सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
दादू कहै सीख सुन मेरी, कहु करीम संभाल सबेरी ॥ 4 ॥
337. भंगताल
बार बार तन नहीं वावरे, काहे को बाद गँवावै रे ।
बिनसत बार कछू नहिं लागै, बहुरि कहाँ को पावै रे ॥ टेक ॥
तेरे भाग बड़े भाव धर कीन्हाँ, क्यों कर चित्र बनावै रे ।
सो तूँ लेइ विषय में डारे, कंचन छार मिलावै रे ॥ 1 ॥
तूँ मत जानै बहुरि पाइये, अब कै जनि डहिकावै रे ।
तीनि लोक की पूँजी तेरे, बनिज बेगि सो आवै रे ॥ 2 ॥
जब लग घट मैं श्वास वास है, तब लग काहे न ध्यावै रे ।
दादू तन धर नाम न लीन्हा, सो प्राणी पछतावै रे ॥ 3 ॥
338. ललित ताल
राम विसार्यो रे जगनाथ ।
हीरा हार्यो देखत ही रे, कौड़ी कीन्ही हाथ ॥ टेक ॥
काचहुता कंचन कर जानै, भूल्यो रे भ्रम पास ।
साचे सौं पल परिचय नाहीं, कर काचे की आस ॥ 1 ॥
विष ताको अमृत कर जानै, सो संग न आवै साथ ।
सेमल के फूलन पर फूल्यो, चूक्यो अब की घात ॥ 2 ॥
हरि भज रे मन सहज पिछानै, ये सुन साची बात ।
दादू रे अब तैं कर लीजै, आयु घटै दिन जात ॥ 3 ॥
339. मन । ललित ताल
मन चंचल मेरो कह्यो न मानै, दसों दिशा दौरावै रे ।
आवत जात बार नहि लागै, बहुत भाँति बौरावै रे ॥ टेक ॥
बेर बेर बरजत या मन को, किंचित सीख न मानै रे ।
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