ध्यान दोउ उदै नांहि ।
गति मति मोहन विकल मोर, तातैं चित्त न आवै नाम तोर ॥ 1 ॥
पाँचों द्वन्दर देह पूरि, तातैं सहज शील सत रहैं दूरि ।
सुधि बुधि मेरी गई भाज, तातैं तुम विसरे महाराज ॥ 2 ॥
क्रोध न कबहुँ तजै संग, तातैं भाव भजन का होइ भंग ।
समझि न काई मन मंझारि, तातैं चरण विमुख भये श्री मुरारि ॥ 3 ॥
अन्तरजामी कर सहाइ, तेरो दीन दुखित भयो जन्म जाइ ।
त्राहि त्राहि प्रभु तूँ दयाल, कहै दादू हरि कर संभाल ॥ 4 ॥
367. मन स्थिरार्थ विनती । एक ताल
मेरे मोहन मूरति राखि मोहि, निसवासर गुण रमूं तोहि ॥ टेक ॥
मन मीन होइ ज्यों स्वाद खाइ, लालच लागो जल तैं जाइ ।
मन हस्ती मातो अपार, काम अंध गज लहै न सार ॥ 1 ॥
मन पतंग पावक परै, अग्नि न देखै ज्यों जरै ।
मन मृगा ज्यों सुनै नाद, प्राण तजै यूं जाइ बाद ॥ 2 ॥
मन मधुकर जैसे लुब्धि वास, कँवल बँधावै होइ नास ।
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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24
मनसा वाचा शरण तोर, दादू को राखो गोविन्द मोर ॥ ३ ॥
३६८. उपदेश । एक ताल
बहुरि न कीजे कपट कांम, हिरदै जपिये राम नांम ॥ टेक॥
हरि पाखैं नहिं कहूँ ठांम, पीव बिन खड़भड़ गांम गांम ।
तुम राखो जियरा अपनी मांम, अनत जनि जाय रहो विश्रांम ॥ १ ॥
कपट कांम नहीं कीजे हाँम, रघु चरण कमल कहु राम नांम ।
जब अंतरयामी रहै जांम, तब अक्षय पद जन दादू प्रांम ॥ २ ॥
३६९. परिचय प्राप्ति । कड्डुक ताल
तहँ खेलूं पीव सूं नित ही फाग, देख सखी री मेरे भाग ॥ टेक ॥
तहँ दिन दिन अति आनन्द होइ, प्रेम पिलावै आप सोइ ।
संगियन सेती रमूं रास, तहँ पूजा अर्चा चरण पास ॥ १ ॥
तहँ वचन अमोलक सब ही सार, तहँ बरतै लीला अति अपार ।
उमंग देइ तब मेरे भाग, तिहि तरुवर फल अमर लाग ॥ २ ॥
अलख देव कोइ जाणैं भेव, तहँ अलख देव की कीजै सेव ।
दादू बलि बलि बारंबार, तहँ आप निरंजन निराधार ॥ ३ ॥
३७०. परिचय सुख वर्णन । षड़ताल
मोहन माली सहज समाना, कोई जाणैं साध सुजाना ॥ टेक ॥
काया बाड़ी मांही माली, तहाँ रास बनाया ।
सेवग सौं स्वामी खेलन को, आप दया कर आया ॥ १ ॥
बाहर भीतर सर्व निरंतर, सब में रह्या समाई ।
परगट गुप्त, गुप्त पुनि परगट, अविगत लख्या न जाई ॥ २ ॥
ता माली की अकथ कहानी, कहत कही नहिं आवै ।
अगम अगोचर करत अनन्दा, दादू ये जस गावै ॥ ३ ॥
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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24
371. परिचय । षड़ताल
मन मोहन मेरे मन ही मांहिं, कीजै सेवा अति तहाँ ॥ टेक ॥
तहँ पायो देव निरंजना, परगट भयो हरि यह तना ।
नैनन ही देखूं अघाइ, प्रगट्यो है हरि मेरे भाइ ॥ 1 ॥
मोहि कर नैनन की सैन देइ, प्राण मूंखि हरि मोर लेइ ।
तब उपजै मोकौं इहै बानि, निज निरखत हूँ सारंगपानि ॥ 2 ॥
अंकुर आदैं प्रगट्यो सोइ, बैन बाण तातें लागे मोहि ।
