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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 504 में से

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पृष्ठ 464

श्री दादूवाणी-राग बसंत 24
तूँ घर आवने माहरे रे, हूँ जाऊँ वारणे ताहरे रे ॥ टेक ॥
रैन दिवस मूनै निरखतां जाये ।
वेलो थई घर आवे रे, वाहला आकुल थाये ॥ 1 ॥
तिल तिल हौं तो तारी वाटड़ी जोऊँ ।
एने रे आँसूड़े वाहला, मुखड़ो धोऊँ ॥ 2 ॥
ताहरी दया करि घर आवे रे वाहला ।
दादू तो ताहरो छे रे, मा कर टाला ॥ 3 ॥
366. करूणा विनती । तेवरा ताल
मोहन दुख दीरघ तूँ निवार, मोहि सतावै बारम्बार ॥ टेक ॥
काम कठिन घट रहै मांहि, तातैं ज्ञान ध्यान दोउ उदै नांहि ।
गति मति मोहन विकल मोर, तातैं चित्त न आवै नाम तोर ॥ 1 ॥
पाँचों द्वन्दर देह पूरि, तातैं सहज शील सत रहैं दूरि ।
सुधि बुधि मेरी गई भाज, तातैं तुम विसरे महाराज ॥ 2 ॥
क्रोध न कबहुँ तजै संग, तातैं भाव भजन का होइ भंग ।
समझि न काई मन मंझारि, तातैं चरण विमुख भये श्री मुरारि ॥ 3 ॥
अन्तरजामी कर सहाइ, तेरो दीन दुखित भयो जन्म जाइ ।
त्राहि त्राहि प्रभु तूँ दयाल, कहै दादू हरि कर संभाल ॥ 4 ॥
367. मन स्थिरार्थ विनती । एक ताल
मेरे मोहन मूरति राखि मोहि, निसवासर गुण रमूं तोहि ॥ टेक ॥
मन मीन होइ ज्यों स्वाद खाइ, लालच लागो जल तैं जाइ ।
मन हस्ती मातो अपार, काम अंध गज लहै न सार ॥ 1 ॥
मन पतंग पावक परै, अग्नि न देखै ज्यों जरै ।
मन मृगा ज्यों सुनै नाद, प्राण तजै यूं जाइ बाद ॥ 2 ॥
मन मधुकर जैसे लुब्धि वास, कँवल बँधावै होइ नास ।

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