शरणै दादू रह्यो जाइ, हरि चरण दिखावै आप आइ ॥ 3 ॥
372. थकित निश्चल । मदन ताल
मतवाले पँचूं प्रेम पूर, निमष न इत उत जाहिं दूर ॥ टेक ॥
हरि रस माते दया दीन, राम रमत ह्वै रहे लीन ।
उलट अपूठे भये थीर, अमृत धारा पीवहिं नीर ॥ 1 ॥
सहज समाधि तज विकार, अविनाशी रस पीवहिं सार ।
थकित भये मिल महल मांहिं, मनसा वाचा आन नांहिं ॥ 2 ॥
मन मतवाला राम रंग, मिल आसण बैठे एक संग ।
सुस्थिर दादू एकै अंग, प्राणनाथ तहँ परमानन्द ॥ 3 ॥
इति राग बसंत सम्पूर्णः ॥ 24 ॥ पद 9 ॥
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राग भैरूं
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अथ राग भैरूं 25
(गायन समय प्रातः काल)
373. सतगुरु तथा नाम महिमा । त्रिताल
सतगुरु चरणां मस्तक धरणां, राम नाम कहि दुस्तर तिरणां ॥ टेक ॥
अठ सिधि नव निधि सहजैं पावै, अमर अभै पद सुख में आवै ॥ 1 ॥
भक्ति मुक्ति बैकुंठा जाइ, अमर लोक फल लेवै आइ ॥ 2 ॥
परम पदारथ मंगल चार, साहिब के सब भरे भंडार ॥ 3 ॥
नूर तेज है ज्योति अपार, दादू राता सिरजनहार ॥ 4 ॥
374. उत्तम ज्ञान स्मरण । चौताल
तन ही राम मन ही राम, राम हृदय रमि राखि ले ।
मनसा राम सकल परिपूरण, सहज सदा रस चाखि ले ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
नैनां राम बैनां राम, रसनां राम सँभारि ले ।
श्रवणां राम सन्मुख राम, रमता राम विचारि ले ॥ 1 ॥
श्वासैं राम सुरतैं राम, शब्दैं राम समाइ ले ।
अंतर राम निरंतर राम, आत्मराम ध्याइ ले ॥ 2 ॥
सर्वैं राम संगैं राम, राम नाम ल्यौ लाइ ले ।
बाहर राम भीतर राम, दादू गोविन्द गाइ ले ॥ 3 ॥
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उत्तम स्मरण। मदन ताल
ऐसी सुरति राम ल्यौ लाइ, हरि हृदय जनि बिसरि जाइ ॥ टेक ॥
छिन छिन मात संभारै पूत, बिंद राखै जोगी अवधूत ।
त्रिया कुरूप रूप कों रटै, नटणी निरख बांस बरत चढ़ै ॥ 1 ॥
कच्छप दृष्टि धरै धियांन, चातक नीर प्रेम की बान ।
कुंजी कुरलि संभालै सोइ, भृंगी ध्यान कीट को होइ ॥ 2 ॥
श्रवणों शब्द ज्यूं सुनै कुरंग, ज्योति पतंग न मोड़ै अंग ।
जल बिन मीन तलफि ज्यों मरै, दादू सेवक ऐसै करै ॥ 3 ॥ -
स्मरण फल। एक ताल
निर्गुण राम रहै ल्यौ लाइ, सहजैं सहज मिलै हरि जाइ ॥ टेक ॥
भौजल व्याधि लिपै नही कबहूँ, करम न कोई लागै आइ ।
तीनों ताप जरै नहिं जियरा, सो पद परसै सहज सुभाइ ॥ 1 ॥
जन्म जरा जोनी नहिं आवै, माया मोह न लागै ताहि ।
पाँचों पीड़ प्राण नहीं व्यापै, सकल सोधि सब इहै उपाइ ॥ 2 ॥
संकट संशय नरक न नैनहूँ, ताको कबहूँ काल न खाइ ।
कंप न काई भय भ्रम भागै, सब विधि ऐसी एक लगाइ ॥ 3 ॥
सहज समाधि गहो जे दिढ़ करि, जासौँ लागै सोइ आइ ।
भृंगी होइ कीट की न्यांई, हरि जन दादू एक दिखाइ ॥ 4 ॥
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